Posts tagged ‘Democracy’

जुलाई 24, 2017

बौनों की दुनिया …

 

हम सब बौने हैं,

मन से, मस्तिष्क से भी,

बुद्धि से, विवेक से भी,

क्योंकि हम जन हैं

साधारण हैं

नहीं हैं विशिष्ट

— क्योंकि हर ज़माना ही

चाहता है बौने रहें

वरना मिलेंगें कहाँ

वक्ता को श्रोता

नेता को पिछलगुए

बुद्धिजनों को पाठक

आंदोलनों को भीड़

धर्मों को भक्त

संप्रदायों को अतिमन्द

राज्यों को क्लर्क

कारखानों को मजदूर

तोपों को भोजन

पार्टी-बॉसों को यसमैन

राजाओं को गुलाम

डिक्टेटरों को अंधे

डिमोक्रेसी को मीडियोकर

मतवादों को बुद्धू

यूथ-वादों को सांचे ढले आदमी

हम सब उन्ही के लिए

युग-युग से जीते हैं

क्रीतदास हैं हम

इतिहास-वसन सीते हैं

इतिहास उनका है

हम सब तो स्याही हैं

विजय सभी उनकी

हम घायल सिपाही हैं

हमको हमेशा ही

घायल भी रहना

सिपाही भी रहना है

दैत्यों के काम निभा

बौने ही रहना है|

 

(गिरिजाकुमार माथुर)

 

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अगस्त 9, 2016

रूरल डेवेलपमेंट … (महात्मा गाँधी)

“भारत गाँवों में बसता है, अगर गाँव नष्ट होते हैं तो भारत भी नष्ट हो जायेगा|

इंसान का जन्म जंगल में रहने के लिए नहीं हुआ बल्कि समाज में रहने के लिए हुआ है|

एक आदर्श समाज की आधारभूत ईकाई के रूप में हम एक ऐसे गाँव की कल्पना कर सकते हैं जो कि अपने आप में तो स्व-निर्भरता से परिपूर्ण हो, पर जहां लोग पारस्परिक निर्भरता की डोर से बंधे हुए हों| इस तरह का विचार पूरे संसार में फैले मानवों के बीच एक संबंध कायम करने की तस्वीर प्रस्तुत करता है|

ऐसा कुछ भी शहरों को उत्पादित करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए जो कि हमारे गाँव उत्पादित कर सकते हों|

स्वतंत्रता बिल्कुल नीचे के पायदान से आरम्भ होनी चाहिए|

और इसीलिए हरेक गाँव को स्व:निर्भर होना ही चाहिए और इसके पास अपने सभी मामले स्वंय ही सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए|

गांवों की ओर लौटना ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है|

मेरा आदर्श गाँव मेरी कल्पना में वास करता है|

एक ग्रामीण को ऐसे जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए जैसे किसी मलिन अँधेरे कमरे में कोई जानवर रहता है|

मेरे आदर्श गाँव में मलेरिया, हैजा और चेचक जैसी बीमारियों के लिए कोई जगह नहीं होगी| वहाँ कोई भी सुस्ती, काहिली से घिरा और ऐश्वर्य भोगने वाला जीवन नहीं जियेगा|

मेरा स्पष्ट विचार है कि यदि भारत को सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और भारत के माध्यम से पूरे संसार को सच्ची स्वतंत्रता का स्वाद चखना है तो हमें गाँवों में झोंपडों में ही रहना होगा न कि महलों में|

गाँव की पंचायत स्थानीय सरकार चलाएगी| और इनके पास पूर्ण अधिकार होंगे| पंचायत के पास जितने ज्यादा अधिकार होंगे उतना लोगों के लिए अच्छा होगा|

पंचायतों का दायित्व होगा कि वे ईमानदारी कायम करें और उधोगों की स्थापना करें|

पंचायत का कर्तव्य होगा कि वह ग्रामीणों को सिखाये कि वे विवादों से दूर रहें और उन्हें स्थानीय स्तर पर ही सुलझा लें|

