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फ़रवरी 8, 2015

दलाली … हरिशंकर परसाई की दृष्टि से

एक दिन राजा ने खीझकर घोषणा कर दी कि मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटका दिया जाएेगा।

सुबह होते ही लोग बिजली के खम्भों के पास जमा हो गये। उन्होंने खम्भों की पूजा की,आरती उतारी और उन्हें तिलक किया।

शाम तक वे इंतजार करते रहे कि अब मुनाफाखोर टांगे जाएेंगे- और अब। पर कोई नहीं टाँगा गया।

लोग जुलूस बनाकर राजा के पास गये और कहा,”महाराज,आपने तो कहा था कि मुनाफाखोर बिजली के खम्भे से लटकाये जाएेंगे,पर खम्भे तो वैसे ही खड़े हैं और मुनाफाखोर स्वस्थ और सानन्द हैं।”

राजा ने कहा,”कहा है तो उन्हें खम्भों पर टाँगा ही जाएेगा। थोड़ा समय लगेगा। टाँगने के लिये फन्दे चाहिये। मैंने फन्दे बनाने का आर्डर दे दिया है। उनके मिलते ही,सब मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से टाँग दूँगा।

भीड़ में से एक आदमी बोल उठा,”पर फन्दे बनाने का ठेका भी तो एक मुनाफाखोर ने ही लिया है।”

राजा ने कहा,”तो क्या हुआ? उसे उसके ही फन्दे से टाँगा जाएेगा।”

तभी दूसरा बोल उठा,”पर वह तो कह रहा था कि फाँसी पर लटकाने का ठेका भी मैं ही ले लूँगा।”

राजा ने जवाब दिया,”नहीं,ऐसा नहीं होगा। फाँसी देना निजी क्षेत्र का उद्योग अभी नहीं हुआ है।”

लोगों ने पूछा,” तो कितने दिन बाद वे लटकाये जाएेंगे।”

राजा ने कहा,”आज से ठीक सोलहवें दिन वे तुम्हें बिजली के खम्भों से लटके दीखेंगे।”

लोग दिन गिनने लगे।

सोलहवें दिन सुबह उठकर लोगों ने देखा कि बिजली के सारे खम्भे उखड़े पड़े हैं। वे हैरान हो गये कि रात न आँधी आयी न भूकम्प आया,फिर वे खम्भे कैसे उखड़ गये!

उन्हें खम्भे के पास एक मजदूर खड़ा मिला। उसने बतलाया कि मजदूरों से रात को ये खम्भे उखड़वाये गये हैं। लोग उसे पकड़कर राजा के पास ले गये।

उन्होंने शिकायत की ,”महाराज, आप मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से लटकाने वाले थे ,पर रात में सब खम्भे उखाड़ दिये गये। हम इस मजदूर को पकड़ लाये हैं। यह कहता है कि रात को सब खम्भे उखड़वाये गये हैं।”

राजा ने मजदूर से पूछा,”क्यों रे,किसके हुक्म से तुम लोगोंने खम्भे उखाड़े?”

उसने कहा,”सरकार ,ओवरसियर साहब ने हुक्म दिया था।”

तब ओवरसियर बुलाया गया।

उससे राजा ने कहा,” क्यों जी तुम्हें मालूम है ,मैंने आज मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटकाने की घोषणा की थी?”

उसने कहा,”जी सरकार!”

“फिर तुमने रातों-रात खम्भे क्यों उखड़वा दिये?”

“सरकार,इंजीनियर साहब ने कल शाम हुक्म दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ दिये जाएें।”

अब इंजीनियर बुलाया गया। उसने कहा उसे बिजली इंजीनियर ने आदेश दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ देना चाहिये।

बिजली इंजीनियर से कैफियत तलब की गयी,तो उसने हाथ जोड़कर कहा,”सेक्रेटरी साहब का हुक्म मिला था।”

विभागीय सेक्रेटरी से राजा ने पूछा,खम्भे उखाड़ने का हुक्म तुमने दिया था।”

सेक्रेटरी ने स्वीकार किया,”जी सरकार!”

