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अक्टूबर 19, 2015

सेक्युलरिज्म : भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड (योगन्द्र यादव)

YY1सेक्युलरवाद हमारे देश का सबसे बड़ा सिद्धांत है। सेकुलरवाद हमारे देश की राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड भी है। सेकुलरवाद अग्निपरीक्षा से गुज़र रहा है।

सेक्युलर राजनीति की दुर्दशा देखनी हो तो बिहार आईये। यहाँ तमाम नैतिक, राजनैतिक, जातीय और संयोग के चलते भाजपा की विरोधी सभी ताकतें सेकुलरवाद की चादर ओढ़ कर चुनाव लड़ रही हैं। उधर लोकसभा चुनाव जीतकर अहंकार में चूर भाजपा और उसके बौने सहयोगी सेक्युलर भारत की जड़ खोदने में लगे हैं। एक तरफ बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है, दूसरी तरफ थके हारे सेकुलरवादियों की कवायद।
सेकुलरवाद कोई नया सिद्धांत नहीं है। सर्वधर्म समभाव इस देश की बुनियाद में है। यह शब्द भले ही नया हो, लेकिन जिसे हमारा संविधान सेक्युलर कहता है, उसकी इबारत सम्राट अशोक के खम्बों पर पढ़ी जा सकती है। पाषान्डो, यानी मतभिन्नता रखने वाले समुदायों के प्रति सहिष्णुता की नीति हमारे सेकुलरवाद की बुनियाद है। इस नीति की बुनियाद सम्राट अकबर के सर्वधर्म समभाव में है। इसकी बुनियाद आजादी के आन्दोलन के संघर्ष में है। इसकी बुनियाद एक सनातनी हिन्दू, महात्मा गाँधी, के बलिदान में है। हमारे संविधान का सेकुलरवाद कोई विदेश से इम्पोर्टेड माल नहीं है। जब संविधान किसी एक धर्म को राजधर्म बनाने से इनकार करता है और सभी धर्मावलम्बियों को अपने धर्म, अपने मत को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूरी आजादी देता है, तो वह हमारे देश की मिट्टी में रचे बसे इस विचार को मान्यता देता है।

लेकिन पिछले ६५ साल में सेकुलरवाद इस देश की मिट्टी की भाषा छोड़कर अंग्रेजी बोलने लग गया। सेकुलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी गयी गारंटी से देश में सेकुलरवाद स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गाँधी की भाषा छोड़कर विदेशी भाषा बोलनी शुरू कर दी। कानून, कचहरी और राज्य सत्ता के सहारे सेकुलरवाद का डंडा चलाने की कोशिश की। धीरे धीरे देश की औसत नागरिकों के दिलो दिमाग को सेक्युलर बनाने की ज़िम्मेदारी से बेखबर हो गए। उधर सेकुलरवाद की जड़ खोदने वालों ने परंपरा, आस्था और कर्म की भाषा पर कब्ज़ा कर लिया। इस लापरवाही के चलते धीरे धीरे बहुसंख्यक समाज के एक तबके को महसूस होने लगा कि हो न हो, इस सेकुलरवाद में कुछ गड़बड़ है। उन्हें इसमें अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की बू आने लगी। इस देश के सबसे पवित्र सिद्धांत में देश के आम जन की आस्था घटने लगी।
बहुसंख्यक समाज के मन को जोड़ने में नाकाम सेक्यूलर राजनीति अल्पसंख्यकों की जोड़ तोड़ में लग गयी। व्यवहार में सेक्युलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यक समाज, खासतौर पर मुस्लिम समाज, के हितों की रक्षा। पहले जायज़ हितों की रक्षा से शुरुआत हुई, धीरे धीरे जायज़ नाजायज़ हर तरह की तरफदारी को सेकुलरवाद कहा जाने लगा। इधर मुस्लिम समाज उपेक्षा का शिकार था, पिछड़ा हुआ था, और सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दृष्टि से भेदभाव झेल रहा था, उधर सेक्युलर राजनीति फल फूल रही थी। नतीजा यह हुआ कि सेक्युलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाने की राजनीति हो गयी। मुसलामानों को डराए रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट लेते जाओ। मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज को न शिक्षा, न रोज़गार, न बेहतर मोहल्लों में मकान। बस मुस्लिम राजनीति केवल कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती रहे, और औसत मुसलमान डर के मारे सेक्युलर पार्टियों को वोट देता रहे – यह ढकोसला देश में सेकुलरवाद कहलाने लगा।

