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दिसम्बर 13, 2013

तुम्हारी पीड़ा

morgan-001तुम्हारी पीड़ा

आसुंओं को अंतर में पी लेने की विवशता है

कायरता का श्राप पाए पुरुष में

अनिश्चय के भंवर में डूबते नर में,

कोमल ह्रदय के स्वामी मानव में

अपनी सार्थकता तलाशने की पीड़ा है|

शब्दों को छल के लिए उगालना

योग-संयोगों से अर्थ बदलना

आत्मसंतुष्टि हेतु ओढें कर्त्तव्य

तुम्हारी पीड़ा

गहनतम भाव समझ कर अंजान बनने की पीड़ा है|

क्या देता है जगत जीव को

क्या लेता है जगत जीव से

क्या सार्थकता, क्या श्रेष्ठता

आखिर क्या है, पराकाष्ठा?

तुम्हारी पीड़ा

चादर के चारों कोने तलाश न कर पानी की पीड़ा है|

सहज सजीली राह छोड़कर

ऊंचे – नीचे,

दुर्गम पथ की चोटी को तकना

तकना, उतरना, चढ़ना सबकी भूलभुलैया

तुम्हारी पीड़ा,

भीड़ में गुम होने के डर की

पीड़ा है!

राग-मोह-शान्ति-खुशी-द्वेष-दर्प

क्रोध-स्नेह-प्रलाप-जीवट-विवशता

चक्रव्यूह पर चक्रव्यूह से घिरे हुए

तुम्हारी पीड़ा

द्वार न तोड़ पाने की

पीड़ा है!

Yugalsign1

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