यदि हमने सच्चे रूप में पंचायती राज की स्थापना कर दी तो हम देखेंगें कि एक सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा और जहां पर कि सबसे नीची पायदान पर खड़ा भारतीय भी ऊँचे स्थानों पर बैठे शासकों के समां बर्ताव और अधिकार पायेगा|

मेरे आदर्श गाँव में परम्परागत तरीके से स्वच्छता के ऊँचे मानदंड स्थापित होंगे जहां मानव और पशु जनित कुछ भी ऐसी सामग्री व्यर्थ नहीं फेंकी जायेगी जो कि वातावरण को गंदा करे|

पांच मील के घेरे के अंतर्गत उपलब्ध सामग्री से ही ऐसे घर बनाए जायेंगें जो कि प्राकृतिक रूप से ही हवा और रोशनी से भरपूर हों| इन घरों के प्रांगणों में इतनी जगह होगी कि ग्रामीण वहाँ अपने उपयोग के लिए सब्जियां उगा सकें और अपने पशु रख सकें|

गावों की गालियाँ साफ़ सुथरी और धूल से मुक्त होंगी|  हर गाँव में पर्याप्त मात्रा में कुंएं होंगे जिन तक हर गांववासी की पहुँच होगी|

सभी ग्रामीण बिना किसी भेदभाव और भय के पूजा अर्चना कर सकें ऐसे पूजा स्थल होंगें| सभी लोगों के उठने बैठने के लिए एक सार्वजनिक स्थान होगा| पशुओं के चारा चरने के लिए मैदान होंगे| सहकारी डेरी होगी| प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूल होंगे जहां व्यावहारिक क्राफ्ट्स और ग्राम-उधोगों की पढ़ाई मुख्य होगी| गाँव की अपनी एक पंचायत होगी जो इसके सभी मामले सुलझाएगी| हरेक गानव अपने उपयोग के लिए दूध, अनाज, सब्जियों, फलों और खाड़ी एवं सूती वस्त्रों का उत्पादन करेगा|

सबको इस बात में गर्व महसूस करना चाहिए कि वे कहीं भी और कभी भी उन उपलध वस्तुओं का प्रयोग करते है जो गाँवों में निर्मित की गयी हैं| अगर ठीक ढंग से प्रबंधन किया जाए तो गाँव हमारी जरुरत की सभी वस्तुएं हमें बना कर दे सकते हैं| अगर हम एक बार गानव को अपने दिल और दिमाग में स्थान दे देंगें तो हम पश्चिम का अंधा अनुकरण नहीं करेंगें और मशीनी औधोगीकरण की ओर अंधे बन कर नहीं भागेंगें|”

 

जून 5, 2014

लोकतंत्र … James Mercer ‘Langston Hughes’

लोकतंत्र नहीं आएगा Langston Hughes

आज,

इस साल,

या और कभी

…समझौतों और भय के द्वारा तो कभी नहीं आएगा! 

 

मेरा भी उतना ही अधिकार है

जैसे किसी और का है

अपने पैरों पर खड़े होने का

और जमीन का टुकड़ा लेने का!

 मैं थक जाता हूँ

लोगों को कहता पाकर –

कि सभी बातों को वक्त लेने दो,

वे खुद से हो जाएँगी

कल किसने देखा है?

मुझे मरने के बाद स्वतंत्रता नहीं चाहिए

मैं कल के सपन पर जिंदा नहीं रह सकता!

स्वतंत्रता

एक बेहद शक्तिशाली बीज है

को कि

बोया जाता है

सबसे ज्यादा जरुरत के समय! 

मैं भी यहाँ रहता हूँ

मुझे स्वतंत्रता चाहिए

जैसे कि तुम्हे चाहिए!

