Posts tagged ‘Bistar’

मार्च 4, 2014

तुझसे मुलाक़ात के बाद…

रात, कल रात बहुत तपी…silentlove-001

तुझसे उस मुलाक़ात के बाद!

भीतर मेरी  साँसों से निकल कर कहीं…

तेरी सदा आती  रही

दिल के नज़दीक कहीं…

तेरे सीने की नर्म छुअन गुदगुदाती रही

इक लहर सी उठती रही पाँव से सर तलक जैसे

मेरे सीने से होकर तेरी हर सांस जाती रही

जाने क्या जादू है तेरी आवाज़ में

जो न कैसा मेरे बदन में तूफ़ान उठा देती है…

बेचैन कर देता है…

मेरे बिस्तर कि सलवटें कह देंगी

कि रात भर मुझे किस की  याद आती रही

हर बूँद लहू में घुल कर

किस तरह तू मुझे सहलाती रही

Rajnish sign

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दिसम्बर 18, 2013

एक रात की दो चिंताएँ…

उसकी बड़ी सी akhiri-001

कटोरेदार आँखों में

तरलायित सपने हैं

हर करवट पर

जब ऊपर नीचे होती है

आँख की पुतली

बदल जाता है रंग,

सपनों का|

घर- सुंदर सा छोटा घर

उमंगें-

प्रियतम के साथ

जीना -मरना,

सांसों की लय

सब कुछ साझा बाँट लेना चाहती है वह|

दूसरी चिंता अबूझ है

चटक रंग है

गोया कैनवास में अमूर्त रंग

दिन भर की भागदौड

थकन से चूर

बिस्तर पर करवटों से

पहली ही नींद का डेरा

काम, यश-कीर्ति के स्वपनों का घेरा

पहली चिंता की चिंता पर

घर से जुडी

स्नेह की डोर

भारी है

अधिक सोच से पहले ही

भारी हो चली हैं, आँखें

नींद समेट लेती है,

सब-कुछ !

Yugalsign1

नवम्बर 21, 2013

जो चाहे करो कातिल मेरे

रात अंगारों पे बीती कल की मेरीmanrain-001

तुम को तो नींद आई होगी…

जलते देखा है किसी को तुमने ओस की बूंदों  से?

कल मुझे देखा होता…

बहुत देर भीगा बाहर लेकिन

तुम्हारी रेशमी तपन से बहुत देर तक जला बदन

रात ने एक पल को भी पलकें नहीं मूँदी

जागती पडी रही बिस्तर पे मेरे

कम न हुयी फिर भी  सीने की जलन

कल अगर सीने से तुम लगती

तो ख़त्म हो जाते मैं और तुम, हम में

या तो अब पास आ जाओ तुम मेरे

या कुछ बुलाने का सामान करो

मसीहा मान लिया है अपना

खुद अपने कातिल को मैंने

अब मर्जी पे तुम्हारी है

जो जी में आये करो मेरा…

(रजनीश)

अक्टूबर 8, 2011

मेहँदी रची उंगलियां

गुज़री रात
गहरी नींद में
सोया देख कर
सवेरे
बिस्तर बोला-
उसको भूल गए क्या?

कोई कैसे बताये
कमीज़ के एक टूटे बटन ने
कितने अफ़साने
याद दिलाए हैं,
इस वक्त भी
धुंधला गयी आँखें
सुंई में डोरा पिरोती
देख रही हैं
वही
मेहँदी रची उंगलियां

(रफत आलम)

जुलाई 9, 2011

तुम्हारे बिना : बदरंग जीवन

मेरे तकिये के
अनगिनत गिलाफ बदल गए हैं
गए बरसों में
तुम्हारा सिरहाना अब भी
वैसा ही है
बस मेरे आँसुओं ने
रेशमी तकिये के
चंद फूल बदरंग किये हैं।

वीरान करवटों ने
बिस्तर के तुम्हारे वाले
खाली हिस्से में
लाखों बार तलाश किये हैं
तुम्हारे जिस्म के खो गये तिलिस्म
जागती आँखों ने
अक्सर यूँ ही किया है
सुबह होने का इन्तेज़ार।

(रफत आलम)

जुलाई 9, 2011

तुम्हारे बिना : सूना जीवन

हवस के अँधेरे में
मचलते हुए जिस्म
आग से भर जाते हैं
नस-नस जल उठती है
होश-ओ-हवास के परे
ना दिल ना दिमाग
कुछ भी तो
बाकी नहीं बचता।

फिर एक बार
अंगों का अभिशिप्त कंपन
चंद पल साँसों का तूफ़ान
पसीने की सड़न के साथ
तुम्हारे प्यार की खुशबु
लौटा लाता है,
सुला देता है नम आँखों को।

मेरी खो गयी दोस्त!

यूँ ही कट जाती है
किसी अजनबी बिस्तर पर
एक और ज़ख़्मी रात।

(रफत आलम)

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