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नवम्बर 1, 2013

निर्माण कृति का

क्यों निर्माण करना चाहता हूँ

उस कृति का

जो मुस्कुराये खिलखिलाये

प्रकृति के साथ

हर कदम हो पूर्ण यौवन का कदम

चले तो द्वार खुलें प्रगति के

रुकना भी हो एक विशेष

अनुभूति से परिपूर्ण

मैं जानता हूँ

मजबूर कर दिया जाऊँगा

इन्ही कुंठाओं में जीने के लिये

जो मैने खुद बुनी हैं।

ढ़केल दिया जाऊँगा उधर

जहाँ न कृति है

न मुस्कुराना है

न खिलखिलाना है

हूँ तो सिर्फ मैं

और मेरी कुंठा

फिर भी करना चाहता हूँ

निर्माण

उसी कृति का

क्योंकि मैं वह हूँ

जिसे आशा में जीना आता है।

 

( रजनीश )

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मई 27, 2010

कौन तो लिखता है, कौन तो रचता है

प्रतीत तो ऐसा ही होता है
कि यह लिखा मेरे द्वारा ही जा रहा है
पर क्या लिखने वाला वास्तव में “मैं” ही हूँ ?
मेरे देखे मेरे समझे तो,
कभी एक तीन से तेरह साल का बाल मन,
कभी चौदह से उन्नीस साल का किशोर मन,
कभी बीस से पचास साल का युवा मन,
कभी पचास से साठ साल का प्रौढ़ मन,
और कभी साठ से सौ साल का वृद्ध मन
यह सब लिखता है।
क्या यह वही “मैं” हूँ जो कि “मैं” वास्तव में हूँ?

आयु की बात को छोड़ भी दें तो
क्या यह जो मन जिसके द्वारा सब कुछ लिखा जा रहा है,
वह स्त्री है या पुरुष?
या कि वह निरपेक्ष है
इन दोनों ही जैविक अंतरों से,
इन दोनों ही भावों से,
या कि वह ऊपर उठ चुका है ऐसे किसी भी अंतर से?

यदि सब कुछ “मैं” के द्वारा ही लिखा जाता है
तो क्यों श्रद्धा भाव उमड़ता है प्रकृति के प्रति,
इस पूरी सृष्टि के प्रति
तब तब
जब जब कुछ भी बहुत अच्छा लिखा जा सकना संभव हो जाता है
और ऐसा लगता है कि मेरा तो
सारा अस्तित्व ही एक खोखली बासुंरी समान हो गया है
जिसमें कोई और ही फूँक भर कर
सुरीली तान छेड़ रहा है।

यदि सब “मैं” का भाव ही रचता है तो क्यों
एक अदभुत कृति की रचना के समय
शिल्प और शिल्पकार के बीच स्थित
द्वैत खो जाता है
और रह जाता है केवल
“एक” का भाव।
इस अद्वैत के भाव को या तो “मैं” कह लो या
“वह” कह लो
पर इस “मैं” में “वह” भी है
बल्कि “वह” ही महत्वपूर्ण है
और उस “वह” में “मैं” का भी समावेश है

पर एक बात विनीत भाव से सामने आती है
यह “मैं” वही नहीं है
जो कि यह बताता चलता है
कि अरे सब तुमने ही तो किया है।

बहुत कुछ ऐसा रचा जाता है
जो जन्म तो लेता है
पर उसे जन्माया नहीं जाता
उसे जन्माया नहीं जा सकता
वह तो बस ऐसे ही उतरता है
मानस की शुद्धतम अवस्था में
जैसे कि बाकी सब रचनायें उतर रही हैं
प्रकृति में
प्रकृति के द्वारा ही
यहाँ वहाँ
जल में, थल में, नभ में,
धूप में छाया में।

…[राकेश]

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