सेक्युलर वाद के सिद्धांत और वोट बैंक की राजनीति के बीच की खाई का भांडा फूटना ही था। बहुसंख्यक समाज सोचता था कि सेकुलरवाद उसे दबाने और अल्पसंख्यक समाज के तुष्टिकरण का औज़ार है। अल्पसंख्यक समाज समझता कि सेकुलरवाद उन्हें बंधक बनाए रखने का षड़यंत्र है। यह खाई सबसे पहले अयोध्या आन्दोलन में दिखाई दी, जिसकी परिणीती बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई। २००२ गुजरात के नरसंहार में सेकुलरवाद फिर हारा। इस राजनैतिक प्रक्रिया की परिणीती २०१४ चुनाव में हुई।

आज सेक्युलर राजनीति थकी हारी और घबराई हुई है। नरेन्द्र मोदी की अभूतपूर्व विजय और उसके बाद से देश भर में सांप्रदायिक राजनीति के सिर उठाने से घबराई हुई है। पिछले २५ साल में छोटे बड़े लड़ाई हार कर आज मन से हारी हुई है। देश के सामान्य जन को सेक्युलर विचार से दुबारा जोड़ने की बड़ी चुनौती का सामना करने से पहले ही थकी हुई है। इसलिए आज सेक्युलर राजनीति शॉर्ट-कट हो गयी है, किसी जादू की तलाश में है, किसी भी तिकड़म का सहारा लेने को मजबूर है।

बिहार का चुनाव किसी थकी हारी घबराई सेक्युलर राजनीति का नमूना है। जब सेक्युलर राजनीति जन चेतना बनाने में असमर्थ हो जाती है, जब उसे लोकमानस का भरोसा नहीं रहता, तब वो किसी भी तरह से भाजपा को हराने का नारा देती है। इस रणनीति के तहत भ्रष्टाचार क्षम्य है, जातिवाद गठबंधन क्षम्य है और राज काज की असफलता भी क्षम्य है। बस जो भाजपा के खिलाफ खड़ा है, वो सही है, सेक्युलर है। बिहार के चुनाव परिणाम बताएँगे की यह रणनीति सफल होती है या नहीं। अभी से चुनावी भविष्यवाणी करना बेकार है। संभव है कि नितीश-लालू की रणनीति कामयाब हो भी जाए। यह भी संभव है सेकुलरवाद के नाम पर भानुमती का कुनबा जोड़ने की यह कवायद बिहार की जनता नामंज़ूर कर दे। यह तो तय है कि इस गठबंधन के पीछे मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो जाएगा। लेकिन यह ही तो भाजपा भी चाहती है, ताकि उसके मुकाबले हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। अगर ऐसा हुआ तो पासा उल्टा पड़ जाएगा। चुनाव का परिणाम जो भी हो, इस चुनाव में बिहार हारेगा, सेक्युलर राजनीति हारेगी।

अगर देश के पवित्र सेक्युलर सिद्धांत को बचाना है तो सेक्युलर राजनीति को पुनर्जन्म लेना होगा, सेक्युलर राजनीति को दोबारा लोकमानस से सम्बन्ध बनाना होगा, अल्पसंख्यकों से केवल सुरक्षा की राजनीती छोड़कर शिक्षा, रोज़गार और प्रगति की राजनीती शुरू करनी होगी। शायद अशोक का प्रदेश बिहार एक अच्छी जगह है इस राजनीति की शुरुआत के लिए।

(योगेन्द्र यादव)

अक्टूबर 29, 2014

गरीब की “छठ” और भारतीय रेल : रवीश कुमार (NDTV)