–  Langston Hughes –

(February 1, 1902 – May 22, 1967)


 

जनवरी 4, 2014

अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी का गठबंधन

Arvind Kejriwalनेक ने नेक, बद ने बद जाना मुझे

अपने अपने तौर पे सबने पहचाना मुझे

यह कहना पर्याप्त होगा कि अरविन्द केजरीवाल अपने प्रति पुराने नेताओं के रुख और ‘आम आदमी पार्टी‘ के प्रति पुराने दलों के रुख को देखते हुए उपरोक्त्त शेर आराम से कह सकते हैं|

अरविन्द केजरीवाल किसी हवाई छतरी से भारतीय राजनीति में नहीं टपकाए गये हैं| नीचे दिए गये वीडियो को देखें तो उन्होंने किस तरह की खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक चहलकदमी से अब तक की अपनी दूरी तय की है, यह स्पष्ट हो जाता है|

उनका भाषण बता देता है वे मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल रहे थे| जबकि लगभग पूरा देश मान चुका था कि भारत में भ्रष्टाचार पूरी तरह से जड़ें जमा चुका है और भारतीय राजनीति और तंत्र, दोनों इस कदर भ्रष्ट हो चुके हैं कि ईमानदार व्यक्ति का सिर उठने का कोई अवसर ही नहीं बचता और ईमानदारी को पनपने के लिए इंच भर भी जमीन मुहैया नहीं हो सकती तब भारतीय राजनीतिक एवं प्रशासनिक तंत्र और वर्ल्ड बैंक के नापाक गठबंधन की बातें करना एक बड़ा ख़तरा मोल लेने वाली बात है|

जमे तंत्र के खिलाफ जाने वाली नई बात कहने और करने वाले व्यक्ति को जम कर गालियाँ तंत्र से लाभान्वित लोगों से मिलती हैं और अरविन्द केजरीवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ| उन्हें हर तरह की गालियाँ कांग्रेस, भाजपा और तमाम अन्य राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों द्वारा दी गईं पर वे ऐसे हमलों से प्रभावित हुए बिना अपने चुने हुए पथ पर आगे बढते रहे और जनता का ऐसा बहुत बड़ा तबका होगा जो कभी अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों पर हमलों और राजनीतिक विरोधियों द्वारा उनका उपहास उड़ाने के प्रयासों से प्रभावित होकर उनके और ‘आप‘ के प्रति संशय रखता था, पर मुमकिन है कि अब उनकी ओर आशा की दृष्टि से देखने लगा हो|

पुरानी राजनीति का सुख भोग रहे नेताओं की बात छोड़ भी दें तो बहुत से लोग भी इस बात के लिए अरविन्द केजरीवाल की आलोचना करते थे और उनका उपहास उड़ाते थे कि वे क्यों राजनीति में आ गये और उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के लाभ को सीधी की तरह राजनीति में ऊपर उठने में किया| ऐसे आलोचक भूल रहे थे कि भारतीय लोकतंत्र में भ्रष्टाचार इस हद तक स्वीकार्य हो चुका था कि केवल बाहर से आंदोलन करके इसका उन्मूलन संभव रह ही नहीं गया था| ईमानदार की स्वीकृति की बात तो छोड़ ही देनी बेहतर है, कोई अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ भी बोलता था तो उसे अजीबोगरीब दृष्टि से देखा जाता था और ऐसा माना जाने लगा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने वाला आदमी बिना मतलब सबको परेशान कर रहा है और तंत्र के चलने में अड़ंगा अलगा रहा है|

अगर भ्रष्ट नेता ही हर बार संसद और विधानसभाओं में पहुँचते रहेंगे और वे ही सबसे बड़े पदों पर बैठे रहेंगे तब कैसे कोई संस्था ईमानदारी से काम कर सकती है| भारत में अब तक यही गलती होती रही कि भ्रष्टाचार के खिलाफ तो बातें होती रहीं पर समस्या की जड़ भ्रष्ट राजनीति और इसके पोषक और इसके द्वारा पोषित तत्वों के उन्मूलन की ओर ठोस कदम नहीं उठाये गये| अच्छे संवेदनशील विचारक और पत्रकार लोग भी सहानुभूति दर्शाते हुए पाए जाते थे कि इन् लोगों के इरादे तो नेक हैं पर राजनीति में इन्हें नहीं आना चाहिए था| दीवार पर इबारत साफ़ साफ़ लिखी थी कि अब राजनीति में आए बिना देश से और इसकी राजनीति से भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं किया जा सकता|

