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फ़रवरी 14, 2017

फीरोजी होठ … धर्मवीर भारती

purple-001इन फीरोजी होठों पर

बरबाद मेरी जिंदगी

इन फीरोजी होठों पर |

गुलाबी पांखुरी पर हल्की सुरमई आभा

कि ज्यों करवट बदल लेती कभी बरसात की दुपहर

इन फीरोजी होठों पर |

तुम्हारे स्पर्श की बादल-धुली कचनार नरमाई

तुम्हारे वक्ष की जादू भरी मदहोश गरमाई|

तुम्हारी चितवनों में नर्गिसों की पाँत शरमाई

किसी भी मोल पर मैं आज अपने को लुटा सकता

सिखाने को कहा

मुझसे प्रणय के देवताओं ने

तुम्हे आदिम गुनाहों का अजब-सा इन्द्रधनुषी स्वाद!

मेरी जिंदगी बरबाद!

अंधरी रात में खिलते हुए बेले-सरीखा मन

मृणालो की मुलायम बांह ने सीखी नहीं उलझन

सुहागन लाज में लिपटा शरद की धूप-जैसा तन

पंखुरियों पर भँवर के गीत-सा मन टूटता जाता

मुझे तो वासना का

विष हमेशा बन गया अमृत

बशर्ते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आबाद

मेरी जिंदगी बरबाद!

गुनाहों से कभी मैली पड़ी बेदाग़ तरुणाई-

सितारों की जलन से बादलों पर आंच कब आई ?

न चन्दा को कभी व्यापी अमा की घोर कजराई

बड़ा मासूम होता है गुनाहों का समर्पण भी

हमेशा आदमी

मजबूर होकर लौट आता है

जहां हर मुक्ति के, हर त्याग के, हर साधना के बाद!

मेरी जिंदगी बरबाद!

(धर्मवीर भारती)

सितम्बर 9, 2016

सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना (पाश)

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होतीDBZ-001
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-सोए पकड़े जाना – बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना – बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्‍त काट लेना – बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आँख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी ठण्डी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को
मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन की
भाप पर मोहित हो जाती है
जो रोज़मर्रा की साधारणतया को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के दुष्चक्र में ही गुम जाती है

सबसे ख़तरनाक वह चाँद होता है
जो हर कत्ल-काण्ड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
लेकिन तुम्हारी आँखों में मिर्चों की तरह नहीं लड़ता है

सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
तुम्हारे कान तक पहुंचने के लिए
जो विलाप को लाँघता है
डरे हुए लोगों के दरवाज़े पर जो
गुण्डे की तरह हुँकारता है

सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते गीदड़ हुआते
चिपक जाता सदैवी अँधेरा बन्द दरवाज़ों की चैगाठों पर

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाये
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में चुभ जाये

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

paash

[अवतार सिंह संधू “पाश” (जन्म – 9 सितम्बर 1950)]

सितम्बर 23, 2015

फसल… (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

हल की तरह
कुदाल की तरह
या खुरपी की तरह
पकड़ भी लूँ कलम तो
फिर भी फसल काटने
मिलेगी नहीं हम को ।

हम तो ज़मीन ही तैयार कर पायेंगे
क्रांतिबीज बोने कुछ बिरले ही आयेंगे
हरा-भरा वही करेंगें मेरे श्रम को
सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को ।

कल जो भी फसल उगेगी, लहलहाएगी
मेरे ना रहने पर भी
हवा से इठलाएगी
तब मेरी आत्मा सुनहरी धूप बन बरसेगी
जिन्होने बीज बोए थे
उन्हीं के चरण परसेगी
काटेंगे उसे जो फिर वो ही उसे बोएंगे
हम तो कहीं धरती के नीचे दबे सोयेंगे ।

अप्रैल 2, 2014

कहो बनारस कैसे हो अब?

कहो बनारस कैसे हो अब?

