Posts tagged ‘Diamond’

अप्रैल 7, 2013

मैं फिर भी उठ खड़ी होऊँगी – MAYA ANGELOU

तुम मुझे पराजित हुआ
साबित कर सकते हो इतिहास के पन्नों में
अपनी कड़वाहट और तोड़े मरोड़े झूठों के जरिये
तुम मुझे धूल -धूसरित कर सकते हो
पर मैं तब भी धूल की तरह ही उठ जाउंगी|

क्या मेरी जीवंतता तुम्हे विचलित करती है?
तुम निराशा के गर्त में क्यों गिरे हुए हो?
क्योंकि मैं ऐसे चलती हूँ
मानों मेरे पास तेल के कुएँ हों,
जो मेरे ड्राइंगरूम में तेल उगलते हैं,
चाँद और सूरज की तरह,
ज्वार की निश्चितता के साथ,
जैसे आशाओं का बसंत खिल आया हो,
मैं फिर भी उठ जाऊँगी|

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?
झुके हुए सिर और नीची निगाहों के साथ खड़ा हुआ?
कंधे ऐसे गिरे हुए जैसे आंसूं की बूँदें,
ह्रदयविदारक विलाप से कमजोर हुयी?
क्या मेरे गर्वीले दावे तुम्हे अपमानजनक लगते हैं?
क्या तुम्हे घोर परेशानी नहीं होती मेरे वजूद को स्वीकार करने में,
क्योंकि मैं ऐसे हँसती हूँ
मानो मेरे पास सोने की खाने हों,
मेरे घर के पिछवाड़े में|

तुम मुझे अपने शब्दों से मार सकते हो,
तुम मुझे अपनी आँखों से काट सकते हो,
तुम मुझे अपनी घृणा से मार सकते हो,
पर तब भी, हवा की तरह, मैं फिर से उठ जाऊँगी |

क्या मेरा आकर्षक और कामुक व्यक्तित्व तुम्हे
विचलित करता है,
क्या यह एक आश्चर्य के रूप में तुम्हारे सम्मुख आता है
कि मैं ऐसे नृत्य करती हूँ
मानों मेरे पास हीरे हैं,
मेरी जंघाओं के मिलने की जगह पर|

मैं इतिहास की लज्जाजनक झोंपडियों से
उठ जाऊँगी,
मैं दुख से भरे बीते समय से
उठ जाऊँगी,
मैं एक काला महासागर हूँ,
चौड़ा और ऊँची उछाल लगाता हुआ,
ज्वार से उत्पन्न थपेडों को सहन करता हुआ|

मैं आतंक और भय की रातों को पीछे छोड़कर
उठ जाऊँगी
आश्चर्यजनक रूप से चमचमाते दिवस के रूप में
मैं उठ जाउंगी
अपने पूर्वजों द्वारा दिए गये उपहारों को लिए हुए
मैं गुलाम का स्वप्न हूँ,
उसकी आशा हूँ,
मैं उठ जाऊँगी
मैं उठ जाऊँगी
मैं उठ जाऊँगी

[ Still I Rise by Maya Angelou ]

 

अप्रैल 27, 2011

पत्थर नहीं हीरा बन

जिंदगी की ठोकरों से
घबरा कर
पत्थर न बन यार!

तेरे भीतर छिपा है हीरा
तलाश उसे
तराश उसे।

माना बहुत लंबा है
सडक पर लुढ़कते फिरने से
मुकुट की शोभा बनने तक का सफर।

बुद्धि और बदन को कठोर कर
हाथ की लकीरों को रोने वाले
उठा हाथ में
कलम हो के कुदाल
पसीने की नदी में बहकर ही
सफलता के सागर की मिलती है थाह।

याद रखना
बिना तपे
सोना निखरता कब है
भीतरी आग अगर नहीं होती
सूरज रात बना रहता।

कटने-छटने-सँवरने की पीड़ा में ही
छिपा है
पत्थर से हीरा बनने का राज़
जिसकी  कुंजी
तेरी पहुँच से दूर नहीं!

(रफत आलम)

%d bloggers like this: