Posts tagged ‘Chehra’

दिसम्बर 18, 2014

क्रूरता…

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगाkidcartoon
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता

पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा

वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अम्बुज)

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अप्रैल 5, 2014

क्रूरता…(कुमार अंबुज)

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता
पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा ऋंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अंबुज)

दिसम्बर 17, 2013

ज़िंदगी…रूमानी हसरतों का पलना

ज़िन्दगी…Dk-001

कुछ तल्ख़ हकीक़तें

कुछ नर्म खयालात

गर्म रेत पे नंगे पाँव चलने जैसा

बादलों पे तैरना जैसे कभी

रूमानी हसरतों का पलना

परवान चढ़ना

किसी के होने का अहसास

कंधे पे सर रखना

गुलाबी ख्वाब बुनना

उगते डूबते दिन लिखना

चांदनी रात भर तपना

जेठ दुपहरी का गलना

ज़िन्दगी…

मिलना किसी का

ज़िन्दगी…

न रखना खुद को जिंदा

ज़िन्दगी…

ढूंढना ख़ुशी किसी के चेहरे में

रहना डूबे कभी उदासी में

ज़िन्दगी…

आह! ज़िंदगी…

Rajnish sign

दिसम्बर 10, 2013

भीड़ में भीड़ से अलग एक चेहरा

ये आखिर हमें हुआ क्या है…baran-001
हर पल में किसी का एहसास
जैसे कोई छोड़ गया हो हवा में
गंध अपनी देह की

आती जाती सांस में

समा जाता है अहसास

जैसे  उसके स्पर्श का
हर तरफ बस

एक ही चेहरा
भीड़ में

भीड़ से अलग जैसा

Rajnish sign

दिसम्बर 6, 2013

अरमान धुल गए

mansnow-001सपना रिस गया

आँखों की कोर से

सारे रंग घुल गए

कुछ अरमान धुल गए

चेहरे के साथ ही

कुछ ज़िन्दगी भी

बदरंग कर गए

मुट्ठी की रेत सा

जितना कस के पकड़ा

उतनी तेज़ी से बीत गया

फिसला आँखों से

पर मन रीत गया

Rajnish sign

दिसम्बर 1, 2013

टूट कर भी मुकम्मल रहूंगा

ख्वाब mirrorwoman-001

न चेहरा होता है

न बदन कभी

अगर

बिखरेगा भी तो

कितना बिखरेगा?

मैं  टूटा भी

सौ हिस्सों में गर

हर हिस्सा  मेरा मुकम्मल ही  रहेगा

मैं आइना नहीं

जो टूटा तो

अक्स  बाँटूगा तेरा टुकड़ों में

मेरे हर हिस्से में

तब भी

तुम पूरा का पूरा ही समा  सकोगी

Rajnish sign

नवम्बर 24, 2013

शुतुरमुर्ग ही नियति?

चिंतित मन ने तस्वीर उकेरीbrain-001

चेहरा लगने लगा बूढ़ा सा

दोस्त ने कोसा

‘मूर्ख!

दिमाग को

खूंटी पर टांग कर काम कर

अधिक सोचेगा

तो कष्ट होगा ही’

तो क्या यहीं पर पाते हैं,

जीवन के सब प्रश्न विश्राम?

तो क्या अंततः

सारी सोचों का हश्र

होता है बन जाने में

शुतुरमुर्ग !

Yugalsign1

नवम्बर 14, 2013

हर सिम्त फैली है खुशबू तेरी

ये अहसास भी कितना अजीब हैbaran-001

हर तरफ बस देखना तुझ को ही

धुंध में लिपटा हर चेहरा तेरा

सरदी की रातों में तलाशना गर्मी तुझ में

रात रानी की महक को तेरा नाम देना

तुम दिल में गहरे जाकर बस गयीं

और मैं

बस वहीं रुक गया

उन तेरह दिनों की  दीवार के पास

यहीं से उस पार झाँक लेता हूँ

जहां से मुस्करा कर

तुम चले गये थे

तुम्हारे न होने का अहसास  भला क्यूँ कर हो…

हर सिम्त फैली है खुशबू तेरी

चार सू नुमायाँ है चेहरा तेरा

(रजनीश)

नवम्बर 13, 2013

कुछ कुछ होता है!

तरंगों के कंपनlovers-001

पोरों के स्पर्श

सुकुमार वक्ष की कोमलता…

श्यामवर्णी चादर ओढ़े सांस

चुनरी की रेशमी ओट

संगीत भरे चित्रालय में

आँखों-आँखों के संवाद में

झुककर पांवों, तलुओं का स्पर्श

बांह को पकड़ कर भींच देना

गोद में रखे पॉपकार्न को टूंगना

कपोलों का चुम्बन

चेहरे पर भावों के इन्द्रधनुष

तुमने कहा…

कुछ कुछ होता है

Yugalsign1

नवम्बर 13, 2013

चांदनी शर्मा के ओट में छिप गई

moonlovers-001रोज यही एक सपना देखता हूँ मैं

जागी अधखुली आँखों से…

श्वेत  चाँदनी  में लिपटी तुम चल रही हो

साथ साथ मेरे…..

मैं थाम लेता हूँ हाथ तुम्हारा हौले से…

महसूस कर सकता हूँ तुम्हारी सिहरन को

सहलाता हूँ तुम्हारी उँगलियों को,

छूता हूँ  पोरों को…

दूर कहीं दूर…निर्जन में

बैठ जाते हैं हम तीनो…

तुम, मैं और तुम्हारे बदन से लिपटी चाँदनी…

बैठे रहते हैं चुपचाप पास-पास

एक दूसरे के सर से सर जोड़े

कभी चेहरा लिए हाथों में

एक दूसरे की आँखों में खोये

सुनते हैं साँसों की मौन भाषा को…

बस खोये से रहते हैं एक दूसरे में

मैं सहलाता रहता हूँ तुम्हारी अनावृत बाहें

और  महसूस करता रहता हूँ तुम में

उठते स्पंदन को

तुम कुछ और  सिमट आती हो नज़दीक मेरे

हमारे बीच की चाँदनी असहज होने लगती है

रहती है पर निशब्द…

कानों की लौ गर्म होने लगी है

किसी तीसरे से बेखबर हम बस एक दूजे में गुम…

साँसों की लय पे उठते गिरते सीने को आँखों में समेटते

एक दूसरे की नज़रों को नज़रों से चूमते

होंठ कांपते हैं मेरे

तुम्हारे भी…

थरथरा रहे हैं दोनों के बदन…

जैसे दे रहे हों  मौन आमंत्रण…

साँसे असंयमित होने लगती है…

और बहुत उष्ण भी

पिघलने लगती है चाँदनी हम दोनों के बीच की

दूर उतर कर खड़ी  हो जाती है तुम्हारे बदन से

रख देता हूँ कांपते होंठ तुम्हारे जलते होंठो पे

चाँदनी शर्मा के किसी ओट में छुप जाती है

तीन से दो होने के लिए

या फिर दो से एक होने के लिए…

रात की चादर के तले…

बस यही एक ख्वाब मैं हर वक़्त देखता रहता हूँ

जागी अधखुली आँखों से

(रजनीश)

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