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अक्टूबर 19, 2015

सेक्युलरिज्म : भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड (योगन्द्र यादव)

YY1सेक्युलरवाद हमारे देश का सबसे बड़ा सिद्धांत है। सेकुलरवाद हमारे देश की राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड भी है। सेकुलरवाद अग्निपरीक्षा से गुज़र रहा है।

सेक्युलर राजनीति की दुर्दशा देखनी हो तो बिहार आईये। यहाँ तमाम नैतिक, राजनैतिक, जातीय और संयोग के चलते भाजपा की विरोधी सभी ताकतें सेकुलरवाद की चादर ओढ़ कर चुनाव लड़ रही हैं। उधर लोकसभा चुनाव जीतकर अहंकार में चूर भाजपा और उसके बौने सहयोगी सेक्युलर भारत की जड़ खोदने में लगे हैं। एक तरफ बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है, दूसरी तरफ थके हारे सेकुलरवादियों की कवायद।
सेकुलरवाद कोई नया सिद्धांत नहीं है। सर्वधर्म समभाव इस देश की बुनियाद में है। यह शब्द भले ही नया हो, लेकिन जिसे हमारा संविधान सेक्युलर कहता है, उसकी इबारत सम्राट अशोक के खम्बों पर पढ़ी जा सकती है। पाषान्डो, यानी मतभिन्नता रखने वाले समुदायों के प्रति सहिष्णुता की नीति हमारे सेकुलरवाद की बुनियाद है। इस नीति की बुनियाद सम्राट अकबर के सर्वधर्म समभाव में है। इसकी बुनियाद आजादी के आन्दोलन के संघर्ष में है। इसकी बुनियाद एक सनातनी हिन्दू, महात्मा गाँधी, के बलिदान में है। हमारे संविधान का सेकुलरवाद कोई विदेश से इम्पोर्टेड माल नहीं है। जब संविधान किसी एक धर्म को राजधर्म बनाने से इनकार करता है और सभी धर्मावलम्बियों को अपने धर्म, अपने मत को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूरी आजादी देता है, तो वह हमारे देश की मिट्टी में रचे बसे इस विचार को मान्यता देता है।

लेकिन पिछले ६५ साल में सेकुलरवाद इस देश की मिट्टी की भाषा छोड़कर अंग्रेजी बोलने लग गया। सेकुलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी गयी गारंटी से देश में सेकुलरवाद स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गाँधी की भाषा छोड़कर विदेशी भाषा बोलनी शुरू कर दी। कानून, कचहरी और राज्य सत्ता के सहारे सेकुलरवाद का डंडा चलाने की कोशिश की। धीरे धीरे देश की औसत नागरिकों के दिलो दिमाग को सेक्युलर बनाने की ज़िम्मेदारी से बेखबर हो गए। उधर सेकुलरवाद की जड़ खोदने वालों ने परंपरा, आस्था और कर्म की भाषा पर कब्ज़ा कर लिया। इस लापरवाही के चलते धीरे धीरे बहुसंख्यक समाज के एक तबके को महसूस होने लगा कि हो न हो, इस सेकुलरवाद में कुछ गड़बड़ है। उन्हें इसमें अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की बू आने लगी। इस देश के सबसे पवित्र सिद्धांत में देश के आम जन की आस्था घटने लगी।
बहुसंख्यक समाज के मन को जोड़ने में नाकाम सेक्यूलर राजनीति अल्पसंख्यकों की जोड़ तोड़ में लग गयी। व्यवहार में सेक्युलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यक समाज, खासतौर पर मुस्लिम समाज, के हितों की रक्षा। पहले जायज़ हितों की रक्षा से शुरुआत हुई, धीरे धीरे जायज़ नाजायज़ हर तरह की तरफदारी को सेकुलरवाद कहा जाने लगा। इधर मुस्लिम समाज उपेक्षा का शिकार था, पिछड़ा हुआ था, और सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दृष्टि से भेदभाव झेल रहा था, उधर सेक्युलर राजनीति फल फूल रही थी। नतीजा यह हुआ कि सेक्युलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाने की राजनीति हो गयी। मुसलामानों को डराए रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट लेते जाओ। मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज को न शिक्षा, न रोज़गार, न बेहतर मोहल्लों में मकान। बस मुस्लिम राजनीति केवल कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती रहे, और औसत मुसलमान डर के मारे सेक्युलर पार्टियों को वोट देता रहे – यह ढकोसला देश में सेकुलरवाद कहलाने लगा।