Chhathये कौन सा भारत है जहां पखाने में लोग बैठकर अपना सबसे पवित्र त्योहार मनाने घर जा रहे हैं। क्या हम इतने क्रूर होते जा रहे हैं कि सरकार, राजनीति और समाज को इन सब तस्वीरों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हर राज और हर साल की यह तस्वीर है। राजनीति और सरकार की समझ पर उस खाते पीते मध्यम वर्ग ने अवैध कब्ज़ा कर लिया है जो ट्वीटर और फेसबुक पर खुद ही अपनी तस्वीर खींच कर डालता हुआ अघाए रहता है। जो अपनी सुविधा का इंतज़ाम ख़ुद कर लेता है। लेकिन रेल आने से घंटों पहले कतार में खड़े उन ग़रीबों की कोई सेल्फी कहीं अपलोड नहीं हो रही है जिनकी आवाज़ अब सिस्टम और मीडिया से दूर कर दी गई है। ये बिहारी नहीं हैं। ये ग़रीब लोग हैं जो छठ मनाने के लिए दिल्ली या देश के अन्य हिस्सों से बिहार जाना चाहते हैं। हर साल जाते हैं और हर साल स्पेशल ट्रेन चलाने के नाम पर इनके साथ जो बर्ताव होता है उसे मीडिया भले न दर्ज करे लेकिन दिलों दिमाग़ में सिस्टम और समाज के प्रति तो छवि बन रही है वो एक दिन ख़तरनाक रूप ले लेगी। साल दर साल इन तस्वीरों के प्रति हमारी उदासीनता बता रही है कि देखने पढ़ने वाला समाज कितना ख़तरनाक हो गया है। वो अब सिर्फ अपने लिए हल्ला करता है, ग़रीबों की दुर्गति देखकर किनारा कर लेता है।

न्यूज़ चैनलों पर जो तस्वीरें दिखाईं जा रही हैं उन्हें ध्यान से देखिये। दस बारह लोग उस शौच में किसी तरह ठूंसे पड़े हैं। नीचे से लेकर ऊपर की सीट भरी पड़ी है। चलने के रास्ते पर लोग बैठे हैं। आदमी की गोद में आदमी बैठा है। आदमी की गोद में औरत बैठी है और औरत की गोद में बच्चा। बच्चे किसी तरह ट्रेन की बोगी में घुस गए हैं और वे वहीं कहीं घुसिया कर खड़े हैं। कोई शौचालय तक के लिए नहीं उठ सकता। पिछले साल कई लोगों ने बताया था कि चौदह पंद्रह घंटे हो जाते हैं शौचालय गए। पुरुष और औरतें दोनों बीमार पड़ जाते हैं। कुछ लोग वहीं बैठे बैठे बोतल में पेशाब करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बच्चों की हालत का अंदाज़ा कीजिए और बस एक मिनट के लिए समझ लिए कि आपके बच्चे के साथ ऐसा हुआ हो तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी। किसी तरह घुट घुट कर लोग सफर करने के लिए मजबूर किये जा रहे हैं।