अरविन्द केजरीवाल द्वारा राजनीतिक दल बनाकर राजनीति में उतरने से सबसे बड़ा लाभ तो प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई दे रहा है कि जिस युवावर्ग को लोग हल्केपन से ग्रसित मानकर नकार दिया करते थे और जो खुद भी बात बात में – ‘आई हेट पोलिटिक्स‘ की तोता रटंत लगाए रहता था उसने देश की राजनीति को समझने की ओर कदम बढाए और इसमें हिस्सा भी लेना शुरू किया| लोकतंत्र में राजनीति से घृणा कर सकते हैं लोग?

भारत में शोध का विषय है कि यह विचार कैसे जन सामान्य में फैलाया गया कि राजनीति में रूचि लेने से कुछ होने वाला नहीं है| शुरुआती विचार एक बड़े भारी षड्यंत्र की ओर इशारा करता है| कम लोग मत डालेंगे तो फैसला विभिन्न दलों के अंध समर्थकों के बीच ही होता रहेगा| अगर आम जनता का एक बहुत बड़ा तबका जो अपने भले बुरे की और देश के लिए क्या अच्छा है उसकी समझ रखता है वो अगर मत डालने बाहर निकलेगा तो दलों के अंध समर्थकों की चालें गौण बन जाती हैं और लोकतंत्र स्वस्थ बनता है|

अरविन्द केजरीवाल और उनके राजनीतिक दल ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव के माध्यम से आमजन की भागीदारी को प्रेरित किया है| आगे ये लोग कुछ ना भी कर पायें या भ्रष्ट तंत्र इन्हें भी निगल ले तब भी भारतीय लोकतंत्र सदैव उनके इस कदम का ऋणी रहेगा| अब यह जागृति वापिस नहीं हो पायेगी और यह विस्तार पाती रहेगी और अधिक से अधिक लोगों को नींद से जगाकर लोकतंत्र की रखवाली का रक्षक बनाती रहेगी|

यही जागृत जनता अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों को भी आईना दिखा देगी अगर इन्होने तिरछा चलने की कोशिश भी की| इन्हें तो जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ कहीं से भी कमजोर पड़ने की इजाज़त भी नहीं देगी|

दिल्ली विधानसभा के पास तो इतने अधिकार हैं नहीं लेकिन कुछ मामलों में ‘आपदिल्ली में आदर्श सरकार की तरह स्थापना कर सकती है और दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण का कार्य कर सकती है| हो सकता है कल को देश भर में ‘आप‘ का फैलाव हो या अलग अलग राज्यों में स्वतः प्रेरणा पाकर ऐसे अन्य दल सतह पर उभरें और देश भर की तस्वीर बदल कर रख दें| बदलाव लाने वाले लोग भी भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा ना बन जाएँ इसके लिए बहुत जरूरी है

– राजनीतिक दलों को आर.टी.आई के अंतर्गत लाया जाए|

– जैसे ‘आप’ ने पार्टी को मिले चंदे की एक एक पाई का हिसाब अपनी वेबसाईट के माध्यम से जनता को दिखाया वैसे ही अन्य दलों को ऐसा करने के लिए विवश किया जाना चाहिए|

आप‘ द्वारा सुझाए गये कदम – जनता को भ्रष्टाचार में लिप्त या निकम्मे सांसद या विधायक को वापिस बुलाने का अधिकार दिया जाना, लोकपाल या ऐसी ही कोई स्वतंत्र संस्था की स्थापना जो बड़े से बड़े संवैधानिक पर पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामलों की स्वतंत्र रूप से जांच और उचित कार्यवाही कर सके आदि सही कदम हैं जो आज के हालात में भ्रष्टाचार से बीमार हो चुकी भारतीय राजनीति के इलाज के लिए जीवन रक्षक औषधियां हैं| हो सकता है ये कदम रामबाण औषधियां न हों| पर ये एक शुरुआत तो करते ही हैं| हम क्यों एक ही बार में सौ प्रतिशत सफलता पाने के आग्रही बन जाते हैं और किसी भी मामले को शुरू ही नहीं होने देते| जैसे जैसे ये कदम लिए जायेंगे इनमें जरुरत के मुताबिक़ सुधार होते रहेंगे| कोई मृत देश तो है नहीं भारत कि एक बार कुछ करके आगे किसी और बात की गुंजाइश ही नहीं बचेगी| एक से बढ़कर एक आला दिमाग यहाँ जन्म लेते रहे हैं और भारतीय राजनीति स्वच्छ हो गई तो इस देश की विकास करने के मामले में ऊंची और लंबी छलांग को दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती|

