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नवम्बर 20, 2013

ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

रात की खुमारी,MB-001
तेरे बदन की खुशबू,
नथुनों में समाती मादक गंध
तेरे होठों से चूती शराब…
तेरे सांचे में ढले बदन की छुअन
रेशम में आग लगी हो जैसे
तराशे हुए जिस्म पे तेरे

फिरते मेरे हाथ
वो लरजना
वो बहकना
वो दहकना
वो पिघलना
हाय वो मिलना

अगर वो ख्वाब था तो इतना कम क्यूँ था
अगर वो ख्वाब था तो ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

(रजनीश)

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नवम्बर 5, 2013

देह-संगम

बोलने दो आँखों को कभी…

सुनने दो अधरों से कभी…

रेशमी बंध खुल जाने दो

सपनों  को संवरने दो कभी…

मैंने बरसों जिसे तराशा है

उस आग-रेशम बदन की लौ में

जल जाने दो मुझे…

खुद में बिखरने दो  कभी…
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तेरी मादक नशीली गंध उठाती है

मेरे बदन में जो उन्मत्त लहरें

अपने सीने  में से हो के…

इनको  गुजरने दो कभी…

मैं तेरे सीने से लिपट के

बाकी उम्र यूँ ही बिता दूंगा

कभी बस आ…

के तसव्वुर की इस इक रात की

तकदीर संवर जाए कभी…

ज़रुरत क्या रहेगी लफ़्ज़ों की फिर…

जुबां को काम दो सिर्फ प्यार का

खामोश लम्हों…

और नीम अंधेरों

को दरमियाँ पसरने दो कभी…

ना रात हो ना दिन हो…

न अँधेरा ना उजाला…

कभी जब दिन भर का थका सूरज

रात के सीने पे सिर रख

सोने को बेताब जा रहा हो क्षितिज तक मिलने उससे…

बस आओ उसी वक़्त तुम…

बैठे रहें देखते इस अलौकिक प्रतिदिन के मिलन को…

कितना शाश्वत है इनका मिलना…

रोज़ मिलते हैं लेकिन प्यास उतनी ही…

मैं सूरज तो नहीं

लेकिन चैन की नींद आएगी

सिर्फ तुम्हारे सीने पे सिर रख के शायद…

रात कभी कोई सवाल नहीं करती सूरज से…

कोई ज़बाब नहीं मांगती उस के बीते पलों का…

सूरज भी नहीं उठाता कोई प्रश्न रात के अन्धेरेपन पे…

बीते पलों पे न कोई सवाल

न आने वाले समय की कोई फिक्र….

बस एक अद्भुत…

पारलौकिक…

अनंत पुरातन

लेकिन चिर नवीन…

कभी जिस की उष्णता कम नहीं होती

ऐसा मिलन…

ऐसा देह-संगम…

(रजनीश)

नवम्बर 4, 2013

मन या तन?

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तन या मन?
केवल तन
या केवल मन
देखा पहले किसको?
तन को या मन को?
बिना तन के मन था क्या?
बिना मन के तन था क्या?
मन महसूस किया पहले मन ने
या तन को सहलाया नज़रों ने पहले?
तन से जो केवल किया
वो प्यार की परिधि में आया क्या?
मन से जो चाहा वो तन द्वारा बयां
करने से बच पाया क्या??
कितने प्रश्न…कितने उत्तर
कितने द्वन्द….कितनी बेचैनी…
प्रेम शांत होता है…नीले समुद्र की तरह
क्यूँ झंझावातों को न्यौता दूँ
क्यूँ इस झगडे का पञ्च बनूँ
इसीलिए लो मैं तुम पर
न्योछावर करता हूँ
अपना मन भी अपना तन भी…

(रजनीश)

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जून 26, 2010

मन और देह के सत्य : सत्यम शिवम सुंदरम

देह का सत्य
हमेशा
मन का भी सत्य
नहीं होता।

जहाँ नजदीकी हो
और भय न हो खोने का
वहाँ पाने के लिये
मन पहले होता है,
देह सधी रहती है पार्श्व में,
धैर्य और आत्मविश्वास
की लय पर खूबसूरती
से मग्न होकर
नृत्य करती हुयी।


 

जहाँ हो कि
बस पा जायें किसी तरह तो अच्छा
वहाँ देह कूदकर आगे आ जाती है
मन की छाती पर पैर रख खड़ी हो जाती है।

वहाँ देह जीत
व्यक्ति को विजित करने का भाव
उभर आता है
मन को भी जीत जाने का
भ्रम भी उत्पन्न हो जाता है।

जहाँ गहरा जुड़ाव हो
वहाँ बिना मन
देह स्पंदन भी नहीं करती।

मन का सत्य
देह के सत्य
को भी समाहित कर लेता है
और यह ऐसा वर है
जो जीवन भर
साथ चलता है।

पर देह का सत्य
बिना मन जिन्दा रह तो लेता है
पर यह हमेशा
अल्पायु के श्राप
से शापित भी रहता है।


सत्यम शिवम सुंदरम
के तपोवन में
केवल देह के सत्य से
प्रवेश नहीं पाया जा सकता,
यह रास्ता तो जाता ही नहीं वहाँ,
इस देह से उस देह
की भूल-भुलैया में
खोकर ही रह जाता है।

वहाँ तो मन के सत्य के
कोमल उपवन से
से गुजर कर ही
प्रवेश मिल सकता है।

………………………………………………..

… [राकेश]

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