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जनवरी 6, 2017

हे स्त्री! तुम्हारी सुरक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी अपनी है – मलाइका अरोड़ा (अभिनेत्री))

Womanतो हुआ यूँ कि

मैं अपने मेट्रोपॉलिटन शहर की भीड़ भरी सड़कों पर

पार्टी मनाने के लिए अपने सहेली के साथ निकल पड़ी,

वे बड़ी संख्या में आए और हमारे शरीर का उत्पीडन किया|

लेकिन अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी तो हम स्त्रियों की स्वयं की है!

सो,

अगली बार मैं डिस्कोथेक में गयी,

जहां सुरक्षा का पूरा प्रबंध था और बाउंसर्स तैनात थे,

वे अंदर घुस आए और मुझे पीटने लगे और उन्होंने मेरे कपड़े फाड़ दिए|

लेकिन मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी तो मेरी अपनी है!

सो,

जब मैं फ़िल्म देखने गयी तो अपने साथ अपने पुरुष मित्र को ले गयी,

उन्होंने मुझे एक बस में धकेल दिया और

मेरे गुप्तांगों में लोहे की छड़ घुसेड़ दी|

लेकिन मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी तो मेरी अपनी ही है!

सो,

एक अच्छे से सलवार कमीज से अपने तन को पूरी तरह से ढककर

मैं अपने कालेज गई,

एक कोने में उन्होंने मुझे पकड़ लिया

और मेरे नितंबों को दबोचने लगे|

लेकिन मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी तो मेरी स्वयं की ही है!

सो,

मैंने अपने घर के आरामदायक माहौल में ही ठहरना तय किया,

वे मेरे घर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुस आए,

और मुझे बांधकर मुझे विवश किया कि मैं उनके कहे अनुसार करती रहूँ,

और उन्होंने मेरी विवश हरकतों को वीडियो में कैद कर लिया|

लेकिन मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी तो मेरी स्वयं की है!

सो,

मैं वापिस अपने परिवार के साथ रहने चली गई,

ताकि मैं सुरक्षित महसूस कर सकूँ|

वे सब मेरे रिश्तेदार थे,

लेकिन उन्होंने मुझे अपनी भतीजी के रूप में नहीं देखा,

और उन्होंने मुझे निर्वस्त्र करके वह सब किया जो वे करना चाहते थे|

लेकिन मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी स्वयं की है!

सो,

आजकल मैं बाथरूम में बैठी रहती हूँ, दरवाजा बन्द करके, और कहीं बाहर नहीं जाती|

वे मेरे बाथरूम के सामने पड़ने वाली बालकनी में खड़े रहते हैं,

ताकि बाथरूम की खिड़की से अंदर झाँक सकें,

लेकिन मैं स्नान नहीं करती,

क्योंकि मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी अपनी ही है!

अब उन्होंने मुझे उस स्थिति में पहुंचा दिया है

जिसमें वे मुझे हमेशा से देखना चाहते थे,

टूटे आत्मविश्वास वाली,

अपने अधिकारों के लिए संघर्ष न कर पाने वाली,

दृढ़ निश्चय से कोसों दूर रहने वाली,

उनकी दया पर आश्रित,

बाथरूम में बन्द,

उस घड़ी के इंतजार में डरी-सहमी,

जब वे आकर दरवाजा खटखटाएंगें,

मुझे पाने के लिए|

मैं वह भारतीय स्त्री हूँ,

जो खेलों में चमकदार प्रदर्शन कर सकती है,

देश के लिए मेडल्स जीत कर ला सकती है,

आर्मी में भर्ती हो सकती है,

सीईओ बन सकती है,

स्पेस में जा सकती है,

और संसार भर में चर्चित हो सकती है…

लेकिन शर्त सिर्फ यह कि

अगर मैं इस बाथरूम से बाहर निकल सकूं|

लेकिन मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी ही है!

सो…|

वैधानिक सवाल : छोटे कपड़े पहनने वाली और पार्टी में जाने वाली और ड्रिंक करने वाली लडकियां पश्चिमी सभ्यता की नक़ल कर रही हैं| जो लड़के इन लड़कियों का यौन- उत्पीडन कर रहे हैं, भारतीय सभ्यता का पालन कर रहे हैं?