आपके मन में यह ख़्याल आ रहा होगा कि इतनी आबादी हो गई है कि क्या किया जाए लेकिन आबादी के कारण मध्यम वर्ग को तो ऐसी सज़ा नहीं भुगतनी पड़ती है। कुहासे के कारण दो चार फ्लाईट देर से चलने लगती है तो सारे न्यूज चैनलों पर लाइव कवरेज़ होने लगता है। लोग अपनी सेल्फी भेजने लगते हैं कि एयरकंडिशन एयरपोर्ट पर दो घंटे से बैठे हैं। रेल तो रोज़ दो चार घंटे चलकर पहुंचती रहती है। कोई शोर नहीं होता बस बुलेट ट्रेन का ख़्वाब परोस दिया जाता है। एक बुलेट ट्रेन की लागत में कितनी धीमी रफ्तार की ट्रेनें राजधानी में बदल जाएंगी  इसका हिसाब मध्यमवर्ग नहीं करेगा क्योंकि इससे ग़रीबों को लाभ होगा। आख़िर क्यों इन तस्वीरों को हिन्दी न्यूज़ चैनलों के भरोसे छोड़ दिया गया। अंग्रेज़ी के अख़बार लोगों की इन तकलीफों से क्यों दूर रहे। क्यों मध्यमवर्ग ने हंगामा नहीं किया कि देखो ये मेरा इंडिया है। पहले इसे देखो इसे कितनी तकलीफ हो रही है। रविवार शाम प्रधानमंत्री कई सांसदों के साथ चाय पी रहे थे। सबको सही सलाह दी कि लोगों के बीच जाइये। गांवों में जाइये। यह बात तो सही है और यही होना भी चाहिए लेकिन क्या उनके रेल मंत्री उस वक्त प्लेटफार्म पर थे जब लोग मल मूत्र के कमरे में ठूंस कर सफर करने के लिए मजबूर हो रहे थे। उनकी पार्टी या किसी भी पार्टी का कोई सांसद था जो इन लोगों की तकलीफ के वक्त साथ हो।

ट्रेनों में ठुसाएं हुए इन लोगों की तस्वीरों को फिर से देखियेगा। किसी के चहरे पर रौनक नहीं है। किसी का कपड़ा महंगा नहीं हैं। चेहरे पर थकान है। हताशा है और ठगे जाने की हैरत। बच्चों के कपड़े लाल पीले रंग के हैं जो हम जैसे मध्यमवर्गीय कुलीन लोग पहनाना भी पसंद न करें। कोई मां किसी तरह तीन चार महीने के बच्चे को कलेजे से लगाए किसी की गोद में बैठी थी। ये वो लोग हैं जिनसे दिल्ली ,लुधियाना और सूरत का काम चलता है। ये जीने भर कमा लेते हैं और साल में एक बार घर जाने भर बचा लेते हैं। अचनाक असहाय ग़रीबों की तस्वीरों से टीवी का स्क्रीन भर गया लेकिन उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात में भरना चाहिए। सबको पता है इनके पास अखबारों की खबरें छांट छांट कर पढ़ने और सत्ता के खेल को समझने का वक्त नहीं है। ये वो लोग हैं जो चुनाव के वक्त प्रबंधन और नारों से हांक लिये जाते हैं। महानगरों के मध्यमवर्ग को इनकी सूरत ठीक से देखनी चाहिए। ये वही लोग हैं जिनके सामने वो अपने रोज़ाना के काम के लिए गिड़गिड़ाता है। सारा दिन काम कराकर दिवाली की बख्शीश के नाम पर ठीक से पचास रुपये भी नहीं देता। फिर भी एक करीब का रिश्ता तो है इनसे लेकिन ऐसा कैसे हो रहा है कि हम देखकर चुप हो जा रहे हैं।

दुनिया में जब तक गरीबी रहेगी तब तक बहुत से लोग जाते रहेंगे। इनका घर जाना इस बात का ज़िंदा प्रमाण है कि तमाम घोषणाओं के बाद भी ग़रीबी है और गर्वनेंस के तमाम दावों के बाद भी सिस्टम इनके प्रति सहानुभूति नहीं रखता। अचानक कहीं से बजबजाकर निकल आए इन लोगों की तस्वीर कुछ वक्त के लिए टीवी पर छा गई है। फिर धीरे धीरे गायब हो जाएगी और यही लोग तमाम बड़ी कंपनियों की कामयाबी के किस्से में ठेके के मज़दूर बनकर बिला जाएंगे। इनके रहने की जगह और ट्रेन के उस शौचालय में कोई फर्क नहीं जिसमें वे ठूंस ठूंस कर भरे जा रहे हैं। जिन झुग्गियों में ये रहते हैं आप एक बार वहां जाएं तो पता चलेगा। बल्कि पब्लिक स्कूल बच्चों को नहीं ले जाते तो आप अपने बच्चों को इन झुग्गियों में लेकर जाइये ताकि बच्चे के साथ साथ आप भी संवेदनशील हो सकें कि आपके उस इंडिया का नागरिक किन हालात में रहता है जो इंडिया चीन और अमरीका को हराने निकला है। वैसे चीन और अमरीका में भी ग़रीबों को ऐसे ही हालात में रहना पड़ता है। अगर सिस्टम इन ग़रीबों के प्रति उदार नहीं हुआ तो एक दिन ये बुलेट ट्रेन पर भी इसी तरह कब्ज़ा कर लेंगे। वो मिडिल क्लास को ठेल कर अपने आपको हर उन खांचों तक में ठूंस देंगे जिनमें मध्यमवर्ग का नया सेल्फी क्लास मल मूत्र त्याग करता है। छठ की इस यात्रा की ये तस्वीरों हम सबके लिए शर्मनाक प्रसारण है।