राजा ने कहा,” यह जानते हुये भी कि आज मैं इन खम्भों का उपयोग मुनाफाखोरों को लटकाने के लिये करने वाला हूँ,तुमने ऐसा दुस्साहस क्यों किया।”

सेक्रेटरी ने कहा,”साहब ,पूरे शहर की सुरक्षा का सवाल था। अगर रात को खम्भे न हटा लिये जाते, तो आज पूरा शहर नष्ट हो जाता!”

राजा ने पूछा,”यह तुमने कैसे जाना? किसने बताया तुम्हें?

सेक्रेटरी ने कहा,”मुझे विशेषज्ञ ने सलाह दी थी कि यदि शहर को बचाना चाहते हो तो सुबह होने से पहले खम्भों को उखड़वा दो।”

राजा ने पूछा,”कौन है यह विशेषज्ञ? भरोसे का आदमी है?”

सेक्रेटरी ने कहा,”बिल्कुल भरोसे का आदमी है सरकार।घर का आदमी है। मेरा साला होता है। मैं उसे हुजूर के सामने पेश करता हूँ।”

विशेषज्ञ ने निवेदन किया,” सरकार ,मैं विशेषज्ञ हूँ और भूमि तथा वातावरण की हलचल का विशेष अध्ययन करता हूँ। मैंने परीक्षण के द्वारा पता लगाया है कि जमीन के नीचे एक भयंकर प्रवाह घूम रहा है। मुझे यह भी मालूम हुआ कि आज वह बिजली हमारे शहर के नीचे से निकलेगी। आपको मालूम नहीं हो रहा है ,पर मैं जानता हूँ कि इस वक्त हमारे नीचे भयंकर बिजली प्रवाहित हो रही है। यदि हमारे बिजली के खम्भे जमीन में गड़े रहते तो वह बिजली खम्भों के द्वारा ऊपर आती और उसकी टक्कर अपने पावरहाउस की बिजली से होती। तब भयंकर विस्फोट होता। शहर पर हजारों बिजलियाँ एक साथ गिरतीं। तब न एक प्राणी जीवित बचता ,न एक इमारत खड़ी रहती। मैंने तुरन्त सेक्रेटरी साहब को यह बात बतायी और उन्होंने ठीक समय पर उचित कदम उठाकर शहर को बचा लिया।

लोग बड़ी देर तक सकते में खड़े रहे। वे मुनाफाखोरों को बिल्कुल भूल गये। वे सब उस संकट से अविभूत थे ,जिसकी कल्पना उन्हें दी गयी थी। जान बच जाने की अनुभूति से दबे हुये थे। चुपचाप लौट गये।

उसी सप्ताह बैंक में इन नामों से ये रकमें जमा हुईं:-

सेक्रेटरी की पत्नी के नाम- २ लाख रुपये

श्रीमती बिजली इंजीनियर- १ लाख

श्रीमती इंजीनियर -१ लाख

श्रीमती विशेषज्ञ – २५ हजार

श्रीमती ओवरसियर-५ हजार

उसी सप्ताह ‘मुनाफाखोर संघ’ के हिसाब में नीचे लिखी रकमें ‘धर्मादा’ खाते में डाली गयीं-

