Posts tagged ‘Desh’

मार्च 19, 2018

रुग्ण परिभाषाएँ

लूला, लंगड़ा, टुंडा, गूंगा, बहरा, काना, अंधा

कहकर गाली देते हैं

अपने जैसे पूर्ण देह वाले इंसानों को लोग|

सरकारी परिभाषाएँ “अपूर्ण अंगों”

में किसी प्रकार की “दिव्यता” का दर्शन करते हुए

इन्हे ‘दिव्यांग’ कहती हैं!

शरीर नश्वर है,

और

आत्मा –

अजर है

अमर है,

निराकार है,

शुद्धतम है,

निस्पृह है,

अस्पर्शनीय है ,

अदृश्य है,

आदि हुंकारने वाले,

चेतना और प्रबोधन को फलीभूत कर दिखाने वाले,

और अष्टावक्र सरीखे मनीषियों को जन्म देने वाले,

प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक के जन्मदाता

देश से पूछा तो जा ही सकता है

वास्तव में ये हैं कौन?

 

…[राकेश]

सितम्बर 16, 2016

अकड़ और अश्लीलता से मुठभेड़… रघुवीर सहाय

Raghuvir Sahayकितने अकेले तुम रह सकते हो?
अपने जैसे कितनों को खोज सकते हो तुम?
अपने जैसे कितनों को बना सकते हो?


हम एक गरीब देश के रहने वाले हैं

इसलिए
हमारी मुठभेड़ हर वक्त रहती है ताकत से
देश के गरीब होने का मतलब है
अकड़ और अश्लीलता का

                                               हम पर हर वक्त हमला
(रघुवीर सहाय)

जनवरी 25, 2015

पूत भारत माता के… बाबा नागार्जुन

”पांच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंख्वार,

गोली खाकर एक मर गया, बाकी रह गये चार।

चार पूत भारतमाता के, चारो कुशल प्रवीन,

देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन ।

तीन पूत भारत माता के, लड़ने लग गये वो,

अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच गये दो ।

दो पूत भारत माता के, छोड़ पुरानी टेक,

चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी रह गया एक ।

एक पूत भारत माता का, कंधे पर है झंडा,

पुलिस पकड़ कर जेल ले गयी, बाकी बच गया अंडा ।”

जनवरी 5, 2014

अरविन्द केजरीवाल : पुराना सड़ा तंत्र सलीब लिए खड़ा है तुम्हारे लिए

सैयादे बागबां के तेवर बता रहे हैंarvind-001

ये लोग फस्लेगुल के कपड़े उतार लेंगे|

तुम सरीखे नई बात बोलने और करने वालों पर भी उपरोक्त शेर मौजूं बैठता है|

ये घाघ बहेलिये, खेले खाए चिडीमार तुम्हे आजाद पंछी की तरह कैसे उड़ने दे सकते हैं? ये तुम्हे कहीं न कहीं कैसे भी पकड़ने और अपने हाथों सजा देने का प्रयास करते रहेंगे|

गलती तुम्हारी है तुम क्यों शिकारियों और सोते हुए शिकारों के मध्य लालटेन लेकर खड़े हो गये और हुंकार भरने लगे कि शिकारों को जगाऊँगा… शिकारियों को भगाऊँगा|

अब भुगतो!

आराम से जनतंत्र में लूट का मजा ले रहे बलियों,  महाबलियों और बाहुबलियों को ललकारोगे तो क्या वे चुप बैठे रहेंगे? नहीं वे अपने सामर्थ्य भर आक्रमण तुम पर करेंगे| और ये बात तो तय है ही कि टुच्चई पर ऐसी ताकतों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है बल्कि टुच्चापन ऐसे ही लोगों के कारण धरा पर जीवित है|

एक तो बहुत बड़ी गलती तुमने दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान कर दी जब तुमने जाति,सम्प्रदाय और क्षेत्रवाद की गंदगी से लबलबाती राजनीति में मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू प्रत्याशी चुनाव में उतार दिए, एक क्षेत्र के बहुमत से घिरे इलाकों में दूसरे क्षेत्र के प्रत्याशी खड़े कर दिए और उनमें से बहुत से जीत भी गये और जो हारे भी वे भी अधिक से अधिक दो हजार मतों से हारे| इन् तत्वों वाली ध्रुवीकरण से बजबजाती राजनीति करके जनतंत्र पर कब्जा करे बैठे लोगों की नींद उड़ाने का गुनाह तुमने किया ही अब सजा भुगतो|

अभी तुम देखते जाओ अभी तो ट्रेलर भी पूरा नहीं हुआ है| पूरी फिल्म तो शुरू होनी बाकी है|

तुम पर हर ओर से आक्रमण किया जाएगा| तुम्हे हर संभव तरीके से बदनाम किया जाएगा|

शपथ लेते समय तुमने ऊनी स्वेटर और मफलर क्यों पहना था जबकि आम आदमी को ऊनी कपड़े मयस्सर नहीं होते|

तुम फलां फलां रंग के कपड़े क्यों पहनते हो?

