Posts tagged ‘Baras’

जनवरी 7, 2014

पंडित और डम्बलडोर

अवगाह लिए सब ग्रंथbeautifulmind-001

कंठस्थ हो गईं ऋचाएं

भौतिकी से आध्यात्म तक

ज्यामिती से इतिहास तक

अब तक मानव ने पाया था जो ज्ञान!

मस्तिष्क के तंतुओं का जाल

शरीर के ऊतकों का स्थान

पाकर यह सब ज्ञान

दिख पड़ता है कान्तिमान

गर्व से दपदपाता, जब-तब होता इस पर मान!

पर छटपटाया कई बरस

ज्ञान की पोथियों से शिथिल मन

न मिली कोई राह

ना बन सका कोई प्रवाह

तब एक दिन सहसा भरभरा कर गिरा वितान!

बात बस इतनी सी थी

फंतासी में सपने सी थी,

जब डम्बलडोर ने कहा भर

कहीं से सपने में आकर

सिर्फ फैसले हमारे, कराते हमारी पहचान!

Yugalsign1

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नवम्बर 16, 2013

हर प्रीत नूतन है!

पांच बरस लंबी सड़क पर AB-001

पता नहीं सोता सा चला था शायद !

कि,

हर नया दिन,

पुराने का हिस्सा नहीं लगता|

लगता है, सड़क भी बनी है,

टुकड़ों-टुकड़ों में!

कल की याद ही नहीं कुछ-

बस अहसास भर होता है कि

कुछ गुजरा भर था|

मुझे कुछ याद नहीं है-

न परिणय

न चुम्बन

न कलह

जब तुमसे मिलता हूँ,

लगता है फिर कोंपलें फूट आई हैं

फिर नया सवेरा है

और हर बात,

हर प्रीत नूतन है|

Yugalsign1

अक्टूबर 4, 2011

बेज़ुबान अहसास

यूँ ही भटकते हुए पता नहीं
क्यों लौटा था बरसों बाद
पार्क के उस कोने की ओर
जहाँ खुशबू भरे माहौल में
रंगीन सपने बुने जाते थे कभी।

लकड़ी की बेंच अब वहाँ नहीं है
जिस पर बिखरा करता था
अल्हड़ उमंगों का ताना-बाना।

चहचहाते पंछी कब के उड़ गये
प्रेमगीत गाकर
नीम के मोटे तने पर,
नादान उम्मीदों ने गोदे थे नामों
के पहले अक्षर
सूखा ठूठ बना खडा है वह।

आज भी हवाओं के दामन पर
मंज़र दर मंज़र धुंधलाई हुई कहानियाँ
फव्वारों की इंद्रधनुषी फुहारों में
बिखर रही हैं कतरा कतरा।

खामोशी की भाषा पढ़ने वाली आँखे
अब कहाँ उस अहसास के साथ
जिसके पास केवल बेज़ुबानी बची है।

(रफत आलम)

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