Posts tagged ‘Bhagwan’

अगस्त 25, 2013

मैं वर्तमान हूँ !

मैं जीवन के बीते समय पर पछतावा कर रहा था

और आने वाले समय के प्रति भयभीत हो रहा था,

अचानक, मैंने सुना,

मेरा ईश्वर बोल रहा था ,

“मेरा नाम “वर्तमान” है”|

वह रुका, मैंने इन्तजार किया,

उसने फिर बोलना शुरू किया,

“जब तुम भूतकाल में जीते हो,

बीते समय में की गई गलतियों और पछतावों के साथ,

तब मुश्किल हो जाती है मेरे लिए,

मैं ऐसे माहौल में नहीं रह सकता|

मेरा नाम ” भूत” नहीं है|”

“जब तुम भविष्य में जीते हो,

आने वाली समस्याओं और भय की कल्पनाओं के साथ,

तब भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है,

मैं वहाँ भी नहीं रहता,

मेरा नाम “भविष्य” नहीं है|”

जब तुम इसी क्षण में,

-जो तुम्हारे सामने है,

जीते हो,

तब कतई कोई मुश्किल मेरे लिए नहीं होती,

मैं यहीं रहता हूँ,

मेरा नाम “वर्तमान” है|”

[I Am by Helen Mallicoat]

मई 18, 2011

खुदा का पता

कोई कहता है खुदा बसता है कोई कहता है भगवान रहता है
बंदों का दावा है चंद मीटर गारे के घर में आसमान रहता है
अक्ल वालों होश का अंदाज़ किसी दीवाने से सीख कर आओ
आप खुद ही कहने लगोगे धरती पर तो बस इंसान रहता है

कोई हिसाब लिख रहा है सब को पता है यारो
क्या करें गुनाह से तो जनम का रिश्ता है यारो
मौत को याद करोगे तो आयेगा खुदा भी याद
वरना तो आदमी फितरत से ही बेवफा है यारो

क्यों भटक गयी मेरी बंदगी तुझी को पता
ये तेरी रज़ा को ही खबर, तुझे मंज़ूर क्या है
शैतान के हाथों में मेरी अक्ल को सौंपने वाले
मेरे गुनाहों को माफ कर, मेरा कसूर क्या है

वही बेबसी का मंज़र है जो के था
वही शैतान हमसफ़र है जो के था
वही गुनाह का इम्तिहान है जिंदगी
वही खाकी का मुकद्दर है जो के था

ये सही उसकी रजा के बिना पत्ता हिलता भी नहीं
लाख कोशिश कीजिये बंद दरवाजा खुलता भी नहीं
दीवानों ने देखा उसे तो दिखाने के काबिल न रहे
खुदी खोने से पहले खुदा का पता मिलता भी नहीं

भोर हुए ये मंदिरों के भजन हैं हमारी लोरियां
हम हैं अज़ान की आवाजें सुन कर सोने वाले
कहते हैं, कल्बों में रातों को स्वाह करके लोग
हम नहीं हैं पुराने संस्कारों का रोना रोने वाले

(रफत आलम)

खाकी  – आदमी

मई 7, 2011

ओशो, टैगोर और ईश्वर

रबिन्द्रनाथ टैगोर की एक खूबसूरत कविता है जिसमें वे कहते हैं –

मैं बहुत सारे जन्मों से ईश्वर की खोज करता रहा हूँ। कभी मैंने उसे दूरस्थ तारे के समीप देखा और मैं अत्याधिक प्रसन्नता से भर गया कि भले ही तारा बहुत दूर था पर उस तक पहुँचना असंभव तो न था। और मैं उस ओर चल पड़ा लेकिन जब तक मैं वहाँ पहुँचता, ईश्वर किसी और स्थान की ओर चला गया। लेकिन वह अभी भी दिख रहा था, अपनी ओर आमंत्रित करता हुआ, मेरे अंदर आशा का संचार करता हुआ।

और मैं जन्मों जन्मों से इस ब्रह्मांड के चक्कर लगा रहा हूँ, ईश्वर की प्राप्ति के लिये।

एक दिन ऐसा हो गया कि मैं ईश्वर के घर पहुँच गया। मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि मैं वहाँ पहुँच गया था। यह इतने बड़े आश्चर्य की बात थी पर मैं तब भी दरवाजे की ओर बढ़ा। जैसे ही मैं दरवाजा खटखटाने वाला था कि मेरे हाथ जड़ हो गये। मेरे अंदर एक विचार कौंधा – रुको ज़रा, सोच तो लो। दरवाजे पर यह लिखा हुआ है कि यह ईश्वर का घर है। अगर यह वास्तव में ही ईश्वर का घर हुआ तो तुम समाप्त हो गये। तुम्हारी खोज खत्म हो गयी। उसके बाद क्या करोगे?