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जून 22, 2011

बतकही : जाम

बतकही : आरम्भ ,
सोनिया गाँधी और संघ परिवार ,
और उदारीकरण और भारत
से आगे :-

…9 जनवरी, 2005…

विजय और हरि भी बोले,” सुनील जी बधाई”।

सुनील बैठते हुये बोले,” हमें भी रात ही पता चला बेटे के फोन से। मिठाई आप लोगों के घर पहुँच गयी होगी अभी छोटे बेटे को बोलकर ही चला था कि आप सबके यहाँ मिठाई देकर आये। आप लोग मेरे साथ चलोगे ही घर पर वहीं चाय मिठाई हो जायेगी।”

अजी ये सब तो होता रहेगा। बड़े दिनों बाद ढ़ंग की धूप निकली है जरा आनन्द तो उठा लें धूप का। हरीश जी बोले।

हाँ ये भी ठीक है। यहाँ धूप में गपशप कर लें। लौटते समय हमारे यहाँ से होकर निकल लेना। सुनील बोले।

आप तो कुछ समय पहले बता भी रहे थे कि बेटे का प्रमोशन ड्रयू है। विजय बाबू ने कहा।

हाँ होना तो पिछले साल फरवरी में ही था पर कोई कमीशन बैठा था उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही इस जनवरी में आदेश हो पाये।

चलिये अब तो हो गया प्रमोशन। उसने तो वेलिंग्टन कालेज वाला कोर्स भी कर रखा है। अब तो काफी आगे तक जायेगा।

देखिये विजय बाबू जाना तो चाहिये ऊपर तक। बाकी सब तो किस्मत है। सुनील ठण्डी साँस छोड़कर बोले।

अजी सही उम्र में सब कुछ हो रहा है जायेगा कैसे नहीं अपनी निर्धारित प्रगति तक? पर आप ये तो बताओ कहाँ रह गये थे आप हम लोग तो कब से आपकी राह देख रहे हैं। रहा है जैसे पूरा बाजार ही घर ले आये हो। अशोक ने कहा।

गया था मिठाई लेने। एक दो काम और भी थे घंटाघर की तरफ। सोचा पहले वहीं के काम निबटाता चलूँ। वहाँ से काम करके वापिस आने ही लगा था कि पाया कि छात्रों का जलूस निकल रहा है विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनावों के ​सिलसिले में। ऐसा जाम लगा कि एक घंटे से ज्यादा वहीं फंसे रहे न आगे जा सके न पीछे। सुनील रोष से बोले।

एक तो शहर की सड़कें ही इतनी चौड़ी हैं कि मुश्किल से एक ही गाड़ी निकल पाती है और ऊपर से बाजार में इतनी भीड़ हो गयी है कि अब तो ट्रैफिक के कारण डर और लगता है बाजार जाने में। ये भीड़ भड़क्का कहीं आने जाने लायक छोड़गा ही नहीं इस शहर को। वहीं पैदल, साइकिल, रिक्शा चल रहे हैं वहीं घोड़ा ताँगा और वहीं स्कूटर, मोटरसायकिल, कार, बसे और ट्रक चल रहे हैं। बस एक रेल की कमी रह गयी है। और मंडी की तरफ तो बहुत ही बुरा हाल है। हम तो चला नहीं पाते बाजार में कोई भी वाहन। एक जगह खड़ा करके पैदल ही काम निबटाते हैं। विजय बाबू शिकायती लहजे में बोले।

अजी इतने ट्रैफिक में भी इन लड़कों को देखो कैसे सायं सायं करते हुये आड़े तिरछे चलाते हैं मोटरसायकिल। और मोटरसायकिल तो हो गया है पुराना शब्द। अब तो सीधे बाइक बोला जाता हैं। एक भी हेलमेट नहीं लगाता और रोज एक्सीडैन्ट होते हैं इनके और या तो ये बाइक वाले खुद चोट खाते हैं या दूसरों को चोट देते हैं। अशोक ने कहा।

अशोक बाबू कहीं न कहीं घर के लोग भी जिम्मेदार हैं। बारह चौदह साल के लड़कों को बाइक दे देते हैं और लड़कियाँ ही कौन सा कम हैं जब से सेल्फ स्टार्ट वाले दुपहिया वाहन आ गये हैं लड़कियाँ भी दौड़ी घूम रही हैं। लाइसेंस लेने की उम्र हुयी या न हुयी हो बस बाइक लेकर निकल पड़ते हैं शहर में। सुनील बोले।

सुनील जी बच्चे भी क्या करें। स्कूल कालेज से छुटकर कोई कोचिंग करने जा रहा है कोई कुछ अन्य रूचि की चीज सीखने जा रहा है। समय बदल गया है और लोगों की जरूरतें भी पर शहर की सुविधायें वहीं की वहीं हैं जहाँ बीस तीस साल पहले थीं। सड़कें तो उतनी ही चौड़ी हैं और संख्या में गाडि़याँ बढ गयी हैं बेतहाशा जाम न लगे तो क्या हो। विजय ने कहा।