राजनीति किसी भी देश की सामूहिक दिमागी हालात का पैरामीटर है| अगर यह सही है तो सब कुछ सही चलता है और अगर यही रुग्ण है तो देश तो बीमार रहेगा ही|

आज तक देश ने यही देखा था कि शपथ ग्रहण समारोह के दौरान या उसके बाद नेता लोग अपने दलों के आलाकमान या मुखियाओं को धन्यावाद दिया करते थे और ऐसा ही लगता था जैसे लोग हिंदी फिल्म उधोग के पुरस्कार समारोह को देख रहे हैं जहां लगभग सभी कुछ नाते रिश्तेदारों में ही बाँट दिया जाता है और सितारे भी मम्मी पापा, अंकल आंटी, ब्रदर्स और सिस्टर्स को धन्यवाद देते रहते हैं|

अरविन्द केजरीवाल ने ‘आम आदमी‘ को धन्यवाद दिया अपने सम्बोधन में| अरविन्द केजरीवाल की राजनीति ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आम आदमी की भागदारी को बढ़ाया है| कुछ बरस पहले एक हिंदी फिल्म आयी थी “A Wednesday” जिसमें देश में पैदा हुए सबसे अच्छे अभिनेताओं में से एक नसीरूद्दीन शाह ने एक ‘आम आदमी’ बनकर पूरे तंत्र को सिर के बल खड़ा कर दिया था पर उन्हें किन्ही खास जगहों पर ‘बम’ रखने की धमकी देनी पड़ी थी और क़ानून ने विवश होकर खुद ही उन आतंकवादियों को मार दिया था जिन्हें राजनेता शायद ब्लैकमेलिंग के कारण या कमजोर मानसिकता के कारण छोड़ देते|

अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों ने नक्सलियों का पथ नहीं अपनाया उन्होंने लोकतान्त्रिक और अहिंसक तरीके से देश में अच्छी बदलाव ला सकने की आशा का संचार किया है और यह उनका दूसरा सबसे बड़ा योगदान है आधुनिक भारत के प्रति|

कांग्रेस और भाजपा जैसे दलों के खिसयाने के अपने कारण हैं, जो सभी के सामने स्पष्ट हैं, अतः उनके नेताओं, उनकी प्रोपेगंडा विभागों और उनके अंध समर्थकों के अरविन्द केजरीवाल और ‘आप‘ पर लगातार हो रहे हमलों पर ध्यान देना भी समय नष्ट करने की मूर्खता होगी|

दिल्ली विधानसभा में विश्वास मत से पूर्व हुयी बहस को यदि याद किया जाए तो दो बातें साफ़ साफ़ उभर कर आयीं| नेता विपक्ष के रूप में डा. हर्षवर्द्धन का अनर्गल प्रलाप रूपी भाषण कहीं से भी इस बात की गवाही नहीं देता कि भाजपा एक रचनात्मक विपक्ष निभाने की कथनी को करनी का अमली जामा पहनाएगी| यह सिर्फ कहने की बात है| उसका एक ही मकसद होगा कि अरविन्द केजरीवाल और ‘आप‘ के अन्य मंत्रियों को इतना बदनाम कर दिया जाए जिससे दिल्ली नगरपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार में लिप्त उसके नेताओं पर कोई आंच न आए|