कैसी हैं लंका की गलियां
दशाश्वमेध का हाल है क्या?
हत्यारे के अभिषेक को गंगाजल तैयार है क्या?
बिस्मिल्ला की शहनाई क्या अब भी बजती है वैसे ही
क्या अब भी हर हर की ध्वनि सुन सब भोले को ही भजते हैं?
क्या अब भी छन्नू मिसिर के शिव नचते हैं मस्त मसानों में?

यह नमो नमो का नारा सुनकर डर तो नहीं लगा तुमको?
ठीकठाक तो है न सब?
कहो बनारस कैसे हो अब?

नींद रात को आती तो है?
कहीं स्वप्न में दंगों वाली आग का धुआँ भरा तो नहीं?
कहीं उम्मीदों वाला सपना इन नारों से मरा तो नहीं?
कहो आज तो कह लो जाने कल ये मौक़ा मिले ना मिले
कहीं सूर्य की पहली किरण में कोई अन्धेरा भरा तो नहीं?

कह दो प्यारे
फिर जाने तुमसे अब मिलना हो कब
कहो बनारस कैसे हो अब?

देखो कैसे डर का बादल घिरता आता है
देखो कैसे गर्जन तर्जन से एक सन्नाटा छाया है
देखो कैसे घर घर में उठती जाती हैं दीवारें
देखो कैसे रंग बदलती गिरगिट सर पे नाच रही है
देखो कैसे एक अन्धेरा धूप निगलता निकल पड़ा है
देखो अजाने डरी हुई हैं और मुअज्जिन डरा हुआ है
कालिख का रंग उनके भोर के सपनों तक में भरा हुआ है

कैसी रंगत रात ने बदली
दिन ने बदले कैसे ढब
कहो बनारस कैसे हो अब?

छोडो प्यारे ऐसा भी क्या चलो घाट पर चलते हैं
खोलो चुनौटी ताल बजाओ मिलकर सुरती मलते हैं
तुम भी यार ग़ज़ब हो ऐसे भी क्या सब मिट जाता है?
अपनी ताक़त इतनी भी क्या कम आगत की पदचाप सुनो
जो आया है धूमधाम से जाएगा चुपचाप सुनो
सुनो मेरी जां चौखम्भे और विश्वनाथ की आवाज़ सुनो

हाथ मिलाओ, साथ में आओ
मिलकर साथ चलेंगे सब
कहो बनारस कैसे हो अब?

(सुखपाल सिंह)

जनवरी 29, 2013

दुश्मन आवारा मन

चन्दन के वृक्षों की

खुशबू में डूबा मन

शायद मन राधा है

या फिर है वृन्दावन|

मन में क्या झूम उठी

अंग अंग चूम उठी

तन में फिर यौवन की

आंधी सी घूम उठी|

पागल सा फिरता है

अब तो बंजारा मन

आखिर क्यों इतना है

दुश्मन आवारा मन|

दूर कहीं कली खिली

नयन-नयन धूप ढली

लहरों के पंखों पर

अधरों की प्यास चली|

चलो चलें और छुएं

सागर का खारा मन

अपनी ही चाहत से

हारा बेचारा मन

{कृष्ण बिहारी}

मार्च 12, 2012

सौ बार कहेंगे

तुम आये तो रंग मिले थे

गए तो पूरी धूप गयी

शायद इसको ही कहते हैं

किस्मत के हैं रूप कई

भटकी हुयी नदी में कितनी बार बहेंगे हम|

फूल-फूल तक बिखर गए हैं

पत्ते टूट गिरे शाखों से

एक तुम्हारे बिना यहाँ पर

जैसे हों हम बिना आँखों के

फिर भी इस अंधियारे जग में हंस कर यार रहेंगे हम|

ह्रदय तुम्हारे हाथ सौंपकर

प्यार किया पागल कहलाये

तुमसे यह अनमोल भेंट भी

पाकर कभी नहीं पछताए

यहीं नहीं उस दुनिया में भी यह सौ बार कहेंगे हम|

संधि नहीं कर सके किसी से

इसलिए प्यासा यह मन है

इतने से ही क्या घबराएं

यह तो पीड़ा का बचपन है

इसे जवान ज़रा होने दो वह भी भार भी सहेंगे हम|

मिलने से पहले मालूम था

अपना मिलन नहीं होगा प्रिय

अब किस लिए कुंडली देखें

कोई जतन  नहीं होगा प्रिय

कल जब तुम इस पार रहोगे तब उस पार रहेंगे हम …

{कृष्ण बिहारी}

अक्टूबर 13, 2011

मुक्त हो अर्थहीन काया

कभी आँखों से गिरे होंगे अश्रु
पानी की बहती बूंदे थाम लेने के वास्ते
तब, एक रेशमी आँचल था।