आजकल कई लोग पूछते हैं कि सबको छठ पर जाने की क्यों पड़ी है। छठ में हम इसलिए जाते हैं ताकि जो घर ख़ाली कर आए हैं उसे फिर से भर सकें। छठ ही वो मौका है जब लाखों लोग अपने गांव घर को कोसी की तरह दीये और ठेकुए से भर देते हैं। गांव गांव खिल उठता है। इस खुशी के लिए ही वो इतनी तकलीफदेह यात्राएं करते हैं। छठ गांवों के फिर से बस जाने का त्योहार है। आप जाकर देखिये गांवों में कहां कहां से लोग आए होते हैं। हिन्दुस्तान का हर हिस्सा बिहार में थोड़े दिनों के लिए पहुंच जाता है। हम बिहारी लोग छठ से लौट कर कुछ दिनों बाद फिर से ख़ाली हो जाते हैं। छठ आता है तो घर जाने के नाम पर ही भरने लगते हैं। इसलिए इस मौके पर घर जाने को कोई दूसरा नहीं समझेगा। किसी समाजशास्त्री ने भी अध्ययन नहीं किया होगा कि क्यों छठ के वक्त घर आने का बुलावा आता है। सबको पता है बाहर की नौकरी और ज़िंदगी एक दिन इस रिश्ते को कमज़ोर कर देगी फिर सबकुछ हमेशा के लिए छूट जाएगा। छठ ही वो आख़िरी गर्भनाल है जो इस रिश्ते को छूटने नहीं देता। साल में एक बार घर बुला लेता है। जो नहीं जाते हैं वो भी छठ में घर ही रहते हैं। मैं नहीं जा रहा हूं लेकिन मेरा सिस्टम अपने आप किसी वाई फाई की तरह बिहार के गांव घरों से कनेक्ट हो गया है।

 

(रवीश कुमार)

साभार – प्रभात खबर,  एवं रविश कुमार का ब्लॉग “कस्बा”

अगस्त 17, 2011

मुनादी…(धर्मवीर भारती)

सत्तर के दशक में डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखी कविता “मुनादी” उस समय की घटनाओं से प्रेरित थी पर किसी भी दौर में जब जब सत्ता निरंकुशता की ओर बढ़ेगी और जनता से कोई आगे आकर सत्ता की असंवेदनशीलता के खिलाफ आवाज उठायेगा तब-तब “मुनादी“-कविता, प्रासंगिक हो जायेगी। आज के हालात में भी “मुनादी” सटीक बैठती है। बार-बार “मुनादी” का सतह पर आना इसके कालजयी रचना होने का प्रमाण है।

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है

शहर का हर बशर वाकिफ है
कि पच्चीस साल से मुजिर है यह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और असमत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाये

जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं
और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है ?

आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए
रात-रात जागते हैं;
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक
छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…
तोड़ दिये जाएँगे पैर
और फोड़ दी जाएँगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चल कर
महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराइयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी जवाँमर्दी की दाद दें

अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाए

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुँचो

इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी
बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप
क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाए

बेताब मत हो
तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा
दर्शन करो !
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी
बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा
नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा
लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से
बहा, वह पुँछ जाए

बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं

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