Posts tagged ‘Chamak’

जनवरी 11, 2014

ठूंठ जीवन

पतित है वह RKap-001

या कि चेतना उसकी

है सुप्त प्राय:

दिवस के प्रारम्भ से

अवसान तक

धुंधलका सा है

– सोच में भी

– कर्म में भी

-देह में भी

तिरती घटिकाएं

प्रात: की अरुनोदायी आभा

या कि तिमिर के उत्थान की बेला

शून्यता की चादर से हैं लिपटीं

सूनी आखों से तकती है

समय के रथ की ओर!

अल्हड यौवन की खिलखिलाहट

गोरे तन की झिलमिलाहट

युगल सामीप्य की उष्णता

युवा मानों की तरंगित उर्जस्विता

को-

सराहकर भी अनमना सा,

अन्यमनस्क शुतुरमुर्ग!

पहिये की रफ़्तार से

संचालित जीवन

जैसे कि हो पहिये ही का एक बिन्दु

एक वृत्ताकार पथ पर

अनवरत गतिमान

पर दिशाहीन!

– कोई इच्छा नहीं

– कोई संकल्प नहीं-कोई माया नहीं

-कोई आलोड़न नहीं

बस एक मशीन भर!

एहसास है कचोटता

जीवन चल तो रहा है

पर कहीं बुझ रही है आग

धीरे-धीरे, मर-मर कर

आत्मा की चमक

होती जाती है मंद

क्षण-प्रतिक्षण!

Yugalsign1

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नवम्बर 15, 2013

एक चाय तो पिलाती जा यार

एक प्रहर बादwomanhill1-001

उठकर चल देती है वह

नीचे जाती पगडंडी पर

उसे जाता देख

मैं सोचता हूँ हैरान

जिंदगी से तंग आए

जीवों की जमात है यह

न है कोई गीत

न है कोई राग

न है कोई बात

पर,

तभी बीवी पलटी है

उसकी आँखों की चमक

जंगल को रौशन कर गई

प्लम वाले ने बस पूछा भर है –

“एक चाय अपने हाथों से पिला जा ना यार!”

Yugalsign1

नवम्बर 13, 2013

रुक भी जाओ कभी

womanleavingman-001तुम रोज़

कुछ अपना

मुझ पे छोड़ देती हो…

कभी खनकती हंसी,

कभी भेद भरी मुस्कान

कभी आँखों की चमक,

कभी चूड़ी की खनक

कभी गुस्सा

कभी प्यार

कभी इनकार

कभी  इकरार

कभी इसरार

कभी इजहार

पीछे छूटी चीज़ें  उठाने में…

नया कुछ,

रोज़ छूट जाता है

मैं बस

तुम्हारे पीछे पीछे

उन्ही को समेटता  चलता हूँ…

कभी आओ तो

एक रात भर को सही

ले लो अपनी अमानतें  वापस

या रह जाओ खुद यहीं

जैसे तुम खुद छूट गयी हो

खुद के हाथों से…

(रजनीश)

नवम्बर 9, 2013

तुम आयी थीं क्या?

stars-001यही कोरा सफ़ेद कागज़ है जहाँ

हर रोज़ मुझे अकेला छोड़ जाती है तू

तेरे जाने के बाद भी बहुत देर तलक

मैं अंधेरों में जुगनू तलाशा करता हूँ

कुछ अहसास तेरे  होने का

आ आ के टटोलता रहता हूँ…

गाल पे सूखे हुए आंसुओं के निशान की तरह

मेरी उँगलियों के निशान इस की शिनाख्त करते हैं

मैं हर रोज़ सोचता हूँ कि इस

सफ़ेद कोरे कागज़ पे

तेरी नीली हंसी टांक दूँ

तेरी आवाज़ पिरो दूँ इसमें

हर शाम तेरे आने तक फिर सुनूँ

तेरी मखमली आवाज़ इंतज़ार को कुछ

रंगीन कर दे शायद…

वरना इस अँधेरे में

जुगनू की चमक क्या रंग देगी…

कुछ छोड़ जाया कर इस मोड़ पे हर रोज़

कुछ गर्म साँसे उतार कर अपनी

कुछ अपनी महक…

कुछ उजाले अपनी आँखों के

मैं हर दफा कुछ बहाने से इधर आता हूँ

पूछ जाता हूँ कि तुम आयी तो नहीं…

तुम आयी थीं क्या?

(रजनीश)

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