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जनवरी 11, 2014

ठूंठ जीवन

पतित है वह RKap-001

या कि चेतना उसकी

है सुप्त प्राय:

दिवस के प्रारम्भ से

अवसान तक

धुंधलका सा है

– सोच में भी

– कर्म में भी

-देह में भी

तिरती घटिकाएं

प्रात: की अरुनोदायी आभा

या कि तिमिर के उत्थान की बेला

शून्यता की चादर से हैं लिपटीं

सूनी आखों से तकती है

समय के रथ की ओर!

अल्हड यौवन की खिलखिलाहट

गोरे तन की झिलमिलाहट

युगल सामीप्य की उष्णता

युवा मानों की तरंगित उर्जस्विता

को-

सराहकर भी अनमना सा,

अन्यमनस्क शुतुरमुर्ग!

पहिये की रफ़्तार से

संचालित जीवन

जैसे कि हो पहिये ही का एक बिन्दु

एक वृत्ताकार पथ पर

अनवरत गतिमान

पर दिशाहीन!

– कोई इच्छा नहीं

– कोई संकल्प नहीं-कोई माया नहीं

-कोई आलोड़न नहीं

बस एक मशीन भर!

एहसास है कचोटता

जीवन चल तो रहा है

पर कहीं बुझ रही है आग

धीरे-धीरे, मर-मर कर

आत्मा की चमक

होती जाती है मंद

क्षण-प्रतिक्षण!

Yugalsign1

अगस्त 23, 2011

मैं कौन हूँ?

कौन हूँ?
कहाँ से आया हूँ?
कहाँ जाऊँगा?

माटी में धडकन फुंकने के दिन से
निरुत्तर हैं ये सवाल।

पथ, पथिक, गंतव्य,
सब द्रश्य पटल पर धुंधलाते हुए
उतर जाते हैं,
समय के अंधे कुएँ में,
जहाँ गूंज रही हैं प्रतिध्वनियाँ
गुजर गए पलों के अज्ञात परिणाम की।

अपने होने और न होने के बीच
अस्तित्व की अबूझ पहली को सुलझाने में
बुद्धि की समस्त अटकल
तर्क की कसौटी पर होकर गूंगी
तमाशा बने देखती है तमाशाई।

बिसात है किसकी?
क्या है खेल?

(रफत आलम)

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