Posts tagged ‘Bhari’

जनवरी 4, 2014

Paulo Coelho तुम्हे पढकर

कहीं जब कोई शब्द paulo

वाक्य के सरल प्रवाह में बहकर

आँखों से ह्रदय में जाकर

फिर मन को हल्का कर देता है!

और-

कहीं कोई शब्द

वाक्य के सरल प्रवाह में बहकर

आँखों से ह्रदय में जाकर

फिर मन को भारी कर देता है!

शब्दों की सरलता

जो कभी मन को कर देती है हल्का

और कभी कर देती है भारी

मन-प्राण को कहीं छू-कर, सहला कर

कहीं किसी कृत्रिमता को पिघला देती है

और यह पिघला द्रव

कहीं आसुंओं के साथ धो देता है, मन को

और इसे कर देता है,

निर्मल और स्वच्छ!

Yugalsign1

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नवम्बर 30, 2013

चैरेवेती

सच, footprints-001

और कुछ नहीं है,

दो चरणों का

निरंतर चलते जाना है

बेशक,

वह स्मृति चिह्न छोड़े

या कि नहीं

पदचाप भारी हो

या कि ध्वनिहीन

क्रमगति अबाध हो

या कि नियंत्रित

यह सब बेमतलब है

सच,

सिर्फ चलना है

चलना भर!

Yugalsign1

नवम्बर 23, 2013

शून्य से शून्य तक

sad-001शून्य से शून्य तक

मैंने क्या किया

एक यात्रा भर

वह भी शून्य

फिर भी,

खालीपन अगर मुझे

भारी पड़ता है,

एक क्षण को भी

तो तुम्हारा दुख

मैं क्यों कर न समझ पाया?

Yugalsign1

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