Posts tagged ‘Chaman’

अक्टूबर 7, 2011

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले

एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

प्यार से कोई मेरी ज़ुल्फ को संवार दे
बोझ सभी ज़िंदगी के प्यार से उतार दे
हाथ मेरा थामकर हर सफर में वो चले
इस चमन से जो गई वही मुझे बहार दे

प्रसून सा कहीं खिलूँ फिर कोई निहार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

मेरे नयनों में फिर सपने वो जागने लगें
तस्वीर दिल में फिर वही हम टांगने लगें
मंदिरों में, मस्जिदों में मौन होके या मुखर
साथ उम्र भर का झुके माथ मांगने लगें

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

नज़र मिला नज़र गिरा, ओट में ही मुस्करा
खुले बहुत मगर फिर भी लाज हो ज़रा-ज़रा
इस तरह लगे कि जैसे अंग-अंग भर उठे
धरा अगर लगे परी तो आसमां भरा-भरा
मन के तार छेड़ दे फिर कोई सितार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 11, 2011

गम भी न आये रास तो क्या करुँ

देर तक करता रहा था मंजिल की बात
हमराही जो अचानक रास्ते में ठहर गया
सफर की थकन अक्सर मुझसे पूछती है
साथी जो तेरे साथ था बता किधर गया
………

वो कसमें थीं  के वादे किसे याद हैं
भटक जाता है यूंही ध्यान का क्या
आपकी दुनियादारी से शिकायत नहीं
कह गयी होगी कुछ ज़बान का क्या
………

अब रुलाता नहीं अहसास क्या करूँ
तबियत भी नहीं उदास क्या करूँ
कई दिनों से दिल पर बोझ ही नहीं
गम भी नहीं आया रास क्या करूँ
………

चमन में यूं ही फूल खिल रहे है और खिलते रहेंगे
सूखे हुए दरख्त मगर बहार का इन्तज़ार नहीं करते
फिर रहे हैं महफिलों में उजड़ी हुई मुस्कान के साथ
अहले दिल कभी अपने गम का इज़हार नहीं करते

(रफत आलम)

फ़रवरी 4, 2011

दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते हैं (रफत आलम)

खुश्बुओं के सिलसिले हवाओं से मिलते ज़रूर हैं
वो वीराने में लगे हों तो भी फूल खिलते ज़रूर हैं

रात का दिन के साथ निबाह नामुमकिन है मगर
कोई एक मुकाम है जहाँ पर दोनों मिलते ज़रूर हैं

चोटों के निशान तो मर कर ही जाते हैं ऎ दोस्त
वक्त के धागे से ज़ख्मों के मुँह सिलते ज़रूर हैं

मुस्कान के पीछे छिपी पीड़ा की बात यूँ समझिये
काँटों की नोंक पर दीख्त में फूल खिलते ज़रूर हैं

सम्बंध वही मारते हैं जिन पर विश्वास हो बहुत
दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते ज़रूर हैं

चमन की सुहानी उड़ानों का जब आता है ख़याल
पिंजरे के तारों से परों के ज़ख्म सिलते ज़रूर हैं

महफिलों की रौनक हैं बनावटी गुलदस्ते आलम
खुशबू दे नहीं सकते तो भी ये खिलते ज़रूर हैं

(रफत आलम)

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