सेक्युलर वाद के सिद्धांत और वोट बैंक की राजनीति के बीच की खाई का भांडा फूटना ही था। बहुसंख्यक समाज सोचता था कि सेकुलरवाद उसे दबाने और अल्पसंख्यक समाज के तुष्टिकरण का औज़ार है। अल्पसंख्यक समाज समझता कि सेकुलरवाद उन्हें बंधक बनाए रखने का षड़यंत्र है। यह खाई सबसे पहले अयोध्या आन्दोलन में दिखाई दी, जिसकी परिणीती बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई। २००२ गुजरात के नरसंहार में सेकुलरवाद फिर हारा। इस राजनैतिक प्रक्रिया की परिणीती २०१४ चुनाव में हुई।

आज सेक्युलर राजनीति थकी हारी और घबराई हुई है। नरेन्द्र मोदी की अभूतपूर्व विजय और उसके बाद से देश भर में सांप्रदायिक राजनीति के सिर उठाने से घबराई हुई है। पिछले २५ साल में छोटे बड़े लड़ाई हार कर आज मन से हारी हुई है। देश के सामान्य जन को सेक्युलर विचार से दुबारा जोड़ने की बड़ी चुनौती का सामना करने से पहले ही थकी हुई है। इसलिए आज सेक्युलर राजनीति शॉर्ट-कट हो गयी है, किसी जादू की तलाश में है, किसी भी तिकड़म का सहारा लेने को मजबूर है।

बिहार का चुनाव किसी थकी हारी घबराई सेक्युलर राजनीति का नमूना है। जब सेक्युलर राजनीति जन चेतना बनाने में असमर्थ हो जाती है, जब उसे लोकमानस का भरोसा नहीं रहता, तब वो किसी भी तरह से भाजपा को हराने का नारा देती है। इस रणनीति के तहत भ्रष्टाचार क्षम्य है, जातिवाद गठबंधन क्षम्य है और राज काज की असफलता भी क्षम्य है। बस जो भाजपा के खिलाफ खड़ा है, वो सही है, सेक्युलर है। बिहार के चुनाव परिणाम बताएँगे की यह रणनीति सफल होती है या नहीं। अभी से चुनावी भविष्यवाणी करना बेकार है। संभव है कि नितीश-लालू की रणनीति कामयाब हो भी जाए। यह भी संभव है सेकुलरवाद के नाम पर भानुमती का कुनबा जोड़ने की यह कवायद बिहार की जनता नामंज़ूर कर दे। यह तो तय है कि इस गठबंधन के पीछे मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो जाएगा। लेकिन यह ही तो भाजपा भी चाहती है, ताकि उसके मुकाबले हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। अगर ऐसा हुआ तो पासा उल्टा पड़ जाएगा। चुनाव का परिणाम जो भी हो, इस चुनाव में बिहार हारेगा, सेक्युलर राजनीति हारेगी।

अगर देश के पवित्र सेक्युलर सिद्धांत को बचाना है तो सेक्युलर राजनीति को पुनर्जन्म लेना होगा, सेक्युलर राजनीति को दोबारा लोकमानस से सम्बन्ध बनाना होगा, अल्पसंख्यकों से केवल सुरक्षा की राजनीती छोड़कर शिक्षा, रोज़गार और प्रगति की राजनीती शुरू करनी होगी। शायद अशोक का प्रदेश बिहार एक अच्छी जगह है इस राजनीति की शुरुआत के लिए।

(योगेन्द्र यादव)

अक्टूबर 29, 2014

गरीब की “छठ” और भारतीय रेल : रवीश कुमार (NDTV)

Chhathये कौन सा भारत है जहां पखाने में लोग बैठकर अपना सबसे पवित्र त्योहार मनाने घर जा रहे हैं। क्या हम इतने क्रूर होते जा रहे हैं कि सरकार, राजनीति और समाज को इन सब तस्वीरों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हर राज और हर साल की यह तस्वीर है। राजनीति और सरकार की समझ पर उस खाते पीते मध्यम वर्ग ने अवैध कब्ज़ा कर लिया है जो ट्वीटर और फेसबुक पर खुद ही अपनी तस्वीर खींच कर डालता हुआ अघाए रहता है। जो अपनी सुविधा का इंतज़ाम ख़ुद कर लेता है। लेकिन रेल आने से घंटों पहले कतार में खड़े उन ग़रीबों की कोई सेल्फी कहीं अपलोड नहीं हो रही है जिनकी आवाज़ अब सिस्टम और मीडिया से दूर कर दी गई है। ये बिहारी नहीं हैं। ये ग़रीब लोग हैं जो छठ मनाने के लिए दिल्ली या देश के अन्य हिस्सों से बिहार जाना चाहते हैं। हर साल जाते हैं और हर साल स्पेशल ट्रेन चलाने के नाम पर इनके साथ जो बर्ताव होता है उसे मीडिया भले न दर्ज करे लेकिन दिलों दिमाग़ में सिस्टम और समाज के प्रति तो छवि बन रही है वो एक दिन ख़तरनाक रूप ले लेगी। साल दर साल इन तस्वीरों के प्रति हमारी उदासीनता बता रही है कि देखने पढ़ने वाला समाज कितना ख़तरनाक हो गया है। वो अब सिर्फ अपने लिए हल्ला करता है, ग़रीबों की दुर्गति देखकर किनारा कर लेता है।

