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अप्रैल 20, 2011

बाबाजी, मैं और औरत

बाबाजी
तुम ब्रह्मचारी
तुम्हारी सोच के अनुसार
औरत नरक का द्वार।

लेकिन
मैं तो ब्रह्मचारी नहीं
दिखने में भी
ढ़ोंगी- पुजारी नहीं
मेरे लिये तो
हर औरत खूबसूरत है
बशर्ते यह कि
वह औरत हो।

तुमने जिसे नकारा
धिक्कारा
और अस्पर्श्य विचारा है
उसके आगे मैंने तो
समूचा जीवन हारा है।

मेरी दृष्टि से देखो कभी
तो जानोगे
नरक का वह द्वार
कितना प्यारा है।

सिर से पाँवों तक
औरत में क्या नहीं
कभी देखो तो सही
दूर से उसके लहराते कुंतल
सुराहीदार गर्दन
गालों में गड्ढ़े
ओठों पर हलचल
कंधों से नीचे
कमर के कटाव
और कमर से नीचे
नितम्बों के भराव
हटती नहीं है दृष्टि
अगर फंस जाये
दैहिक आकर्षण में।

बाबाजी
कुछ तो सोचो
क्या रखा है तुम्हारी सोच,
और ऐसे ही जिये जाते,
किये जाते आत्मतर्पण में?
कभी ध्यान से देखो
औरत के वक्ष
और सोचो कि
ईश्वर ने उन्हे केवल
बच्चे के हाथों का खिलौना
या फिर उसके लिये
दूध का भरा दोना
ही बनाया है
या फिर पुरुषों की नज़रों को
चकाचौंध, हतप्रभ या फिर
आबद्ध स्थिर करते हुये
अद्वतीय सौन्दर्य दिखाया है।

बाबाजी
प्रकृति को कभी
कपड़ों का बोझ ढ़ोते देखा है?
नदी को अपनी अनावृत्त
बासन्ती देह धोते देखा है?
सांगोपांग स्नान करती नदी को
नहाते हुये देखो।

बाबाजी
महसूसो पुरुष होने की वासना
जिओ एक जीवन पूरा
कहते हैं कि
औरत के बिना
की गयी पूजा
मनाया गया उत्सव
होता है आधा-अधूरा।

हर औरत माँ   नहीं होती
बहन नहीं होती
मित्र नहीं होती
बीवी नहीं होती
पर
हर औरत
औरत अवश्य होती है।

उसके लिये भी
हर शख्स पिता नहीं होता
भाई नहीं होता
वह भी सोचती है
बहुत कुछ खोजती है
आदमी में।

कैसी विडम्बना है कि
उसे आज तक
अपना पुरुष
अपने ढ़ंग से मिला नहीं
मगर ताज्जुब है कि
उसके ओठो
पर गिला नहीं।

बाबाजी
एक बात और
मैं अधम और कामी
मुझ पर हावी
कमजोरियाँ और इंद्रियगत गुलामी
इसलिये मेरी ही दृष्टि को
मत अपनाओ
औरत के बारे में जो संतों ने कहा है –
बूड़ा वंश कबीर का…
नारी की झाईं परत…
औगुन आठ सदा उर रहहीं…
भूल जाओ
कुछ व्यापक और
मौलिक दृष्टिकोण बनाओ।

देखो उसे सोचो उसे
भाषा और भूमि से परे
वह मात्र खेती ही नहीं
बेटी भी है।
उसकी शुचिता और
रक्षा की जिम्मेदारी
भावी समाज के निर्माण में
उसकी रचनात्मक हिस्सेदारी
हम पर नहीं तो किस पर है?