विधानसभा में हुई बहस में सबसे रोचक नजारा था कांग्रेसी नेता अरविंदर सिंह लवली के भाषण के दौरान भाजपा नेताओं का व्यवहार| लवली लगातार भाजपा नेताओं की टांग खींच रहे थे पर बाहर जनता में कांग्रेस के घोषित विरोधी होने का नाटक करते भाजपाई नेता लवली की बातों पर न्योछावर होकर हंस रहे थे| ऐसी समझ तभी आती है जब वे अंदर से काफी नजदीकी रूप से जुड़े हुए हों| ‘आप‘ की इस बात में बहुत दम है कि अंदरखाने कांग्रेस और भाजपा नेता मिले हुए हैं और इनमें एक समझ बनी हुयी है कि बाहर जनता में दिए भाषणों में कुछ भी कह लिया जाए पर कार्यवाही के स्तर पर एक दल अन्य दलों के नेताओं और उनके परिवार के लोगों के भ्रष्टाचार पर कोई कार्यवाही नहीं करेगा|

राजनीति इन् लोगों का खानदानी व्यवसाय बन चुका है अतः वे ऐसा जोखिम नहीं उठा सकते कि राजनीति में ईमानदार लोग आ जाएँ और इनके हितों पर ईमानदारी से प्रहार करने लगें|

अरविन्द  केजरीवाल और उनके साथियों को चुनाव लड़ने और संसद और विधानसभा में आकर क़ानून बनाने की चुनौती देने के पीछे राजनेताओं का दंभ बोल रहा अथा क्योंकि उन्हें पता था कि उनके पास तो बेशुमार दौलत है चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाने को ये फक्कड लोग कहाँ से उनका मुकाबला कर पायेंगे| पर अरविन्द केजरीवाल और उनके दल ने आम आदमी की भागीदारी बढ़ाकर सिद्ध कर दिया कि नियत और जूनून हमेशा ही पैसे और जुगाड पर भारी पड़ेगा| दिल्ली विधानसभा के चुनाव की सबसे बड़ी खासियत ही इसे साथ में होने वाले अन्य राज्यों के चुनावों से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है|

अन्य राज्यों में वही बंदरबांट थी कि कांग्रेस को हराना है तो भाजपा को ले आओ, क्योंकि कोई विकल्प नहीं था| दिल्ली में ‘आप‘ ने विकल्प दिया और जनता ने जता दिया कि अगर उन्हें ऐसे ही विकल्प मिला तो वह दिन दूर नहीं जब देश भर में ऐसे परिवर्तन की बयार बहेगी|

जरूरी नहीं कि लोकसभा चुनाव में इतना कम समय रहने के कारण ‘आप‘ को ऐसी सफलता मिल ही जाए जैसी उसे दिल्ली में मिली पर उसे जितनी भी सफलता मिलेगी वह धनात्मक असर ही डालेगी भारतीय राजनीति पर| ‘आप‘ वहाँ खड़ी है जहां उसकी चुनावी असफलता भी भारतीय राजनीति पर स्वच्छ होने का दबाव डालेगी ही डालेगी|

देश दुश्मन नहीं बन गया है कांग्रेस, भाजपा और अन्य स्थापित दलों का पर अगर वे जनहित में अपने स्वरूपों को अपने दृष्टिकोणों को और अपने आचार व्यवहार को नहीं बदलते तो उन्हें हाशिए पर जाना ही पड़ेगा|

‘आप’ के नेता और आला दर्जे के विद्वान योगेन्द्र यादव सही कहते हैं – “Narendra Modi is substitute, ‘AAP’ an alternative” [नरेंद्र मोदी केवल  स्थानापन्न (कार्यवाहक उपस्थिति मात्र) हैं, जबकि ‘आप’ विकल्प है]

इसी रूप में कांग्रेस और भाजपा देश में वही करेंगे जो वे करती आ रही हैं सालों से| वे कुछ नया नहीं करने जा रहे क्योंकि नया करने का विज़न उनके पास नहीं है| नया करने के लिए आम आदमी और उसकी मुश्किलों से जुड़ाव चाहिए जो ये बड़े दल खो चुके हैं|

