Posts tagged ‘Dagar’

दिसम्बर 3, 2013

बंद का समय

सूखी पत्तियों की फिसलन भरी डगर के पारblueumb-002

हरियाली के आँचल में

झुरमुटों के पास से

शाम का धुआँ निकल रहा है

कोई माँ, खाना बना रही है

छौनों के घर लौटने का समय हो गया है|

सड़क के किनारे बनीं छोटी-छोटी फड़ें

बाहर सजा सामान अब समेटा जा रहा है

मैले से सफ़ेद कुर्ते-पाजामे में

कैद छुटा बच्चा

पिता को सामान पकड़ा रहा है

दुकान को बंद करने का समय हो गया है|

Yugalsign1

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नवम्बर 28, 2013

उठो, समय हो गया है!

थके,manroad-001

बोझिल कदम लिए बैठा है वह

धुंए और धूल से भरी आँखें लिए

चौराहे की बैंच पर

आते-जाते परिंदों की आवाजाही

भुट्टे टूंगने की जद्दोजहद

होटल लौटने का समय हो गया है|

असमंजस के चौराहे पर

लाठी को पटक-पटक कर मारा है

छोटे-बड़े दायरों में

आवाज के वृत बनते हैं-बिगड़ते हैं

आसमान से झाँक कर,

पर कोई तो मुस्कराया है

कि-

नई डगर चलने का समय हो गया है|

Yugalsign1

फ़रवरी 20, 2013

इतने मुझको प्यारे हो तुम

जितना चिंतन कोई कुंआरा

जितना भोला कोई इशारा

जितना बंधन कोई दुलारा

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

जितनी बारिश कोई सुहानी

जितनी प्यारी कोई कहानी

जितनी डगर कोई अनजानी

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

जितना सपन कोई सीने में

जितना नशा है गम पीने में

जितना दर्द है चुप जीने में

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

{कृष्ण बिहारी}

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