कोढ़ियों की सहायता के लिये दान- २ लाख रुपये

विधवाश्रम को- १ लाख

क्षय रोग अस्पताल को- १ लाख

पागलखाने को-२५ हजार

अनाथालय को- ५ हजार

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जनवरी 9, 2014

मानिनी हठ-धारिणी

जब बहुत कुछ हो कहने कोsimi-001

और शब्द गले तक भर गए हों

आपाधापी में  कोई बाहर नहीं आ पाता

कुछ बह निकलते हैं आँखों की राह

कुछ रह जाते हैं फंस कर वहीँ

टूटे टूटे कुछ बेतरतीब कुछ कहे

कुछ अनकहे…

कुछ अक्सर दिखने वाले लेकिन समझ के परे

रात के सपने से …

जिनमे मैंने तुम्हे अक्सर देखा है

उद्दीप्त…उष्ण…आवेशित…

प्यार के मौन आमंत्रण लिए अपनी आँखों में

कभी खुद से सकुचाती…

कंचुकी की गाँठ टटोलते…

संभालते…

बार -बार

कभी यौवन भार से झुकी जाती

कभी उन्नत मस्तक रूप गर्विता

कभी स्वयमेव समर्पिता

कभी मानिनी हठ-धारिणी

कुछ वैसे ही जैसे हतप्रभ बिजली गिरने से

न ये समझे कि दिशा कौन जाए हिरनी!

Rajnish sign

दिसम्बर 23, 2013

शीशे से पत्थर तोड़ते ‘अरविन्द केजरीवाल’ और ‘आप’

arvind kejriwal-001पत्थर से शीशा तोडना तो रोजमर्रा की बात है, पर बात तो तभी जमती है जब कोई शीशे से पत्थर को तोड़कर उसे तराश कर दिखाए|

अरविन्द केजरीवाल‘ और उनके दल ‘आप‘ ने विगत में यह करिश्मा करके दिखाया जब उन्होंने पारदर्शी तरीके से चन्दा जुटाया और 20 करोड़ रुपयों में 70 सीटों पर चुनाव लड़कर 28 सीटें जीतीं, जबकि ऐसा कहा जाता है कि जमे जमाये दल एक विधायक की सीट के लिए भी करोड़ो रूपये खर्च कर देते हैं और यह तो सर्वविदित है ही कि पिछले साढ़े छः दशकों में किसी भी दल ने कभी भी अपने को मिले धन के बारे में पारदर्शिता नहीं दिखाई और कोई नहीं जानता कहाँ से उन्हें सैंकडों करोड़ रूपये मिलते रहे हैं| ‘आप‘ ने भारतीय राजनीति को स्वच्छ बनाने की ओर एक कदम उठा दिया है और अब जनता के हाथ में है कि वह बाकी दलों को भी मजबूर करे कि वे अपने आर्थिक स्रोतों का खुलासा करें और अपनी चन्दा व्यवस्था को पारदर्शी बनाएँ| वरना तो सभी को पता है कि जो धन कुबेर उन्हें करोड़ों दे रहे हैं वे उन्हें मुफ्त में धन नहीं देते रहे और उनकी अपेक्षायें चुनाव में जीतने के बाद उनकी आर्थिक कृपादृष्टि से लाभ पाए दल पूरा करते रहे होंगे| यह विशुद्ध लेन देन वाला व्यापार रहा है| इसी लेन देन की भारतीय राजनीतिक अर्थशास्त्र की प्रक्रिया ने भारत की तरक्की को असमानता वाला बनाया है क्योंकि धन कुबेरों ने कोई धर्मखाता तो खोल नहीं रखा है| राजनीतिक दलों ने ऐसे ही निर्णय लिए होंगे जिससे धन का लाभ लेने वाले दल उन्ही प्रोजेक्टों को पास करते रहे हैं जिससे उन्हें धन देने वाले कुबेरों का लाभ होता रहे| काले धन की बुनियाद पर खड़ी राजनीतिक व्यवस्था ने भारतीय समाज को आकंठ भ्रष्टाचार के दलदल में धकेल दिया है|

दूसरी बार पत्थर को शीशे से ‘आप‘ ने तोड़ा जब उसने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि बड़े दलों की जातीय, साम्प्रदायिक और तमाम तरह के भेदों वाली राजनीति से परे जाकर चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है| ‘आप‘ के उम्मीदवारों की न मतदाताओं ने जाति देखी, न क्षेत्रीयता और न ही उनका संप्रदाय|

तीसरी बार शीशे से पत्थर को तोड़ने और तराशने का काम ‘आप‘ ने तब किया जब भाजपा और कांग्रेस ने जाल बिछाकर ‘आप‘ को बदनाम करना चाहा कि वे लोगों से झूठे वादे करके चुनाव में इतनी सीटें जीते हैं और अब सरकार न बना कर अपनी खाल बचाना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वे अपने वादे पूरे नहीं कर पायेंगे|