न्यूज़ चैनलों पर जो तस्वीरें दिखाईं जा रही हैं उन्हें ध्यान से देखिये। दस बारह लोग उस शौच में किसी तरह ठूंसे पड़े हैं। नीचे से लेकर ऊपर की सीट भरी पड़ी है। चलने के रास्ते पर लोग बैठे हैं। आदमी की गोद में आदमी बैठा है। आदमी की गोद में औरत बैठी है और औरत की गोद में बच्चा। बच्चे किसी तरह ट्रेन की बोगी में घुस गए हैं और वे वहीं कहीं घुसिया कर खड़े हैं। कोई शौचालय तक के लिए नहीं उठ सकता। पिछले साल कई लोगों ने बताया था कि चौदह पंद्रह घंटे हो जाते हैं शौचालय गए। पुरुष और औरतें दोनों बीमार पड़ जाते हैं। कुछ लोग वहीं बैठे बैठे बोतल में पेशाब करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बच्चों की हालत का अंदाज़ा कीजिए और बस एक मिनट के लिए समझ लिए कि आपके बच्चे के साथ ऐसा हुआ हो तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी। किसी तरह घुट घुट कर लोग सफर करने के लिए मजबूर किये जा रहे हैं।

आपके मन में यह ख़्याल आ रहा होगा कि इतनी आबादी हो गई है कि क्या किया जाए लेकिन आबादी के कारण मध्यम वर्ग को तो ऐसी सज़ा नहीं भुगतनी पड़ती है। कुहासे के कारण दो चार फ्लाईट देर से चलने लगती है तो सारे न्यूज चैनलों पर लाइव कवरेज़ होने लगता है। लोग अपनी सेल्फी भेजने लगते हैं कि एयरकंडिशन एयरपोर्ट पर दो घंटे से बैठे हैं। रेल तो रोज़ दो चार घंटे चलकर पहुंचती रहती है। कोई शोर नहीं होता बस बुलेट ट्रेन का ख़्वाब परोस दिया जाता है। एक बुलेट ट्रेन की लागत में कितनी धीमी रफ्तार की ट्रेनें राजधानी में बदल जाएंगी  इसका हिसाब मध्यमवर्ग नहीं करेगा क्योंकि इससे ग़रीबों को लाभ होगा। आख़िर क्यों इन तस्वीरों को हिन्दी न्यूज़ चैनलों के भरोसे छोड़ दिया गया। अंग्रेज़ी के अख़बार लोगों की इन तकलीफों से क्यों दूर रहे। क्यों मध्यमवर्ग ने हंगामा नहीं किया कि देखो ये मेरा इंडिया है। पहले इसे देखो इसे कितनी तकलीफ हो रही है। रविवार शाम प्रधानमंत्री कई सांसदों के साथ चाय पी रहे थे। सबको सही सलाह दी कि लोगों के बीच जाइये। गांवों में जाइये। यह बात तो सही है और यही होना भी चाहिए लेकिन क्या उनके रेल मंत्री उस वक्त प्लेटफार्म पर थे जब लोग मल मूत्र के कमरे में ठूंस कर सफर करने के लिए मजबूर हो रहे थे। उनकी पार्टी या किसी भी पार्टी का कोई सांसद था जो इन लोगों की तकलीफ के वक्त साथ हो।

ट्रेनों में ठुसाएं हुए इन लोगों की तस्वीरों को फिर से देखियेगा। किसी के चहरे पर रौनक नहीं है। किसी का कपड़ा महंगा नहीं हैं। चेहरे पर थकान है। हताशा है और ठगे जाने की हैरत। बच्चों के कपड़े लाल पीले रंग के हैं जो हम जैसे मध्यमवर्गीय कुलीन लोग पहनाना भी पसंद न करें। कोई मां किसी तरह तीन चार महीने के बच्चे को कलेजे से लगाए किसी की गोद में बैठी थी। ये वो लोग हैं जिनसे दिल्ली ,लुधियाना और सूरत का काम चलता है। ये जीने भर कमा लेते हैं और साल में एक बार घर जाने भर बचा लेते हैं। अचनाक असहाय ग़रीबों की तस्वीरों से टीवी का स्क्रीन भर गया लेकिन उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात में भरना चाहिए। सबको पता है इनके पास अखबारों की खबरें छांट छांट कर पढ़ने और सत्ता के खेल को समझने का वक्त नहीं है। ये वो लोग हैं जो चुनाव के वक्त प्रबंधन और नारों से हांक लिये जाते हैं। महानगरों के मध्यमवर्ग को इनकी सूरत ठीक से देखनी चाहिए। ये वही लोग हैं जिनके सामने वो अपने रोज़ाना के काम के लिए गिड़गिड़ाता है। सारा दिन काम कराकर दिवाली की बख्शीश के नाम पर ठीक से पचास रुपये भी नहीं देता। फिर भी एक करीब का रिश्ता तो है इनसे लेकिन ऐसा कैसे हो रहा है कि हम देखकर चुप हो जा रहे हैं।