हरि बोले,” जाम लगने की अच्छी बात कही। परसों का सुनो। पिछले हफ्ते नातिन आयी हुयी थी नये साल की छुट्टियाँ मनाने पर यहाँ आकर उसे लग गयी ठंड। तो मैं उसे छोड़ने रूड़की चला गया। रात में सोचा कि जब रूड़की तक आ गया हूँ तो अगले दिन सुबह जल्दी हरिद्वार जाकर वहीं से वापसी की बस ले लूँगा। बस सुबह हरिद्वार पहुँच गया और गंगा जी के दर्शन करके बारह बजे की बस ले ली सोचा था पाँच नहीं तो छह घंटे में घर पहुँच ही जाऊँगा। रूड़की तक पहुँचते-पहुँचते आँख भी लग गयी। नींद खुली तो पाया कि बस रूकी हुयी थी। दूर दूर तक गाडि़याँ ही गाडि़याँ दिखायी दे रही थीं। बड़ा तगड़ा जाम लग रहा था। बस में चाट और मूंगफली बेचने वाले लड़के चढ़े तो मैने पूछा कि माजरा क्या है और कहाँ रूके हुये हैं। उसने बताया कि पुरकाजी से करीब आधा किमी पहले बस खड़ी है और पहले आगे ​सिखों का कोई जलूस निकल रहा था और जिसके कारण पुरकाजी के दोनों ओर जाम लग गया जो अब इतनी खराब ​स्थिति में पहुँच चुका है कि जल्दी खुलने वाला है नही। बस से नीचे उतरे तो देखा बसें, ट्रक, ट्रैक्टर अपनी लम्बी ट्रालियों सहित, कारें,  और भैंसा-बुग्गी, आदि सब कुछ आपस में गडमड होकर फंसे हुये थे। दर्जनों ट्रक तो गन्ने से लदे दिखायी दे रहे थे। दो तीन सेना के ट्रक भी दिखायी दे रहे थे।

थोड़ा रूककर हरि बोले,” दिखायी तो दे ही रहा था कि जाम जल्दी खुलने वाला है नहीं पर दिल को कैसे राहत हो। हर आदमी को जल्दी होती है। नीचे खड़े लोगों में से कुछ जलूस को कोस रहे थे कि इसे भी आज ही निकलना था। जलूस वाले तो अपना काम कर गये पर इस जाम में फंसे लोगों के कामों का क्या होगा।

अशोक बोले,” जब से डा. मनमोहन ​सिंह पी.एम बने हैं तबसे सिखों में जोश भी बहुत ज्यादा आ गया है। रोज़ ही इनके जलूस निकल रहे हैं”।

हरि हँस कर बोले,” अजी और क्या अब तो पहली बार सेना प्रमुख भी एक ​सिख बने हैं। जोश तो आना ही चाहिये। सही मायने में नारा सही हो गया है कि राज करेगा खालसा। पर अभी कुछ साल पहले ही तो खालसा के तीन सौ साल पूरे होने के जश्न मनाये गये थे। अब कौन सा अवसर आ गया इतना बड़ा जलूस निकालने का। और वह भी पुरकाजी जैसी छोटी जगह में?”

अब सरकार को गम्भीरता से सोचना चाहिये इन धार्मिक और राजनीतिक जलूसों के बारे में कोई नीति बनाने के बारे में। रोज ही कोई न कोई जलूस निकल रहा है और जनता परेशान होती रहती है। हर सम्प्रदाय और राजनीतिक दल को इस जलूस निकालने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिये। विजय ने कहा।

सुनील भी सहमति में बोले,” हाँ जी कोई जनहित याचिका होनी चाहिये इस पर भी। सुप्रीम कोर्ट आदेश देगा तब ही कुछ हो पायेगा। कोई भी सरकार अपने आप कुछ करने वाली है नहीं ऐसे मामले में सबको सबके वोट चाहियें। फिर यहाँ तो ये हाल है कि दूसरे सम्प्रदाय और दूसरे दल के जलूस आदि खराब हैं और हमारे तो मतलब से ही निकलते हैं।”