कर्मठ और ईमानदार आदमी अगर बुद्धिमान भी हो तो भविष्य में बसे संभावित परिणामों में से सबसे बेहतर को हाथ बढ़ा अपने लिए पकड़ लेता है| ताजे दिमाग की भांति ‘आप‘ ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को बैकफुट पर भेज दिया सरकार बनाने के लिए दिल्ली की जनता की राय जानने के लिए लोगों से दुबारा समपर्क स्थापित करके| यह बुद्धिमत्ता भरा पूर्ण कदम था जिसने कांग्रेस को थोड़ा कम (क्योंकि उसकी तो केवल आठ ही  सीटें आयी हैं), पर भाजपा को बौखलाहट के स्तर तक दहका दिया और कल तक ‘आप’ को रोज चुनौती दे रही भाजपा के सुर ही बदल गये| वे सीधे सीधे ‘आप‘ पर किस्म किस्म के उलजलूल आरोप मढने लगे|

अब जबकि यह तय हो गया है कि ‘अरविन्द केजरीवालदिल्ली के अगले मुख्यमंत्री बन रहे हैं, भाजपा के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसक गयी है| उसकी सरकार किसी भी हालत में नहीं बन पा रही थी| ‘आप‘ द्वारा रचे गये नैतिक माहौल के कारण वह ‘आप‘ के नवनिर्वाचित विधायकों को तोड़ने का प्रयास करती भी नहीं दिखना चाहती थी और कांग्रेस और ‘आप’ दोनों में से कोई भी दल उसे समर्थन दे नहीं सकता था| उसकी हालत देख पुरानी कहावत “खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे” चिरतार्थ होती दिखाई दे रही है| भाजपा के नेता ‘आप‘ के बारे में केवल तीन चार दिन पहले दिए गये बयानों से उलट वाणी बोल उस पर आक्रमण कर रहे हैं|

यह ‘आप‘ की राजनीति की ही सूक्ष्म कला है कि ‘आप‘ एकदम स्पष्ट शब्दों में बोल रही है कि उसने कांग्रेस से समर्थन नहीं लिया है और कांग्रेस उसकी  या वह कांग्रेस की सहायक पार्टी नहीं है| वह अपनी 28 सीटों के बलबूते सरकार बनाने जा रही है और बिलकुल मुमकिन है कि विधानसभा में पहले ही दिन ‘आप‘ की सरकार विश्वास मत हासिल न कर पाए| वैसे ऐसा लगता नहीं है कि समर्थन की घोषणा करके कांग्रेस पहले ही दिन सरकार गिराने की बदनामी अपने सिर लेना चाहेगी| पूंजीपतियों की नीतियों के हितों की परवाह कर करके कांग्रेस और भाजपा को इस बात की उत्सुकता भी है कैसे ‘आप‘ उन वादों को पूरा कर सकती है जो उसने अपने 70 घोषणापत्रों में किये थे|

सरकार बनाने के बाद ‘आप‘ का अगला कारनामा होगा दिल्ली में बिजली की दरों के मामले में दिल्ली वासियों को बड़ी राहत देना| ‘आप‘ ने भली भांति अध्ययन करके ही इतनी बड़ी घोषणा की है और इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए आगामी दिनों में दिल्लीवासियों को बिजली के मामले में एक बड़ी राहत मिलने वाली है और देश में पहली बार कोई ऐसा मुख्यमंत्री सत्ताधीन होगा जो केवल मुनाफे के लिए जोड़तोड़ करने वाली कंपनियों की हाँ में हाँ नहीं मिलाएगा| ‘अरविन्द केजरीवाल‘ के लिए ऐसा कर पाना मुमकिन होगा क्योंकि उन्होंने किसी कम्पनी से धन लेकर चुनाव नहीं लड़ा है और उन पर किसी किस्म का दबाव नहीं है कि वे जनता के हितों को कंपनियों के आलीशान दफ्तरों में गिरवी रख दें|