दुनिया में जब तक गरीबी रहेगी तब तक बहुत से लोग जाते रहेंगे। इनका घर जाना इस बात का ज़िंदा प्रमाण है कि तमाम घोषणाओं के बाद भी ग़रीबी है और गर्वनेंस के तमाम दावों के बाद भी सिस्टम इनके प्रति सहानुभूति नहीं रखता। अचानक कहीं से बजबजाकर निकल आए इन लोगों की तस्वीर कुछ वक्त के लिए टीवी पर छा गई है। फिर धीरे धीरे गायब हो जाएगी और यही लोग तमाम बड़ी कंपनियों की कामयाबी के किस्से में ठेके के मज़दूर बनकर बिला जाएंगे। इनके रहने की जगह और ट्रेन के उस शौचालय में कोई फर्क नहीं जिसमें वे ठूंस ठूंस कर भरे जा रहे हैं। जिन झुग्गियों में ये रहते हैं आप एक बार वहां जाएं तो पता चलेगा। बल्कि पब्लिक स्कूल बच्चों को नहीं ले जाते तो आप अपने बच्चों को इन झुग्गियों में लेकर जाइये ताकि बच्चे के साथ साथ आप भी संवेदनशील हो सकें कि आपके उस इंडिया का नागरिक किन हालात में रहता है जो इंडिया चीन और अमरीका को हराने निकला है। वैसे चीन और अमरीका में भी ग़रीबों को ऐसे ही हालात में रहना पड़ता है। अगर सिस्टम इन ग़रीबों के प्रति उदार नहीं हुआ तो एक दिन ये बुलेट ट्रेन पर भी इसी तरह कब्ज़ा कर लेंगे। वो मिडिल क्लास को ठेल कर अपने आपको हर उन खांचों तक में ठूंस देंगे जिनमें मध्यमवर्ग का नया सेल्फी क्लास मल मूत्र त्याग करता है। छठ की इस यात्रा की ये तस्वीरों हम सबके लिए शर्मनाक प्रसारण है।

आजकल कई लोग पूछते हैं कि सबको छठ पर जाने की क्यों पड़ी है। छठ में हम इसलिए जाते हैं ताकि जो घर ख़ाली कर आए हैं उसे फिर से भर सकें। छठ ही वो मौका है जब लाखों लोग अपने गांव घर को कोसी की तरह दीये और ठेकुए से भर देते हैं। गांव गांव खिल उठता है। इस खुशी के लिए ही वो इतनी तकलीफदेह यात्राएं करते हैं। छठ गांवों के फिर से बस जाने का त्योहार है। आप जाकर देखिये गांवों में कहां कहां से लोग आए होते हैं। हिन्दुस्तान का हर हिस्सा बिहार में थोड़े दिनों के लिए पहुंच जाता है। हम बिहारी लोग छठ से लौट कर कुछ दिनों बाद फिर से ख़ाली हो जाते हैं। छठ आता है तो घर जाने के नाम पर ही भरने लगते हैं। इसलिए इस मौके पर घर जाने को कोई दूसरा नहीं समझेगा। किसी समाजशास्त्री ने भी अध्ययन नहीं किया होगा कि क्यों छठ के वक्त घर आने का बुलावा आता है। सबको पता है बाहर की नौकरी और ज़िंदगी एक दिन इस रिश्ते को कमज़ोर कर देगी फिर सबकुछ हमेशा के लिए छूट जाएगा। छठ ही वो आख़िरी गर्भनाल है जो इस रिश्ते को छूटने नहीं देता। साल में एक बार घर बुला लेता है। जो नहीं जाते हैं वो भी छठ में घर ही रहते हैं। मैं नहीं जा रहा हूं लेकिन मेरा सिस्टम अपने आप किसी वाई फाई की तरह बिहार के गांव घरों से कनेक्ट हो गया है।

 

(रवीश कुमार)

साभार – प्रभात खबर,  एवं रविश कुमार का ब्लॉग “कस्बा”

