Posts tagged ‘bhookha’

फ़रवरी 21, 2015

भूखा आदमी और ईश्वर

भूखे नेbhookh
ईश्वर से रोटी मांगी
ईश्वर ने कहा
पहले स्तुति गाओ
भूखे ने
गायी
ध्यान भूख में रहा
ईश्वर ने कहा
पापी हो तुम
भूखे ने सुना ईश्वर का कटाक्ष


ईश्वर ने फिर कहा
यही है तुम्हारे दुखो का कारण
इसीलिए भूख तुम्हारी नियति है


भूखे ने कहा
हमारा संयम हमारी भूख का कारण है ईश्वर
ईश्वर ने आँखे तरेरी
बोले अदब से बात करो
भूखे की इतनी हिम्मत!


भूखे ने डाल दिया ईश्वर की गर्दन पर हाथ
बोला
भूखा हिम्मत ही करता
तो ना तुम ईश्वर होते
ना मैं भूखा

(संकलन साभार – Arvind Thalor)

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अप्रैल 28, 2014

ब्याहना

बाबा!Daughter-001
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों

ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल

मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप…

महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी,
समय-समय पर गोगो के लिए भी

मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे

उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे !

उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़ और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुःख बाँटने तक

चुनना वर ऐसा
जो बजाता हों बाँसुरी सुरीली
और ढोल-मांदर बजाने में हो पारंगत

बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल

जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे ।

(निर्मला पुतुल)

जुलाई 3, 2010

मर गयी है भूख- (कृष्ण बिहारी)

दो मुट्ठी भात में
एक चुटकी नमक
और चार बूँद कड़वे तेल का स्वाद
क्या जानें
सैंडविच और फास्ट फूड
खाने वाले
लंच और डिनर पर जाने वाले।

पूछो उनसे –
बासी भात भी
नहीं मिलता जिन्हे
और नमक भी
हो गया है मंहगा जिनके लिये
वही बता सकते हैं
भूख का स्वाद।
झांक मारता कड़वा तेल
जिनके नसीब में नहीं है
मुकद्दर की बात!

लंच और डिनर में
स्वादिष्ट व्यंजन हैं
मगर मर गयी है भूख
जो जिलाये रखती है आदमी को
अपनी ही छटपटाहट के समान।


{कृष्ण बिहारी}

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