{कृष्ण बिहारी}

जनवरी 27, 2011

भगवती चरण वर्मा : एक प्रेम कविता

पदमभूषण, राज्यसभा के सदस्य श्री भगवती चरण वर्मा ने चित्रलेखा, रेखा, भूले-बिसरे चित्र (साहित्य अकादमी से पुरस्कृत), सामर्थ्य और सीमा, सबहि नचावत राम गोसाईं, सीधी सच्ची बातें, टेढ़े मेढ़े रास्ते, पतन, और तीन वर्ष आदि प्रसिद्ध पुस्तकें लिख कर अपनी गद्य-रचना से हिन्दी जगत को अपने लेखन का प्रशंसक बनाया था। उच्च स्तरीय गद्य के साथ साथ उन्होने उच्च कोटि के काव्य की रचना भी की।

स्त्री-पुरुष के मध्य पनपे प्रेम पर उच्च स्तरीय लेखन करने के भाव से दुनिया का हर लेखक एवम कवि गुजरता ही गुजरता है और यह इच्छा उसके जीवन में कई बार सिर उठाती है और कुछ रचियता उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर प्रेम के अलग- अलग रुपों को अपनी रचनाओं के माध्यम से खोजने का प्रयास करते हैं। साहित्य हो या फिल्में, प्रेम में वियोग की स्थिति में स्त्री की कोमल भावनाओं को प्रदर्शित करने वाली सामग्री बहुतायत में मिल जाती है पर पुरुष की कोमल भावनाओं की अभिव्यक्त्ति कम ही मिलती है।

पुरुष भी वियोग में आँसू बहा सकता है। भगवती बाबू प्रस्तुत कविता में प्रेमिका के वियोग से पीड़ित प्रेमी के भावों को अभिव्यक्त्ति देते हैं। प्रेम किसी भी व्यक्त्ति (स्त्री या पुरुष) की ऊर्जा के स्तर को बदल डालता है, चाहे प्रेमीगण प्रेम में संयोग की खुशी से लबरेज़ हों या बिछोह की पीड़ा से गुजर रहे हों, उनकी ऊर्जायें अलग हो जाती हैं, दोनों ही परिस्थितियों में रात की नींद की गुणवत्ता, प्रकृति और अवधि बदल जाती है। दिमाग और मन की चेतना का स्तर अलग हो जाता है। देखने की, महसूस करने की और सहने की क्षमता अलग हो जाती है। संवेदनशीलता अलग हो जाती है।

वियोग में प्रेमीगण अपने प्रेम की भावनाओं को अपने प्रेमी तक किसी भी तरह पहुँचाना चाहते हैं। कभी उन्हे हवा से आस बंधती है कि जो हवा यहाँ उनकी खिड़की के बाहर बह रही है वह सीधे चलकर उनके प्रेमी के पास जायेगी और उनके प्रेम का संदेश पहुँचा देगी, कभी उन्हे आसमान में चमकते चाँद को देखकर ढ़ाढ़स बँधता है कि यही कुछ करेगा।

भावना के जगने की देर है कि नींद उड़ जाती है।

भगवती बाबू ने वियोग में जल रहे प्रेमी पुरुष के मनोभावों को बड़ी ही खूबसूरती से नीचे दी गयी कविता में उकेरा है!

क्या जाग रही होगी तुम भी?
निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये!
अपना यह व्यापक अंधकार,
मेरे सूने-से मानस में, बरबस भर देतीं बार-बार;
मेरी पीड़ाएँ एक-एक, हैं बदल रहीं करवटें विकल;
किस आशंका की विसुध आह!
इन सपनों को कर गई पार
मैं बेचैनी में तड़प रहा;
क्या जाग रही होगी तुम भी?

अपने सुख-दुख से पीड़ित जग, निश्चिंत पड़ा है शयित-शांत,
मैं अपने सुख-दुख को तुममें, हूँ ढूँढ रहा विक्षिप्त-भ्रांत;
यदि एक साँस बन उड़ सकता, यदि हो सकता वैसा अदृश्य
यदि सुमुखि तुम्हारे सिरहाने, मैं आ सकता आकुल अशांत

पर नहीं, बँधा सीमाओं से, मैं सिसक रहा हूँ मौन विवश;
मैं पूछ रहा हूँ बस इतना- भर कर नयनों में सजल याद,
क्या जाग रही होगी तुम भी?

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