अप्रैल 28, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नरेंद्र मोदी @ वाराणसी में नामांकन

Neetish@Modi

भीड़ दोनों तरफ है फर्क बस इतना है

एक तरफ आई हुई है

दूसरी तरफ लाई हुई है

हवा दोनों तरफ है

फर्क बस इतना है

एक तरफ बनी हुई है

दूसरी तरफ पैसे के दम पर बनाई हुई है

जीत का विश्वास दोनों तरफ है

फर्क बस इतना है

एक तरफ आम लोगो के दम पर है

दूसरी तरफ अंबानी अडानी के दम पर है

चर्चा दोनों तरफ की है

फर्क बस इतना है

एक तरफ की चर्चा आम जनता में है

दूसरी तरफ मीडिया ने बनाई हुई है

AKvsModi@Benaras

लगता है कि बनारस में कारपोरेट मीडिया/भाजपा समर्थित कथित ‘सुनामी’ के सबसे पहले शिकार ख़ुद पत्रकार हो गए हैं और यह ‘सुनामी’ उन्हें पूरी तरह बहा ले गई है.

सबूत चाहिए तो कल टीवी पर और आज के अखबारों में बनारस में नमो के नामांकन की रिपोर्टिंग पढिए. जिस श्रद्धा और भक्ति से रिपोर्टिंग की गई है, उसमें सबसे पहले तथ्यों को अनदेखा किया गया है|

उदाहरण के लिए टाइम्स आफ इंडिया और इकनामिक टाइम्स की रिपोर्टों में तथ्यों में फ़र्क़ है| उनकी तुलना बाक़ी अख़बारों की रिपोर्टों से करें तो उन सबके बीच तथ्यों का फ़र्क़ साफ़ दिखने लगता है.

कुछ साल मैंने भी बनारस में गुज़ारे हैं. कुछ सवाल सिर्फ तथ्यों के बारे में. पहली बात यह है कि अगर मलदहिया से मिंट हाउस,नदेसर की दूरी गूगल मैप के मुताबिक़ १.७ किमी है, उसे २ किमी भी मान लिया जाए और उसे पूरी तरह लोगों से भरा हुआ भी मान लिया जाए तो उसमें ४० हज़ार से ज़्यादा लोग नहीं होंगे. वह लाखों और कुछ अख़बारों/चैनलों में ३ लाख तक कैसे पहुँच गई? थोड़ा सा गणित का इस्तेमाल कीजिए,आपको वहाँ पहुँची भीड का अंदाज़ा लग जाएगा|

susheel modi tweetयह ज़रूर ‘सुनामी’ का ही असर है! श्रद्धा में बह रहे मीडिया में तथ्य बह जाएँ तो किमाश्चर्यम?

एक आदमी को खड़े होने के लिए एक हाथ लम्बी और एक हाथ चौड़ी जगह तो चाहिए ही. मतलब 18 इंच गुने 18 इंच. यानी लगभग 50 cm x 50 cm. यानि कि 1 sq meter में अधिकतम ४ आदमी

वाहन के आस पास के 200 meter में 1 sq meter में ४ आदमी घनत्व, उसके पिछले 300 meter में 1 sq meter में केवल 2 आदमी का घनत्व तथा बाकी 1500 meter में 2 sq meter में 3 आदमी के घनत्व के हिसाब से मलदहिया से कचहरी के बीच की सड़क को 60 फीट (यानि 18 meter) चौड़ी मानते हुए ये संख्या होगी [(200x18x4)+(300x18x2)+(1500x18x2/3)] यानी कुल 14400+10800+18000 = 43200

अगर ये मान भी लिया जाए कि 7-8 हजार लोग लंका, काशी विद्यापीठ और मलदहिया और बीच के रास्ते में ही रह गये और जुलूस में शामिल नहीं हुए तो जुलूस की पूरी संख्या 50 हजार कही जा सकती है

अब अगर इसमें से बनारस की अन्य लोकसभा क्षेत्रों, पूर्वांचल के अन्य लोकसभा क्षेत्रों और बिहार से आये हुए लोगों की संख्या (जैसा सुशील मोदी का दावा है) को, यानि की कुल 25 लोकसभा क्षेत्रों के लिए @ 1000 के हिसाब से तथा गुजरात और अन्य राज्यों से आकर बनारस में कैम्प कर रहे 5 हजार लोग यानी कुल बाहरी संख्या को 30 हजार भी मानकर घटा दिया जाए तो यह तथाकथित सुनामी बनारस संसदीय क्षेत्र से केवल 20 हजार लोगों को ही बटोर पाई.” [Anand Pradhan]

…..

