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अगस्त 26, 2015

स्वेच्छा-मृत्यु का अधिकार हो, आत्महत्या का नहीं, : ओशो

oshoमेरा एक और सुझाव है:

स्वेच्छा-मरण, युथनेसिया

जिस प्रकार हम जन्म को नियंत्रित कर रहे हैं संतति निरोध के द्वारा, मैं तुम्हें एक और शब्द देता हूं: मृत्यु-निरोध, डेथ-कंट्रोल। लेकिन कोई भी देश मृत्यु निरोध के लिए तैयार नहीं है। एक विशिष्ट उम्र के बाद जब कोई व्यक्ति अपना जीवन भरपूर जी चुका हो, उसकी कोई जिम्मेवारी न हो और अब वह मरना चाहता हो…एक तरह से वह अपने आप पर एक बोझ ही है, फिर भी उसे मजबूरन जीना पड़ता है क्योंकि कानून आत्महत्या के खिलाफ है।

मेरा सुझाव है, यदि तुम मरने की औसतन आयु सत्तर या अस्सी या नब्बे साल मानते हो तो आदमी को चिकित्सा समिति से यह पूछने की स्वतंत्रता होनी चाहिए: “मुझे अपने शरीर से मुक्त होना है।” यदि वह और जीना नहीं चाहता क्योंकि उसने काफी जी लिया है, तो ऐसा करने का उसे पूरा हक है। जो भी करना था वह सब उसने कर लिया। और अब उसे कैंसर या टी.बी. से नहीं मरना है, उसे बस विश्रामपूर्ण ढंग से मरना है।

प्रत्येक अस्पताल में एक विशेष स्थान हो, उसका खास कर्मचारी वर्ग हो, जहां लोग आ सकते है और तनाव-रहित होकर, सुंदरता से, बिना किसी रोग के, चिकित्सा व्यवसाय के सहारे मृत्यु में लीन हो सकते हैं।

यदि चिकित्सा समिति सोचती है कि वह व्यक्ति कीमती है या वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, तब फिर उससे और कुछ समय तक जीने का अनुरोध किया जा सकता है। केवल थोड़े से लोगों से ही यहां कुछ देर अधिक रहने की प्रार्थना की जा सकती है क्योंकि उनसे मानवता को इतनी मदद मिल सकती है, अन्य लोगों की इतनी सहायता हो सकती है। लेकिन वे लोग भी यदि जीने से इनकार कर दें तो वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। तुम उनसे पूछ सकते हो, प्रार्थना कर सकते हो। और यदि वे स्वीकार करते हैं तो ठीक है,लेकिन अगर वे कहें, “नहीं, अब हमें और नहीं जीना है”, तो निश्चित ही उन्हें मरने का पूरा अधिकार है।

किसी बच्चे की जान बचाना समझ में आता है, लेकिन तुम वृद्ध लोगों को क्यों बचा रहे हो जो जी चुके हैं, काफी जी चुके हैं, दुख भोगा, सुख भोगा, सब तरह के अच्छे-बुरे काम किए? अब समय आ गया है-उनको जाने दो।

लेकिन डाक्टर उन्हें नहीं जाने देते क्योंकि वह अवैध है।

उनका आक्सीजन और अन्य जीवनदायी उपकरण वे लोग निकाल नहीं सकते। इसलिए तुम मरणासन्न या अधमरे लोगों की जान बचाए चले जाते हो।

कोई पोप आदेश जारी नहीं करता कि इन लोगों को शरीर से मुक्त होने की अनुमति दी जाए। और उनके शरीरों में बचा ही क्या है? किसी के पैर कटे हैं, किसी के हाथ कटे हैं, किसी का हृदय काम नहीं कर रहा है इसलिए उसकी जगह बैटरी काम कर रही है, किसी के गुरदे काम नहीं कर रहे हैं इसलिए उनके लिए यंत्र लगे हैं। लेकिन इन लोगों का मकसद क्या है? अगर तुम उन्हें इस ढंग से बनाए रखोगे तो भी वे क्या करने वाले हैं?

हां, ज्यादा से ज्यादा वे कुछ लोगों को काम दिलाते हैं, बस। लेकिन वे कौन सा रचनात्मक जीवन जीने वाले हैं? और उनके साथ जो किया जा रहा है उससे उन्हें क्या सुख मिलने वाला है? उन्हें निरंतर इंजेक्शन दिए जा रहे हैं। उन्हें नींद नहीं आती इसलिए नींद की गोलियां दी जा रही हैं। वे जाग नहीं सकते इसलिए उनके खून में एक्टिवेटर (उत्तेजक)दिए जा रहे हैं ताकि वे जाग जाएं। लेकिन किसलिए? उस पाखंडी शपथ के लिए? पाखंडी भाड़ में जाएं। उसे कुछ खयाल नहीं था कि उसकी शपथ क्या गजब ढाने वाली है।

दवाइयों की बजाय, उस मरते हुए आदमी को ध्यान सिखाने के लिए ध्यानी चाहिए क्योंकि अब दवा की नहीं, ध्यान की जरूरत है-कैसे शिथिल हो जाए और शरीर से विदा हो जाए।

प्रत्येक अस्पताल में ध्यानी होने चाहिए, वे अत्यंत आवश्यक हैं-उतने ही जितने कि डाक्टर।

अब तक ध्यानियों की जरूरत नहीं थी क्योंकि एक ही काम था: जान बचाना। अब काम दोहरा हो गया है: लोगों की मरने में सहायता करना। हर विश्वविद्यालय में एक विभाग हो जहां ध्यान सिखाया जाए ताकि लोग स्वयं तैयार हों। जब मरने का समय आ जाए तो वे पूरी तरह से तैयार हो जाएं-आनंद से, उत्सव मनाते हुए।