हरि ने कहा,” अजी आप आगे तो सुनो जाम की बात। हमारी बस के एक यात्री ने अपने मोबाइल से किसी को फोन किया तो पता चला कि वे महाशय भी इसी जाम में फंसे हुये हैं जबकि वे हमारी बस से दो घंटे पहले वाली बस से चल पड़े थे। मतलब दो घंटे पहले से तो जाम लगा ही हुआ था। हमारी बस करीब दो बजे जाम में आकर रूकी थी और करीब चार बजे जाम खुलने पर खिसकी। रात़े साढ़े आठ बजे घर पहुँचे। रास्ते में कहीं मौका नहीं लगा कि घर पर फोन करके बता दें। बस वाला फिर कहीं रूका ही नहीं सवारियों को उतारने के अलावा।”

हाँ जी चिन्ता तो हो ही जाती है घर पर। मोबाइल का बड़ा फायदा है ऐसे समय। कहीं भी फंसे हों ऐसी ​स्थिति में कम से कम घर पर फोन से बता तो सकते हैं। अशोक ने कहा।

उस दिन तो हमें भी मोबाइल के फायदे नजर आये। पर सबसे खराब लगा एक एम्बूलैंस को देखकर। जब जाम खुला तो थोड़ा सा चलने के बाद ही हमारी बस को क्रॉस किया एम्बूलैंस ने। कहीं पास में दुघर्टना हुयी होगी और घायल लोग भी कब से जाम में फंसे पड़ होंगें। एम्बूलैंस लगभग जाम के बीच में फंसी हुयी थी। ना तो रूड़की की तरफ जा सकते थे और ना ही वापस मुजफ्फरनगर की ओर। छोटे बच्चों का अलग बुरा हाल था। हरि बोले।

जलूस निकालने वालों या जाम लगाने वालों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि उनके काम का दूसरे लोगों पर क्या फर्क पड़ रहा हैं। ये लोग तो अपनी ही धुन की ऊर्जा से भरे हुये होते हैं इन्हे कुछ दिखायी नहीं देता अपनी जरूरत के ​सिवा। विजय ने कहा।

सुनील बोले,” सड़क जाम करना तो सबसे आसान काम है अपने देश में। इलाके का ट्रांसफारमर फूक गया है तो सड़क जाम कर दो। सरकार की किसी बात से नाराजगी है तो सड़क जाम कर दो। ये सरकार को संदेश पहुँचाने का एक आसान तरीका लगता है लोगों को। जाम वाले ये नहीं सोचते कि सड़क पर चल कौन रहा है किसे अपने काम पर जाने की जल्दी है? उनके जैसे ही जनता के आम लोग। इन मंत्रियों और बड़े अधिकारियों का क्या फर्क पड़ता है ऐसे जामों से। भुगतना तो आम आदमी को ही पड़ता है”।

एक और बात भी तो है किस तरह सरकार तक अपनी आवाज पहुँचायी जाये। खैर छोड़ो इस बात को। तो सुनील जी जी शहर में आज छात्रों का चुनाव प्रचार चल रहा है। अशोक ने पूछा।

हाँ कारों की छतों पर बैठकर छात्र छात्रायें चुनाव प्रचार कर रहे थे। इतनी कारें, स्कूटर, मोटरसायकिलें थीं उन लोगों के काफिले में कि अचरज होता है सोचकर कि ये कालेजों के छात्रसंघ के चुनाव के लिये प्रचार हो रहा है। ऐसा लगता था जैसे एम.एल.ए या सभासद के चुनाव के चुनाव के लिये निकले हों।

अरे छात्रसंघों के चुनावों से लाभ क्या होना है इन कालेजों और विश्वविद्यालयों का। चारों तरफ दीवारें पोस्टरों से पाट देते हैं। चुनाव तो ये लोग ऐसे अन्दाज़ में लड़ते हैं जैसे विधायकी या सांसदी का चुनाव लड़ रहे हों। ऊपर से चुनाव में होने वाले इन इन लोगों के झगड़े। हरि बोले।

विजय बोले,”चुनाव की जरूरत क्या है और चुनाव हो भी तो प्रत्याशियों के लिये पढ़ाई में मेरिट सबसे बड़ा क्राइटेरिया होना चाहिये। अभी तो ये हाल हो गया है कि चुनाव वे छात्र लड़ते हैं जिनका पढ़ने लिखने से कोई मतलब नहीं रह गया है। राजनीति तो कालेज स्तर से ही खराब हो जाती है। वहीं से युवा लोग गुंडों के सामने नत-मस्तक होना सीख जाते हैं क्योंकि जहाँ बहुमत शिक्षा प्राप्त करके अपना जीवन संवारने के लिये वहाँ जाता है वहीं राजनीतिक महत्वाकांक्षा लिये हुये गुंडे टाइप युवा सिर्फ राजनीति चमकाने कालेजों में पड़े रहते हैं और अच्छे विधार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं”।

…जारी…

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