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी रोज चार से छह रैलियां करते हैं। वह देश के कोने-कोने जाकर प्रचार कर रहे हैं। लेकिन, रात अपने बंगले में ही बिताते हैं। (यह भी एक रहस्य की बात है!) उन्हे उड़ाने के लिए तीन जहाजों का बेड़ा हमेशा तैनात रहता है। इनमें एक जेट प्लेन और दो चॉपर शामिल हैं। ये विमान अदाणी ग्रुप और डीएलएफ जैसी कंपनियों के हैं।

मोदी को उड़ाने के लिए अहमदाबाद एयरपोर्ट पर हर सुबह एक एंब्रेयर एयरक्राफ्ट EMB-135BJ तैयार रहता है। यह जेट विमान करनावती एविएशन का है, जो अदाणी ग्रुप की ही एक कंपनी है। मोदी के हवाई बेड़े में अगस्ता AW-139 चॉपर भी शामिल है। यह डीएलएफ ग्रुप का विमान है। इनके अलावा निजी कंपनी के चॉपर बेल 412 से भी मोदी ने उड़ानें भरी हैं। बिहार और यूपी जैसे राज्योंु के लिए मोदी ने अगस्ता AW-139 चॉपर का इस्ते माल किया था।

विशेषज्ञों के मुताबिक एक इंजन के चॉपर विमान से उड़ान भरने की कुल लागत 70,000 से 75000 रुपए प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। दो इंजन वाले चॉपर विमान से उड़ान भरने की कुल लागत 1 से 1.2 लाख प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। वहीं जेट विमान के जरिए उड़ान भरने की कुल लागत करीब 3 लाख रुपए प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। नरेंद्र मोदी देशभर में अब तक तकरीबन 150 रैलियां कर चुके हैं। इस दौरान उन्हों ने 2.4 लाख किमी की यात्रा की है। यानी, रोज लगभग 1,100 किमी का सफर। हिसाब लगाइये की कम्पनियां कितना पैसा खर्च कर रही हैं।

अब देश की समझदार जनता विचार करे की मोदी के ऊपर इतना पैसा खर्च करने वाली कंपनियां मोदी के सत्ता में आते साथ ही किस तरह से अपनी रकम की कई गुना वसूली करने का जालिमाना तरीका अपनाएंगी![Anurag Ojha]

अप्रैल 22, 2014

गुजरात का विकास : मोदी से बहुत पहले की कहानी है!

(Reetika Khera, Assistant Professor, Humanities and Social Sciences department, IIT-Delhi)

मेरी ही उम्र का एक सोलह साल का लड़का पटना से बड़ोदा आया, जो कि मेरा शहर था| उसके लिए बड़ा ही आश्चर्यजनक यह देखना कि बड़ोदा में बिजली नियमित रूप से रहती थी| सड़कें बहुत अच्छी थीं| महिलायें देर रात्री में भी सड़कों पर दिखाई दे जाती थीं, अकेली जाती हुयी या दोपहिया वाहन पर, आकर्षक कपड़े पहने हुए, बैकलेस चोली पहने हुए गरबा करती हुयी… उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता था| मैंने कभी बिहार नहीं देखा था अतः मेरे लिए अचरज भरा था उसका यूं आश्चर्यचकित रह जाना|

एक और समय, जब मेरे पिता अपने व्यापार के सिलसिले में पंजाब के दौरे पर ज रहे थे| ट्रेन में उन्हें एक पंजाबी व्यापारी मिले, और दोनों व्यापार में लाभ की बातें करने लगे| जब मेरे पिता ने उनसे बिजली के बिल के बारे में बताया तो वे सज्जन अचरज में पड़ गये और बोले,” आप को बिजली का बिल देना पड़ता है तब लाभ कैसे होता है?” ऐसा सुनकर मेरे पिता को भी उतना ही आश्चर्य हुआ जैसा मुझे पटना से आए लड़के की बातों से हुआ था|

ये दनों घटनाएं 1989 की हैं| आजकल दूसरे प्रदेशों से गुजरात में पहली बार जाने वाले लोग ऐसे ही आश्चर्यचकित होकर बातें करते हैं जैसे बिहार से आआ हुआ 16 वर्षीय लड़का करता था| वास्तव में गुजरात में नियमित बिजली आपूर्ति, अच्छी सड़कें, विकसित होता उधोग जगत, अच्छे सरकारी स्कूल, मिड-दे मील (1984 से सुचारू रूप से चल रहा है), आंगनवाडी (बालवाड़ी), राज्य परिवहन की बसें, और जनहित के बहुत से कार्यों समेत बहुत कुछ था (और है) जिसकी प्रशंसा की जा सकती थी (आज भी की जा सकती है)| बहुत से क्षेत्रों में गुजरात ने पहल की थी| केरल जैसा नहीं पर उससे बहुत पीछे भी नहीं था नई शुरुआत करने में|