रोजाना ‘700 लीटर‘ पानी इस्तेमाल करने वाले परिवार को ‘जलमित्र‘ घोषित करना निस्संदेह बेहद बुद्धिमानी का कदम होगा| 701 और उससे ऊपर पानी की मात्रा इस्तेमाल करने वाले परिवार पूरे पानी का धन देंगे और जब वे देखेंगे कि उनसे केवल 1-2 लीटर काम पानी इस्तेमाल करने वाला परिवार मुफ्त में पानी का उपयोग कर पा रहा है तो उसमें अपने आप चेतना आयेगी कि वह भी 700 लीटर पानी में ही गुजारा करे| शुरू में इस कदम के आलोचक इसका अर्थ भले ही न समझ पायें पर अगर यह योजना चल निकली तो एक साल के आंकडें जल सरंक्षण और जल वितरण की दिशा में काम करने वाले लोगों के लिए आँखें खोलने वाले सिद्ध हो सकते हैं| जो छोटे परिवार रोजाना 300-400 लीटर पानी से ही गुजारा करते रहे हैं वे इस योजना के सीधे लाभार्थी होंगे| यहाँ यह जिक्र करना निरर्थक न होगा कि भाजपा और कांग्रेस, जिन्होने ‘आप‘ का घोषणापत्र गहराई से पढ़ने की जहमत नहीं उठाई है और सतही तौर पर पढ़ कर इसकी आलोचना करते रहे हैं, पानी वाले मुद्दे पर ‘आप‘ की खिल्ली उड़ाकर दरअसल अपने को ही हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा चुके हैं| अगर उन्होंने ढंग से पानी वाला मुद्दा पढ़ा होता तो ‘आप‘ की खिल्ली उड़ाने के बारे में सोचते भी नहीं|

दिल्ली पुलिस को जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था लेने से इनकार करके ‘अरविन्द केजरीवाल‘ ने एक नई परिपाटी की शुरुआत की है| छुटभैये नेता भी इसी जुगाड में लगे रहते हैं कि उन्हें एक दो सरकारी गनर मिल जाएँ जिससे कि वे अपने रुतबे को समाज में दिखा सकें और बाबा रामदेव जैसे अतिमहत्वाकांक्षी योग गुरु और दवा व्यापारी ने तो जेड प्लस सुरक्षा लेने के लिए जी तोड कोशिश की थी| यही हाल भाजपा के प्रधानमंत्री पड़ के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का है जिनके लिए जेड प्लस सुरक्षा लेने के लिए भाजपा ने जमीन आसमान एक कर दिया था| जहां सड़क दुर्घटनाएं आम हों और राजनीतिक विरोधियों को आसानी से ठिकाने लगा दिया जाता रहा हो वहाँ सुरक्षा लेने से इनकार करके ‘अरविन्द केजरीवाल‘ ने खतरा उठाया है पर सत्य यह भी है कि अगर गांधी जिंदा होते, सुभाष बोस जिंदा होते या भगत सिंह जिंदा होते और देश के नेता होते तो वे भी कभी सुरक्षा के नाम पर जनता से दूरी न बनाते|

यह भी आज का बहुत बड़ा सत्य है जनता का वह तबका जिसका जमीर राजनीतिक दलों के यहाँ बंधक नहीं है, मौजूदा राजनीतिक माहौल से इस कदर उकता चुका है कि अगर ‘अरविन्द केजरीवाल‘ जैसी नई आशा को खरोंच भी आती है तो पूरा विश्व इस बात का गवाह बन सकता है कि जब आम जनता का गुस्सा फूटता है तो बड़े बड़े तख़्त हिल जाते हैं और बाद एबदे सूरमा धराशायी हो जाते हैं| ‘अरविन्द केजरीवाल‘ की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब हर राजनीतिक दल की है क्योंकि अरविन्द केजरीवाल को कुछ भी होने की अवस्था में नुकसान राजनीतिक दलों का ही होना है| हो सकता है बहुत से दलों का राजनीतिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाए और उन्हें हमेशा के लिए निर्वासन पर जाना पड़ जाए|