तुम ऐसा क्यों खाते हो वैसा क्यों गाते हो| गाना न आने के बावजूद तुमने हिम्मत कैसे की कवि प्रदीप के लिखे गीत को हजारों लोगों की भीड़ के सामने की| तुम अभी तक अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों के साथ ४ कमरों के फ़्लैट में रहते रहे हो तो तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी आई.ऐ.एस अधिकारियों को मिलने वाले ५ कमरों के फ़्लैट में रहने जाने की मंजूरी देने की? इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा सचिव वहीं किसी ऐसे ही मकान में रहता होगा|

सुनो, तुम्हे तो ट्री-हॉउस में रहना चाहिए था जहां आराम से गुलेल या हाथों से ये शिकारी लोग पत्थर मारते रहते|

कैसी कैसी गलतियां तुम करते हो? तुमसे बौखलाए ये लोग तुम पर आक्रमण करेंगे ही| इंडिया शाइनिंग जैसे मनलुभावन नारों के बावजूद पिछले दस सालों से विपक्ष में बैठी भाजपा को पूरा यकीन था कि इस बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे और भाजपा को पूर्ण बहुमत अपने बल पर मिल जाएगा और तुमने बीच में घुसकर संदेह उत्पन्न कर दिया और उनके हवाई मिशन, जिसे प्रोपेगंडा के बल पर वे विस्तार देते जा रहे थे, की हवा निकलने लगी| तुम्हारी वजह से भाजपा ४ सीट पीछे रह गयी दिल्ली में बहुमत से और पन्द्रह साल से विपक्षी बने रहने की अपनी नियति को इस बार भी न बदल पाई| उसे तो तुम पर आक्रमण करने ही हैं|

जनता का एक बहुत बड़ा तबका निराशावादिता नामक बीमारी से इस कदर ग्रस्त हो चुका है कि उसे अपने से अच्छा कोई भी आदमी अच्छा ही नहीं लगता| निराशा ने इन लोगों को परपीड़ा में आनंद लेने वाला बना दिया है| ऐसे लोगों की भीड़ कभी नहीं चाहेगी कि भारत के हालात सुधरें और लोगों का जीवन स्तर सुधरे, देश में चारों ओर ईमानदारी का वास हो क्योंकि अगर सब कुछ अच्छा होने लगा तो वे निंदा किसकी करेंगे और अपने जीवन में कठिनाइयों से उत्पन्न पीड़ा का आनंद कैसे उठाएंगे? वे तो बस इन्तजार कर रहे हैं कि तुम थको, हारो, और तुम पर कालिख पोत दी जाए जिससे घायल होकर जब तुम धरती पर पड़े हो तो वे दूर से तुम पर पत्थर, गालियाँ, और व्यर्थ चीजें फेंककर अपने मनपसंद संवाद बोल सकें और तुम पर लानत भेज सकें और कह सकें – धिक्कार है तुम पर, बहुत महारथी बनने चले थे अब देखो क्या हाल हो गया है तुम्हारा|

तुम्हे हारा देख कर ये सेडिस्ट आनंद में ठहाका लगा कर हंस सकेंगे और अगले ही दिन से देश, व्यक्ति निंदा के अपने मनपसंद दैनिक कार्य में लग जायेंगे और राग अलापने लगेंगे – इस देश का कुछ नहीं हो सकता यह तो ऐसे ही चलेगा, यहाँ कभी कुछ नहीं सुधर सकता, यहाँ तो भ्रष्टाचार और गरीबी हमेशा रही है और रहेगी|

ऐसी ऐसी संस्थाएं और उनके सदस्य तुम पर आक्रमण करेंगे और तुम्हे हारा देख खुश होंगे जो अपने को औरों से ज्यादा बड़ा देशभक्त घोषित करते नहीं अघाते| उनके लिए देशभक्ति के काम वही हैं जो वे करते हैं| जो वे सोच सकते हैं बस वही देश के लिए श्रेयस्कर है| उनके अलावा बाकी सब लोग देशद्रोही हैं|

उनके लिए तुम भी देशद्रोहियों की जमात में ही आते हो|

ये सब प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाले और भूमिगत रूप से ही भारत पर नियंत्रण करने वाले लोग तुम्हे हारा हुआ देखना चाहते हैं|

