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सितम्बर 22, 2011

खुदकशी – मर्ज़ और दवा

बिखरे हुए सपने अपनी जिंदगी से गए
बूढ़े कुछ चश्मे आँख की रोशनी से गए
झुका हुआ एक दरख्त ठूंठ हुआ बेचारा
बेरुते फल थे टूट कर खुद-खुशी से गए

दुःख को साथी मानते कट जाता दुःख
कबीर-गालिब को पढ़ते बट जाता दुःख
तुम मोल तो करते अमूल्य जीवन का
बिन अश्रु आँखों में सिमट जाता दुःख

जलते दीपक से सीख जीने का करीना
दुनिया के आगे हँसना पीछे अश्रु पीना
सोच ये हो तेरे साथ बिताये पल जीलूँ
ये सोच गलत है तेरे बिना क्या जीना

टूटे आस तो खुदा का आसरा है बहुत
हो भरोसा तो स्वयं का सहारा है बहुत
सपनों के साथ आँखे नहीं मरा करती
देख तो सही आगे अभी रास्ता है बहुत

नफा-नुकसान, दुख-सुख, मिलना–बिछड़ना
अनुभव है जिंदगी के, इनसे सीख समझ
समय का शिकारी तो खुद तेरी टोह में है
उसके जाल में न आ, फंदों में न उलझ

(प्रेम में असफलता पाने से की गई आत्महत्या की खबर से जन्मा ख्याल)

(रफत आलम)

जुलाई 23, 2011

कल और आज

अब कोई चरवाहा
बाँसुरी की सुरीली तान पर
प्रेम गीत नहीं गाता
और न ही कोयल कूकती
चिड़िया भी बहुत कम चहचहाती है
घर की चहेती गाय
जिसका दूध कई पीढ़ियों तक
अमृत पान की तरह पिया
उसके  ढूध न देने के बाद
उसे बेकार समझकर
सडकों पर आवारा घूमने
धक्के और डंडे खाने के लिए
बेसहारा छोड़ दिया
अब कोई बच्चा भावुकता भरे स्वर में
माँ को
अम्मा कहकर नहीं पुकारता
अब खेत में स्वस्थ लहलहाती फसलें नहीं
कीटनाशकों को पीने वाली
नशीली फ़सलें उगती हैं
गांव में बड़े बूढ़ों की
अब कोई चौपाल नहीं बैठती
जिसमे कभी
सुख दुःख की बातें हुआ करती थीं
अब तो घर में
बूढ़ों को बोझ समझकर
बच्चे भी उनको धक्के मारते हैं
और कुत्ते की तरह
उनको दूर से रोटी फेंकते हैं
और जवान ये सब
मौन होकर देखतें हैं
ये सब देखकर
मेरे मन में
बस रोज यही सवाल
घूमता है कि
ये इन्सानियत की नयी उन्नति है
या फिर
उपभोक्तावाद की लादी हुयी बेबसी
कुछ भी हो
मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं कि
शरीर ढ़ोया जा रहा है
या फिर
जीवन धीरे धीरे बेमौत मर रहा है
यदि उपभोक्तावाद से बेबस व्यक्ति
केवल शरीर ढ़ो रहा है
और चेतना कहीं
अंधकार के गर्त में खो गयी है
तो यही कहना होगा कि
उपभोक्तावाद की इस भयानक आंधी में
यदि तुम चेतना के
दीपक की लौ अपने घर के अंदर भी
जलाए रख सको तो भी
सत्य तुम्हे इस साहस के लिए भी
दुगुनी हिम्मत, ताकत देगा
और तुम यह हिम्मत कर बैठोगे कि
तुम्हे शरीर ढोने वाली
उधार की ज़िंदगी नहीं
बेशक दिन में कुछ पलों के लिए ही सही
मानवीय संवेदना वाली
कुदरत की दी हुई
स्वाभाविक ज़िंदगी जीनी है!

(अश्विनी रमेश)

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