आसान था धूप का सफर भी
घनेरी जुल्फ के साये में
जिंदगी सुस्ता लेती थी।

फिर चल पड़ता था आशाओं का कारवां
मरीचिकाएं भी उन दिनो
मंजिलों के निशान हुआ करती थीं
हर प्यास का इलाज थे
अमृत भरे होठ किसी के।

समय के घने कोहरे पीछे
छिप गए सायों का ज़िक्र ही क्या?
खुद अपना अस्तित्व तक
बेबसी के अँधकार के पास गिरवी है
ना राह, ना सफर, ना मंजिल की आरजू
बस सोचता है शून्य सा दिमाग
किसी तरह साँसों का क़र्ज़ कटे
किसी तरह हाड-माँस की केद से
मुक्त हो अर्थहीन काया

(रफत आलम)

सितम्बर 19, 2011

तुम बताओ साँस थम न जायेगी

काली रात के काले अंधेरे में
तुम्हारे रुप का उजला उजाला
जब भी मेरे सामने होगा कभी
तुम बताओ नींद कैसे आयेगी!

मृगनयनी तुम्हारी आँख का दर्पण
कोटरों में कैद करके यदि तुम्हे
केवल तुम्हारी प्यास दिखलाये
तुम बताओ प्यास बढ़ न जायेगी!

सोई धूप के नीले समंदर में
धुली कविता-सा तुम्हारा विम्ब तैरे
और लहरों पर मचल जाये अगर
तुम बताओ लहर क्यों न गायेगी?

मेरे हृदय के हर खुले आकाश पर
सोना तुम्हारे रंग का सौदामिनी
पिघलकर शर्म से कभी पागल बने
तुम बताओ साँस थम न जायेगी!

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 17, 2011

तिल और ताड़

मैं तिल हूँ
नन्हा सा
सलोने गाल की
सुंदरता बना
खुश हूँ अपार।

तू ताड़ है
ऊँचा सा
सूरज सिर पर रखे
धूप में खड़ा,
कैसा है यार?

(रफत आलम)

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अप्रैल 18, 2011

उसकी याद में

गोरे गाल पर
चुम्बन का निशान
कितनी देर ठहरता है
फूल का दिल चीर कर
लम्हों में
उड़ जाती है शबनम
मेरी दोस्त
तुम भी थी
चाँदनी की नाज़ुक रूह
तुम्हे धूप में मरना ही था

गमले में खिला हुआ फूल
पल–पल मुरझाता है
उसने भी
मेरी बाहों में
तिल-तिल मर के
दम तोड़ दिया
मजबूर और बेबस मैं
वक्त को कब पकड़ पाया

मुझसा बेदर्द कौन होगा
माटी के अँधेरे घर में
सुला कर उसे
आंसू और गुलाब सजा कर
कब्र के पास बैठा हूँ
चुपचाप
सदा के लिए

माँ कहती थी
मरने वाले
आकाश में
जगमग तारे बन जाते हैं
शहर की चकाचौंध में
आकाशगंगा कब दिखती है
गांव लौट रहा हूँ
जहाँ
अब भी आकाश निर्मल है
तेरी कब्र के पास

लम्हों की सवारी पर
जारी है जिंदगी का सफर
साथ था सलोना एक हमराही
जो छोड़ कर
मुझे दरबदर
सौंप गया दिन-रात की आवारगी
न राह है अब न मंजिल कोई
रूठी हुई है मुझसे
बेवफा मौत भी

(रफत आलम)

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