आम आदमी की लोकतंत्र में बढ़ती भागीदारी के साथ साथ उस पर स्वाध्याय की जिम्मेदारी अपने आप आ जाती है| संभावना बेहद कम है पर आम आदमी को इतना जागरूक और बुद्धिमान होना पड़ेगा जहां अरविन्द केजरीवाल और ‘आप‘ अगर चालाकी करें या सुस्त पड़ें तो वे इन लोगों को भी पुनः रास्ते पर ले आएं|

आम आदमी के लिए एक ही सूत्र होना चाहिए अब –

अपने ही हाथों में पतवार संभाली जाए

तब तो मुमकिन है कि ये नाव बचा ली जाए

अप्रैल 6, 2011

इस मुल्क में हमारी हुकुमत नहीं रही (दुष्यंत कुमार)


ये कैसा भारत बना लिया है हमने कि देश के स्वास्थ्य को कोढ़ की तरह खाकर मृत्यु शैय्या पर ले जाने वाले भ्रष्टाचार का जड़ से समूल विनाश करने के लिये ईमानदार भारतीय चाहते हैं कि कदम उठाये जायें और लोकतंत्र (जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन) के नाम पर राजसुख भोगने वाले नेतागण और अधिकारीगण तरह तरह की चालाकियाँ दिखा रहे हैं जिससे कि जनहित वाला लोकपाल विधेयक विधिवत रुप से कार्यकारी न हो जाये। ऐसा हो गया तो उनके विशाल उदरों में काले धन की पूर्ति कैसे होगी? जनता चाहती है कि लोकपाल विधेयक अपने संशोधित रुप में जारी हो और नेता और अधिकारी इस जिम्मेदारी से मुँह चुरा रहे हैं।
किसी सभ्य लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं हुआ होगा जैसा भारत में हो रहा है। लोकतंत्र में जनता जो लोकहित में चाहती है वैसा करना सरकारों का कर्त्तव्य होता है।
आज भारत उस मोड़ पर आकर खड़ा है जब अगर अभी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता सामुहिक रुप से न उठी तो फितर यह इस देश से कभी भी रुखसती न पा पायेगा और ऐसे ही दैनिक जीवन का अपरिहार्य अंग बने रह कर इस पावन देश का नाश कर देगा।
कोई आश्चर्य नहीं कि अगर भविष्य में कोई सच्चा मनुष्य दुखी होकर चित्कार कर बैठे

दुनिया में अगर कहीं नर्क है
तो बस यहीं (भारत) है यहीं है!

क्रिकेट जैसे व्यवसायिक खेल के प्रति गजब की एकजुटता दिखाने वाले भारतीय, और खासकर इसकी युवा पीढ़ी, जिसमें करोड़ों युवा आते हैं, अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसी ही एकजुटता दिखा दें तो भारत के धनी से धनी, शक्तिशाली से शक्तिशाली, बड़े से बड़े लोग सात दिनों के अंदर घुटनों के बल बैठे मिलेंगे।

युवा पीढ़ी का सुंदर भविष्य निर्भर करता है इस बात पर कि उनका देश कितना ईमानदार है क्योंकि ईमानदार माहौल में ही वे अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं। भ्रष्टाचार मुक्त माहौल में वे अपने नये से नये विचारों को फलीभूत होते देखने का प्रयास कर सकते हैं। भ्रष्टाचार लील लेता है युवा पीढ़ी के अरमानों को।

भ्रष्टाचार से लड़ना आज के भारतीय युवा की सबसे बड़ी जरुरत है।

अगर आज नहीं लड़े तो फिर उन्हे एक भ्रष्ट देश के निकृष्टतम माहौल में ही बूढ़े होकर मर जाना होगा। और अगर आज भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त्त कर दिया गया तो इसकी उड़ान को दुनिया में कोई नहीं रोक सकता।

आज के आंदोलित माहौल में सबसे ज्यादा याद आते हैं तेजस्वी कवि स्व. दुष्यंत कुमार।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

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आज सड़कों पर
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आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख

एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख

ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख

स्व. दुष्यंत कुमार की आग्नेय कविताओं का पाठ

P.S. : Pic. Courtesy The Hindu

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