प्री-स्कूल में, हम लोगों को ठंडे दूध का एक गिलास मिलता था (हम लोग इसलिए पीते थे क्योंकि दूध रंगबिरंगे प्लास्टिक के गिलासों में मिलता था)| वर्तमान में मीडिया न्यौछावर हो जाता है इस खबर पर कि किसी राज्य ने लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्हें मुफ्त में साइकिलें देने की योजना पर अमल करना शुरू किया है| गुजरात में बहुत समय से लड़कियों को मुफ्त में शिक्षा दी जाती रही है, कम से कम तबसे तो निश्चित रूप से जब मैं आठवीं से बारहवीं कक्षाओं की पढ़ाई कर रही थी (सहायता प्राप्त स्कूलों में भी)|  विश्वविधालय में मेरी बी.ए   (1992-1995) का शुल्क  मात्र 36 रुपये प्रति वर्ष था|

ग्रामीण इलाकों में भी दृश्य अच्छा था| स्कूली छात्र के सरंक्षित रूप में हमने प्रकृति-शिक्षा-कैम्प के द्वारा ग्रामीण गुजरात देखा, और हम गिर के वनों में और पिरोटन द्वीप पर भी गये| स्कूल की वार्षिक पिकनिक के दौरान नर्मदा के किनारे भी गये| बड़े होने पर मैंने जाना कि गुरुदेश्वर, ज़देश्वर, और उत्कंठेश्वर गुजरात के आदिवासी इलाकों के भाग हैं जो कि तुलनात्मक रूप से राज्य का पिछडा इलाका माना जाता था| तब भी उस समय जैसी सड़कें हमने वहाँ देखीं, वैसी सड़कें, शोध के सिलसिले में 2005-2007 के दौरान मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय राजमार्गों पर भे इन्हीं पाईं (हालांकि अब वहाँ भी कफी सुधार हो गया है)| केवल आज के दौर में ये स्थान ऐसे हाइवे पा रहे हैं जैसे गुजरात नब्बे के दशक में ही इस्तेमाल में ला रहा था| पिछले चौदह सालों में देश के बहुत सारे राज्यों में शोध के सिलसिले में दौरे करने के बाद मुझे यह एहसास हो गया है कि क्यों मेरे विधार्थी जीवन में भी गुजरात में पहली बार आने वाले वहाँ पर विकास का स्तर देखकर क्यों आश्चर्यचकित रह जाते थे और कि गुजरात ने वास्तव में बहुत पहले से ही अच्छा इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लिया था|

बड़ोदा को अपने क्षेत्रीय और धार्मिक बहुलतावाद पर गर्व रहा है| स्कूल में मेरे साथ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, और सिंधी छात्र पढते थे| मुझे आज भी ओणम, पोंगल, और पतेती के अवसर पर मिलने वाली दावतों की याद है| पर वर्तमान में दुखद रूप से सब बदल चुका है| 2007 में जब संजय दत्त को आतंकवादियों से संपर्क करने के कारण सजा हुयी थी तब मेरी सात साल की भतीजी ने मासूमियत से पूछा था,” वह आतंकवादी कैसे हो सकता है, वह तो मुस्लिम नहीं है?”

ऐसा नहीं है कि गुजरात में पहले साम्प्रदायिक भावनाएं नहीं थीं| पर बड़े होने तक इन् सब भावों से कभी भी सीधी मुठभेड़ नहीं हुयी थी|

गुजरात में पाले पढ़े होने में सबसे ज्यादा (स्वादिष्ट खाद्य सामग्रियों के अलावा, जिनमें हमेशा ही चीनी नहीं डाली जाती!) महत्वपूर्ण बात जो मुझे लगती है  वो है स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के भाव जो मुझे मिले क्योंकि चारों और बेहद सुरक्षित वातावरण था|  दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से एम ए (1995-7),  करते हुए मैं कई बार राजधानी एक्सप्रेस से सुबह तीन बजे बड़ोदा पहुँची और मेरे लिए यह बड़ा स्वाभाविक ठ अकी मैं अकेली स्टेशन से बाहर ऑटो स्टैंड पर जाऊं और उतना ही स्वाभाविक था मेरे औटो में बैठने के बाद मीटर चालू करके ऑटोवाले का मुझसे पूछना कि मुझे कहां जाना है? गहरी नींद में सोये हुए अपने माता-पिता को मैं जाकर जगाती थी| उन्हे कभी चिंता में नींद खराब नहीं कानी पड़ी कि मैं कैसे अकेली घर तक आउंगी|  दिल्ली में ऐसा कर पाना आज भी एक स्वप्न सा लगता है, मेरे जैसे सामाजिक पृष्ठभूमि के इंसान के लिए भी| बिना भय के कहीं भी घूमने की स्वतंत्रता का मोल हम अक्सर हल्के में लेते हैं|