अरविन्द केजरीवाल‘ का यह कदम वी.आई.पी संस्कृति से बुरी तरह से ग्रसित और दूषित दिल्ली के सामाजिक और राजनीतिक के सुधार की ओर एक बड़ा कदम है| और उनका और उनके मंत्रियों और विधायकों की साधारण जीवन शैली आने वाले दिनों में राजसी जीवन जीने के आदि हो चुके नेताओं के लिए खतरे का सबब बनने वाली है| |

अरविन्द केजरीवाल‘ को अभी बहुत से पत्थरों को शीशे से तोड़ कर तराश कर उन्हें खूबसूरत बुतों का आकार प्रदान करना है|  पर ईमानदारी, सच्चाई का साथ और हौसला उन्हें कामयाबी दिलाएगा बड़े से बड़े मुकाम पाने में|

जान हथेली पर रख निडर होकर आगे बढ़ने वाले सूरमाओं के लिए ही कहा गया है :-

हयाते- जाविदां आई है जां-बाजों के हिस्से में

हमेशा जीने वाले है ये जितने मरने वाले हैं

नवम्बर 16, 2013

चिराग जिस्मों के

होता  है अहसास बहुत अलग सा  dreamwo-001

जब

आँखे खोलते हैं

सपने मेरे

तुम्हारी बाहों में…

अजब सी इक सिहरन

जैसे

छू  गयी हो लपक के बिजली आसमान की

दिल दिमाग सुन्न बस…

  वश में तुम्हारे सब|

एक ही ख्वाहिश रह जाती है

बस कि

चैन पाएं

मुंह छुपा कर

तुम्हारे सीने में…

सपने मेरे हद बेचैन

जागा करते हैं रात भर

आओ कि

इन्हें चैन से  नींद तो आये

रौशन रहे रात

चिरागों की तरह जलते जिस्मों की बदौलत

आओ कि

फिर चाहे सुबह न उगे

चाहे तो आए

कि फिर न दिन आए…

(रजनीश)

सितम्बर 13, 2013

आओ हम तुम चन्दा देखें

Moon

लहरों के इन हिचकोलों पर

आज नाव में संग बैठकर

साथी हसीं रात में गाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

नर्म हथेली को सहलाएं

भावों में शबनम पिघलाएं

जल में अपने पाँव हिलाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

धडकन जब लहरों पर धडके

अधरों पर बिजली सी तड़के

कोई भारी कसम उठाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

चन्दन के पेड़ों से लिपटकर

खुशबू के घेरे में सिमटकर

करते कभी महकती बातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

देखो रात जा रही है घर से

कोई गज़ल गा रही स्वर से

दामन में ले सुर-सौगातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 12, 2013

पर तुम तो घबराए बहुत …

रिमझिम-रिमझिम बरसा सावन

याद मुझे तुम आये बहुत

मन के सूने से आँगन में

गीत तुम्हारे गाये बहुत …

खुली-खुली वे जुल्फें तेरी

नभ में जैसे छाई बिजली

साफ़ चमकती दंत-पंक्तियाँ

चमक उठी हो जैसे बिजली

मैंने दृष्टि रोक दी तुम पर

तुम मन में शरमाये बहुत …

पहली बार हुआ कुछ ऐसा

जब मैं पहुंचा पास तुम्हारे

आहट-आहट में सिहरन थी

नयनों में थे आंसू खारे

मैंने हाथ बढ़ाया ही था

पर तुम तों घबराये बहुत …

शायद रात न भूलेगी वो

संग-संग जब चन्दा देखा

एक दूसरे के नयनों में

हमने गंगा-जमुना देखा

पावन संगम की तृष्णा में

दृग अपने भर आये बहुत …

रिमझिम-रिमझिम बरसा सावन

याद मुझे तुम आये बहुत

{कृष्ण  बिहारी}

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