ये तुम्हे सूली चढ़ा कर ही शान्ति पाएंगे|

इनके आक्रमण रोज तीव्र से तीव्रतर होते जायेंगे|

पर एक बात समझ लो, देश भर में जनता का एक तबका ऐसा भी है जिसे तुम पर पूरा विश्वास है| वे चाहते हैं तुम जीतो और इस देश में सुधार लाने के लिए निमित्त बनो| वे अपने सामर्थ्य भर तुम्हारे और तुम्हारे प्रयासों के साथ हैं| वे प्रयास रत हैं क्रान्ति के इस बीज को सम्पूर्ण देश में व्यापक स्तर पर फैलाने के लिए|

कभी इस क्रान्ति की सफलता पर संदेह मत करना| तुम फ़िक्र मत करना योद्धा…

हर वक्त है इम्तहां का

ये दस्तूर है जहां का

नवम्बर 11, 2013

कहाँ हैं इस किताब के खरीदार

किताबों से भरी दुकान थी –books-001

मेरी जेब खाली थीं

खाली जेब की उपयोगिता पढ़ी थी

कुछ किताबों में ही!

किताबें कई थीं –

सुन्दर, अच्छी, गंदी, फूहड़…

उस गंदे से आदमी ने खरीदी

एक गंदी सी किताब|

युवती ने पर्स खोलकर

 सुंदर किताबों के मूल्य चुकाए|

गंदे बहुत से,

किताबें भी …

उनके पास नोट थे,

कागज़ के मैले-कुचले, मुड़े-तुड़े

पर दुकानदार को तो नोट से मतलब था

ग्राहक को चित्रों से|

दूकान के बाहर मैंने चर्चा की “देश” की|

अच्छी किताब है, अच्छी किताब है, पर ‘मोटी’ है –

लोगों ने ‘हाँ’ भी की थी,

सब सहमत थे मुझसे –

फिर सब अपनी अपनी पसंद की किताबों

की तरफ बढ़ गये

कन्याओं के एक झुण्ड ने

सुंदर चित्रों वाली फैशन की किताबें खरीदीं

मैं…खड़ा रहा… गुमसुम…

मैं किताब न खरीद सका…

मेरी जेबें खाली थीं…

भरी जेबों ने वह किताब नहीं खरीदी!

शायद,

उन्हें मनोरंजन की तलाश थी!

Yugalsign1

जुलाई 3, 2011

मैं और मेरी प्रवासी दुनिया

मेरे साथ था एक छोटा-मोटा जुलूस
जब मैंने पहली बार
छोड़ा था देश
नादान दोस्तों से लेकर
दानेदार दुश्मन तक
सभी आये थे
स्टेशन तक छोड़ने मुझे।
आँखों में आँसू
और उनके आगे थी मेरी धुँधलाती दुनिया
जो ट्रेन के चलते ही
दिखने लगी थी साफ-साफ।

फूल मालायें और
बाहों के बंधन
सब कुछ बहुत भावुक
और बहुत करुण था।

मैंने आखिर तक
की भी बहुत कोशिश
कि माँ ने जो
विदा के समय लगाया था तिलक
दही और चावल का
वह पुछ न पाये।

मगर क्या हो पाया वैसा
जहाज में चढ़ने से पहले
बहुत जोर से उठी हूक
उमड़े आँसू और फिर
धूमिल होने लगीं
धीरे-धीरे करुण कठोर स्मृतियाँ।

बरस-दर-बरस
गये बीत
आते जाते हिंदुस्तान
आना जाना मेरा
बन गया एक ढ़र्रा
अब न कोई
एयरपोर्ट आता है
न स्टेशन।

अब नहीं लिखता कोई
मुझे याद करते भीगे पत्र
नहीं भेजता कोई
नव वर्ष का कार्ड
और अपनी ताज़ा तस्वीर।

बरसों बीत गये
यह वक्त्त एक युग से कम तो नहीं!
नहीं मालूम मुझे
कि मैं और मेरी दुनिया में
कौन हो गया है अकेला।

{कृष्ण बिहारी}

मई 30, 2011

अमृता प्रीतम का पता

रसीदी टिकट नामक आत्मकथा लिखने वाली अमृता प्रीतम संक्षिप्त में इस कविता में वह सब कह जाती हैं जिसे प्रदर्शित करने के लिये एक निबंधकार शायद कुछ हजार शब्दों का जमावड़ा कर देगा। कलाकार साधारण मानव की समझ वाली परिभाषाओं के बंधनों से परे चले जाते हैं। उन्मुक्त्त आत्मा की उदआन को दर्साती है यह कविता।

आज मैंने अपने घर का नम्बर हटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे जरुर पाना है
तो हर देश के
हर शहर की
हर गली का
द्वार खटखटाओ
यह एक श्राप है
एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रुह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है

(अमृता प्रीतम)

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