Posts tagged ‘Barish’

अक्टूबर 29, 2015

हम एक नदी हैं

LaoTzuहमारा जीवन उस तरह का नहीं है

जैसे कि पहाड़ के एक तरफ चढ़ाई

और दूसरी तरफ ढलान|

हम नीचे गिरने और मरने के लिए

एक शिखर पर नहीं पहुंचे हैं|

हम पानी की बूंदों के जैसे हैं

जो कि समुद्र में जन्मती है

और जिसे नम्र बारिश धरती पर छिड़क जाती है|

हम पहले झरना बने

फिर धारा

और अंत में एक नदी

जो मजबूती से अपनी गहराई लिए बहती जाती है

और अपने घर पहुँचने तक

अपने संपर्क में आने वाली वस्तु को पोषित करती जाती है|

बुढाये जाने के आधुनिक मिथक को स्वीकार मत करो,

तुम गल नहीं रहे हो,

तुम व्यर्थता में खोते नहीं जा रहे हो

तुम एक ऋषि हो,

तुम बहुत गहरी और बहुत उपजाऊ क्षमता वाली नदी हो |

कुछ क्षण एक नदी के किनारे बैठो

और बड़े ध्यान से देखो

जब नदी तुम्हे तुम्हारे जीवन के बारे में बताए|

[“We Are a River,” from The Sage’s Tao Te Ching: Ancient Advice for the Second Half of Life, William Martin’s interpretation of the classic work by Lao Tzu (The Experiment, 2010)]

अनुवाद – …[राकेश]

 

 

फ़रवरी 20, 2013

इतने मुझको प्यारे हो तुम

जितना चिंतन कोई कुंआरा

जितना भोला कोई इशारा

जितना बंधन कोई दुलारा

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

जितनी बारिश कोई सुहानी

जितनी प्यारी कोई कहानी

जितनी डगर कोई अनजानी

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

जितना सपन कोई सीने में

जितना नशा है गम पीने में

जितना दर्द है चुप जीने में

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 10, 2012

तुम्ही बताओ क्या होगा?

जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

रजनी-गंधा देह तुम्हारी
मन गंगा का पानी
जी चाहे तुम पर मैं लिख दूं
कोई प्रेम कहानी |

जब ऐसा अदभुत रूप नयन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

बेले में है खुशबू तुमसे
रूप में रंग तुम्हारा
रंग और खुशबू का बोलो कैसे हो बंटवारा
जब इतनी कठिन घड़ी उपवन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

केश तुम्हारे रेशम – रेशम
भौंह लचकती डाली
मधु- प्याले से नयन तुम्हारे
ओठ उषा की लाली
जब इतनी रूप-राशि दर्पण के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

यह तो शायद तुम ही जानो कौन बसा है तुम में
तुम्हे देख कर मैं यह मानूं
अघट नशा है मुझमें
जब बारिश की दो बूँद तपन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

{ कृष्ण बिहारी }

जुलाई 22, 2011

मौसम

रिमझिम मौसम में
हरी दूब पर
नंगे पाँव चलाना सुहाता है,
बे-एतबार फुहारों में
अक्सर खिलते हैं
रिश्तों के मासूम फूल,
सर्द रूत जमाने लगती है
गुलाबों की पंखडियों पर ओस,
बर्फ होते दिलों के
अजनबी बनते एहसास
बेरुखी के लिहाफ में
करवटें बदल कर सो जाते हैं।

बल खाती नदियों की जवानी
सोख लेती हैं बेदर्द गर्मियां,
जज़्बात की जलन में
चिता होते देखे रेश्मी आँचल
और चौड़े-चकले फौलादी सीने,
संबंधों के सूखे तीरों के बीच
समय का चिरस्थाई समुद्र
बचा रह जाता है.
सूनी आँख से रिसता
मौसमों के बदलाव में।

(रफत आलम)

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