इन स्व-अनुभवों से भरे किस्सों के अलावा तथ्य क्या कहते हैं? नीचे दी गई तालिका में गुजरात और राष्ट्रीय स्तर परपांच समाजिक और आर्थिक सूचकांकों का औसत दिया गया है 90 के दशक के बाद के काल में| आंकड़े बताते हैं कि नब्बे के दशक में ही गुजरात का औसत दश के औसत से बेहतर था| तब गुजरात देश के दस ऊँचे राज्यों में से एक था| 2000 के बाद के दशक में यह सफल नहेने हो पाया अपनए ही पिछले प्रदर्शन को कायम रखने में (मुफ्त शिक्षा, मिड-डे मील, शिशु-विकास योजनाएं, विस्तृत और उच्च विकास आधारित इकोनॉमी)| अन्य राज्यों की तुलना में गुजरात का सामाजिक सूचकांक नीचे गिरा है|  स्पष्टतः गुजरात कोई एक दिन में नहीं बना था और गुजरात को बनाने में किया गया कठोर परिश्रम मोदी काल से कम से कम एक दशक पहले की बात है|

मेरा यह कहना नहीं है कि अस्सी और नब्बे के दशकों में गुजरात के पहले के विकास का श्रेय कांग्रेस को दिया जाना चाहिए जिसने उन सालों में सबसे अधिक सालों तक गुजरात में सत्ता चलाई| उपलब्धियों की निरतंरता ऋणात्मक सूचकांकों की रोशनी में भी देखी परखी जा सकती है| भ्रष्टाचार कम से कम अस्सी के दशक से हमारे साठ साठ विचरण कर रहा है| नब्बे के दशक में एक चुटकला प्रसिद्द था – “CM”, “Chief Minister” का संक्षिप्तीकरण न रहकर “Crore-Making” का संक्षिप्त रूप हो गया था – CM के बारे में यह माना जाने लगा था कि वह एक दिन में करोड़ों कमा रहा था|  मुझे बताया गया है कि गुजरात में आजकल अगर सारी नहीं तो अधिकतर प्रोपर्टी डील काले धन के इस्तेमाल के बगैर सम्पन्न नहीं होतीं| देश के बाकी स्थानों की तरह ही रोजमर्रा के स्तर पर भ्रष्टाचार घर कर चुका है वहाँ| आपातकालीन स्थितियों में यात्रा करने की मजबूरी के कारण एक व्यक्ति को ट्रेन छोटने से दो घंटे पहले स्टेशन पर 1000 रुपयों की घूस देकर टिकट मिला|

भाजपा की प्रचार मशीनरी गुजरात को “ईश्वर की अपनी धरती” के रूप में प्रचारित कर रही है| जबकि उत्तर भारतीय मैदानों से गये आदमी की निगाहों से देखें तो गुजरात की विकास की कहानी मोदी काल से बहुत पहले ही कायम हो चुकी थी| दक्षिण की दृष्टि से देखें तो गुजरात एक धनी राज्य दिखाई देता है पर सामाजिक सूचकांकों के आधार पर पिछडा हुआ राज्य है, तमिलनाडु की तुलना में, केरल की बात तो अलग ही है|

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Original article

अगस्त 17, 2011

मुनादी…(धर्मवीर भारती)

सत्तर के दशक में डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखी कविता “मुनादी” उस समय की घटनाओं से प्रेरित थी पर किसी भी दौर में जब जब सत्ता निरंकुशता की ओर बढ़ेगी और जनता से कोई आगे आकर सत्ता की असंवेदनशीलता के खिलाफ आवाज उठायेगा तब-तब “मुनादी“-कविता, प्रासंगिक हो जायेगी। आज के हालात में भी “मुनादी” सटीक बैठती है। बार-बार “मुनादी” का सतह पर आना इसके कालजयी रचना होने का प्रमाण है।

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है

शहर का हर बशर वाकिफ है
कि पच्चीस साल से मुजिर है यह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और असमत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाये

जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं
और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है ?

आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए
रात-रात जागते हैं;
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक
छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…
तोड़ दिये जाएँगे पैर
और फोड़ दी जाएँगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चल कर
महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराइयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी जवाँमर्दी की दाद दें

अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाए

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुँचो

इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी
बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप
क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाए

बेताब मत हो
तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा
दर्शन करो !
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी
बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा
नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा
लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से
बहा, वह पुँछ जाए

बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं

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