लाखों सालों की तुम्हारी ट्रेनिंग है सिर्फ खोजने की। तुम एक खोजक की भांति तो एकदम अनुशासित हो पर प्राप्तकर्ता की तरह नहीं। यह बिल्कुल नया है तुम्हारे लिये और तुम इससे नितांत अपरिचित। और सबसे बड़ी बात…खोज उस परम की, परम ईश्वर की, जिसके परे खोजने को कुछ भी नहीं है। उसके बाद क्या करोगे? उसके बाद क्या बनोगे? और यह तो सदैव बनी रहने वाली शून्यता की स्थिति बन जाने वाली है।

वह अपने जूते अपने हाथों में ले लेता है। उसे भय था कि जब वह सीढ़ियाँ उतरता हो तो ईश्वर आहट सुनकर दरवाजा न खोल दे…। और वह बिना पीछे देखे सरपट भाग आया।

कविता बहुत खूबसूरत है क्योंकि यह आगे कहती है –

मैं उसकी खोज में पुनः लग गया हूँ। मैं उसे जान गया हूँ, उसके घर को पहचान गया हूँ अतः उधर जाने से बचने का भरकस प्रयास करता हूँ। मैं हर दिशा में जाता हूँ पर ईश्वर के घर की दिशा से दूर ही रहता हूँ क्योंकि मुझे पता है कि उससे मिलने का मतलब है मेरी समाप्ति।

बुद्धत्व कुछ और नहीं है तुम्हारे खात्मे के सिवा। यह विशुद्ध मौन के अतिरिक्त्त कुछ और नहीं है। प्राकृतिक रुप से मानव डरता है और सोचता है – बुद्धत्व न पाकर इसकी खोज में निरंतर लगे रहना ही श्रेयकर है।

यह जो कथा रबिन्द्रनाथ की कविता की मार्फत मैंने तुम्हे बतायी, यह सभी की कहानी है।

इसीलिये मैं कहता हूँ – तुम बुद्ध हो पर तुम इसे पहचानना नहीं चाहते, स्वीकृति नहीं देना चाहते।

तुम कोई ऐसा रास्ता खोजना चाहते हो जिससे कि तुम बुद्धत्व की खोज बार बार शुरु कर सको।

साभार :  ओशो – “हरि ओम तत्सत” से

अप्रैल 19, 2011

जिंदगी तेरे रूप अनेक

मंदिर की पावन आरती
मस्जिद की अज़ान जिंदगी

मजदूर की सोयी हुई थकन
अमीर की अनिद्रा से परेशान जिंदगी

भूखे पेट की तमन्ना
रोटी के टुकड़े की मुस्कान जिंदगी

विधवा की जवानी
जलता हुआ मसान जिंदगी

बूढ़े की खांसी
पूरी होती दास्तान जिंदगी

संतुष्टि की चरम सीमा
बच्चे की मुस्कान जिंदगी

वेश्या की जवानी
मजबूरी का बयान जिंदगी

नारी का अनमोल आभूषण
सिन्दूर की शान जिंदगी

जिंदगी तू गुल भी तू ही खार
जिंदगी तू बिके तू ही खरीदार

तू लम्हा भी सदी भी है
कहकहों का समंदर कहीं

आँसुओं की नदी भी है
तू ही नेकी तू ही बदी भी है

तू ही शैतान की जननी
तू ही अवतार-पैगम्बर

जिंदगी तेरे रंग हज़ार
जिंदगी तेरे रूप बेशुमार

बावफा इतनी के साँसों में बसती है
बेवफा ऐसी के पल में मौत बनती है

(रफत आलम)

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