लेकिन आत्महत्या अपराध है। इसे आत्महत्या समझा जाएगा और लोग कहेंगे कि मैं सबको गैर-कानूनी बातें सिखा रहा हूं।

मेरी उत्सुकता है सत्य में, कानून में नहीं।

सत्य यह है कि तुमने प्रकृति को, जीवन को असंतुलित किया है। उसका संतुलन उसे वापस लौटा दो।

मेरा सुझाव है, एक आंदोलन शुरू किया जाए ताकि जब लोग काफी जी चुके हैं और वे अपने शरीर से मुक्त होना चाहते हैं तो अस्पतालों में सुविधापूर्ण, सुखद मृत्यु का प्रबंध हो सके। यह बिलकुल स्वस्थ दृष्टिकोण है कि हर अस्पताल में एक विशेष कक्ष होना चाहिए जहां सब सुविधाएं हों ताकि मृत्यु एक सुखद, आनंदपूर्ण अनुभव बन जाए।

[ओशो]

जून 6, 2013

ओशो : राहुल सांकृत्यायन (बौद्ध भिक्षु और वामपंथी लेखक)

Osho rahulमेरे एक मित्र, संस्कृत, पाली और प्राकृत के विद्वान, बौद्ध भिक्षु थे| लेकिन वे कम्यूनिज्म की ओर भी आकर्षित हो गये, और इसका कारण साधारण सी समानता थी, कि बुद्ध के यहाँ भी ईश्वर की परिकल्पना नहीं  है और मार्क्स के यहाँ भी नहीं है| सो वे मार्क्सिज्म की ओर आकर्षित हो गये और अंततः कम्यूनिस्ट बन गये| और सोवियत यूनिवर्सिटी ने उन्हें कहा कि वे वहाँ जाकर  संस्कृत पढाएं और वे मॉस्को चले गये|

भारत से बाहर, मॉस्को में हर चीज अलग थी| यहाँ उनके लिए असंभव था कि बौद्ध भिक्षु भी बने रहते और किसी स्त्री से प्रेम भी कर लेते| सोवियत यूनियन  में ऐसी कोई परेशानी नहीं थी| वे वहाँ एक स्त्री के प्रेम में पड़ गये| लोला– उसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थी और उसके दो बच्चे भी थे|

सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी कि वे लोला और उसके बच्चों को सोवियत संघ के बाहर ले जाएँ, अलबत्ता वहाँ वे उनके साथ रह सकते थे| पर राहुल भारत वापिस आना चाहते थे|  और वे घबराये हुए भी थे| एक तरह से सोवियत सरकार उनकी अंदुरनी इच्छा ही पूरी कर रही थी – कैसे वे पत्नी और दो बच्चों के साथ भारत जा सकते थे? सबने उनकी निंदा की होती, खासकर बौद्धों ने,”तुम एक भिक्षु हो|” सो एक तरह से वे खुश भी थे कि सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी सो अब वह प्रश्न ही खड़ा नहीं हुआ|

वे वापिस आ गये| उन्होंने मुझे बताया,” जब मैं पहले पहले सोवियत संघ पहुंचा मैंने एक छोटे लड़के से पूछा,” क्या तुम ईश्वर में विश्वास रखते हो|” उसने कहा,”ईश्वर! लोग अंधे युगों में उसमें विश्वास किया करते थे| अगर आपको ईश्वर की मूर्ति देखनी हो तो आप म्यूजियम में जा देख सकते हैं|” ”

लेकिन ये सब भी प्रोग्रामिंग है| ऐसा नहीं है कि ऐसे छोटे लड़के जानते हैं कि ईश्वर नहीं है या कि कार्ल  मार्क्स ही जनता था कि ईश्वर नहीं है| केवल ध्यान में गहरे उतरने वाला व्यक्ति ही जां सकता है कि ईश्वर है या नहीं|

आप सब लोग किसी न किसी सांचे में ढाले गये लोग हो| आपकी प्रोग्रामिंग की गई है| और तुम्हारे साथ यह इतने गहरे में किया गया है कि तुम समझने लगे हो कि यह तुम्हारा स्वभाव है| तुम्हारी कल्पनाएं, तुम्हारी आशा, तुम्हारा भविष्य …कुछ भी प्राकृतिक नहीं है|

प्रकृति इस क्षण के सिवाय कुछ नहीं जानती| प्रकृति कुछ नहीं जानती, आशा, इच्छाएं , लालसा| प्रकृति तो आनंद उठाती है उसका जो इस क्षण, अभी और यहीं, उपलब्ध है|

राहुल ने मुझे बताया,” रशियन लोगों के लिए सबसे बड़ी अचरज की बात थी मेरे हाथ|”

मैंने कहा,” आपके हाथ!”

उन्होंने कहा,” हाँ मेरे हाथ! जब भी मैं उनसे हाथ मिलाता, वे तुरंत अपने हाथ खींच लेते और कहते,”तुम जरुर बुजुर्वा हो, तुम्हारे हाथ बताते हैं कि तुमने कभी काम नहीं किया|””

मैंने बौद्ध भिक्षु से कहा,”आप मेरे हाथ का स्पर्श करो| तब आपको पता लगेगा कि आप श्रमजीवी हो और मैं बुजुर्वा| यह आपको बहुत बड़ा दिलासा देगा|”

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