Posts tagged ‘Dimaag’

नवम्बर 24, 2013

शुतुरमुर्ग ही नियति?

चिंतित मन ने तस्वीर उकेरीbrain-001

चेहरा लगने लगा बूढ़ा सा

दोस्त ने कोसा

‘मूर्ख!

दिमाग को

खूंटी पर टांग कर काम कर

अधिक सोचेगा

तो कष्ट होगा ही’

तो क्या यहीं पर पाते हैं,

जीवन के सब प्रश्न विश्राम?

तो क्या अंततः

सारी सोचों का हश्र

होता है बन जाने में

शुतुरमुर्ग !

Yugalsign1

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नवम्बर 16, 2013

चिराग जिस्मों के

होता  है अहसास बहुत अलग सा  dreamwo-001

जब

आँखे खोलते हैं

सपने मेरे

तुम्हारी बाहों में…

अजब सी इक सिहरन

जैसे

छू  गयी हो लपक के बिजली आसमान की

दिल दिमाग सुन्न बस…

  वश में तुम्हारे सब|

एक ही ख्वाहिश रह जाती है

बस कि

चैन पाएं

मुंह छुपा कर

तुम्हारे सीने में…

सपने मेरे हद बेचैन

जागा करते हैं रात भर

आओ कि

इन्हें चैन से  नींद तो आये

रौशन रहे रात

चिरागों की तरह जलते जिस्मों की बदौलत

आओ कि

फिर चाहे सुबह न उगे

चाहे तो आए

कि फिर न दिन आए…

(रजनीश)

नवम्बर 7, 2013

जली तो तुम भी मेरी याद की तपिश में

कल रात भर fire-001

आग बीनता रहा मैं…

हर करवट पे चटकते जिस्म से

जैसे धुंआ सा उठता रहा

उस दिन देखा था चटकती लकड़ियों से

निकलती नीली-नीली चिंगारियों को

उड़-उड़ मुझ तक आती थीं

कल मुझसे भी निकली आग

लेकिन

शायद तुम तक पहुँची नहीं …

शायद दूरियां…

शायद मजबूरियां…

शायद बेरुखी…

शायद बेहिसी…

शायद बे-ताल्लुकी…

पता नहीं क्या…

पता नहीं क्या-क्या सोचता रहा दिमाग

और पता नहीं क्या-क्या समझाता रहा दिल

दिल जीता…

मैं हारा

दिल कहता है बेचैन तो तुम भी होती हो

चाहे थोडा ही सही…

उदासी मेरी जाती जरुर है तुम तक…

थकी-थकी सी सही…

कुछ कहो न कहो

सामने रहो…

मुझे बा-होश रखो

खुद चाहे बे-होश रहो

जान पाया इन दूरियों की वज़ह से ही

कि इन दूरियों के माने कुछ भी नहीं

तुमको हर दम मैंने देखा है

अपने आस पास यहीं

मेरे जलते बदन के कोयलों को टटोलते

कल रात

हाँ कल रात ही तो…

नहीं पता कब सोया

लेकिन तुम्हे शिकायत करते पाया आज

 उँगलियों के जलने की

(रजनीश)

 

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