Posts tagged ‘Banaras’

मई 11, 2014

“बनारस” : कवि ‘केदारनाथ सिंह’ ने जैसा देखा

इस शहर में बसन्तbanaras
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्वमेघ पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढ़ियों पर बैठे बन्दरों की आँखों में
और एक अजीब-सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में बसन्त का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर

इसी तरह रोज-रोज एक अनन्त शव
ले जाते हैं कन्धे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं है

जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्तम्भ के
जो नहीं है उसे थामे हैं
राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तम्भ
आग के स्तम्भ
और पानी के स्तम्भ
धुएं के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्तम्भ

किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर!

साभार : ओम थानवी जी, संपादक ‘जनसत्ता

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मई 10, 2014

अरविन्द केजरीवाल : Pics – 9 मई रोड शो @ वाराणसी

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मई 7, 2014

मोदी जीते तो काशी हार जायेगा : काशीनाथ सिंह

Kashinath Singh

गुजरात के किसान वाराणसी में वाराणसी, गुजरात के 50 किसानों का एक जत्था मोदी के विकास मॉडल पर हमला बोलने के लिए बनारस पहुंचा है। ये किसान आप प्रत्याशी अरविंद केजरीवाल की सभाओं में वहां के किसानों की बदहाली के बारे में बता रहे हैं। केजरीवाल को बनारस के ग्रामीण इलाकों में समर्थन मिलता दिख रहा है, क्योंकि ग्रामीण उन्हें अपने घर बुलाने लगे हैं। ग्रामीण इलाकों में रोड शो कर रहे केजरीवाल रास्ते में कहीं भी जीप रुकवाकर लोगों से मिलने उनके घरों-झोपडि़यों तक ऐसे पहुंच जा रहे हैं, जैसे पुरानी पहचान हो। अरविंद गांव वालों के बीच बैठकर दिन में लइया चना खाते हैं और रात में किसी ग्रामीण के घर में खाना खाकर आराम करते हैं। अपने बीच किसी नेता को पाकर गांव वाले प्रसन्न हैं। वे उन्हें अपने घर बुलाकर खाना खिला रहे हैं। [दिनेशराय द्विवेदी]

AK kashi manifesto

मई 6, 2014

अरविन्द केजरीवाल‬: जिला अधिकारी@वाराणसी के नाम पत्र

सेवा में,AK@Varanasi
जिला अधिकारी,
वाराणसी, उ0प्र0

महोदय,
आपका 2 मई 2014 का लिखा पत्र मिला। (पत्र संख्या 4542/एस.जी.-नगर-2014) इस पत्र के साथ आपने पुलिस उपाधीक्षक (प्रज्ञान), काशी, की 28 अप्रैल 2014 की रिर्पोर्ट संलग्न की है। उनकी इस रिर्पार्ट पर मुझे घोर आपत्ति है।

उन्होंने अपनी रिर्पार्ट में लिखा है कि मैं ‘‘हिन्दु बाहुल्य तथा भाजपा समर्थित स्थानों’’ पर श्री नरेन्द्र मोदी जी के खिलाफ बोल रहा हूं, जिससे पुलिस को परेशानी हो रही है। तो क्या आपके पुलिस उपाधीक्षक चाहते हैं कि मैं श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलना बंद कर दूं? काशी का तो अधिकतर इलाका हिन्दू बाहुल्य है। तो क्या पूरे काशी में श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलना बंद कर देना चाहिए?

जो लोग हिंसा कर रहे हैं, वो लोग हिन्दू नहीं बल्कि भाजपा के गुण्डे हैं। आपके उपाधीक्षक का यह मान लेना कि सभी हिन्दू नरेन्द्र मोदी जी समर्थक हैं- यह सरासर गलत है। आपके उपाधीक्षक का यह मान लेना कि सभी हिन्दू श्री नरेन्द्र मोदी जी के खिलाफ कोई भी बात सुनने पर हिंसा करने लगेंगे- यह बहुत ही खतरनाक है।

हिन्दू धर्म के लोग दुनिया के सबसे शांतिप्रिय लोग हैं। कोई भी हिन्दू हिंसा नहीं चाहता। बल्कि हिन्दू धर्म ‘वसुदैव कुटुम्बकम’ सिखाता है।
28 अप्रैल 2014 की आपके पुलिस उपाधीक्षक की रिपोर्ट साफ-साफ दर्शाती है कि आपके पुलिस उपाधीक्षक घोर नरेन्द्र मोदी समर्थक हैं, भाजपा समर्थक हैं और हिन्दू धर्म के बारे में बहुत ही गलत विचार रखते हैं।

इसी रिपोर्ट में आपके उपाधीक्षक ने लिखा है- ‘‘श्री अरविंद केजरीवाल द्वारा अपने प्रचार-प्रसार के दौरान ऐसे हथकन्डे अपनाए जा रहे हैं, जिससे मीडिया का ध्यान आकर्षण किया जा सके व मीडिया फोकस इन पर बना रहे।’’ आपके पुलिस उपाधीक्षक की टिप्पणी पर मुझे घोर आपत्ति है। क्या अब आपके पुलिस उपाधीक्षक मुझे सिखायेगें कि मुझे चुनाव प्रसार कैसे करना है?

मैं बिना सुरक्षा के जनता के बीच घुस जाता हूं, जनता से हाथ मिलाता हूं, जनता को गले लगाता हूं, जनता के प्रश्नों के जवाब देता हूं। जनता में से कोई भी मुझे घर बुलाता है और यदि मेरे पास समय हो तो मैं उसके घर भी चला जाता हूं। मेरे इसी व्यवहार को आपके पुलिस उपाधीक्षक ‘‘हथकंडा’’ कह रहे हैं। आपको शायद अपने पुलिस उपाधीक्षक को ‘जनतंत्र’ की परिभाषा बतानी होगी कि जनतंत्र हेलिकौपटर और एअर कंडिशन्ड कमरों से नहीं चलता। जनतंत्र गली-मोहल्लों, सड़कों और गांव-गांव में घूमने से चलता है।

AK on Banaras electionमेरा संवाद सीधे काशी की जनता से है। आपकी पुलिस यदि मेरे और काशी की जनता के बीच में आने की कोशिश करेगी तो मैं ऐसी सारी कोशिशों को नाकाम कर दूंगा। आपकी नज़र में यह ‘हथकंडा’ हो सकता है, मेरी नज़र में यही ‘जनतंत्र’ है।

मैंने कभी आपसे अपने लिए सुरक्षा नहीं मांगी। इस पत्र के ज़रिए मैं आपसे निवेदन करता हूं कि आपने अपनी मर्जी से मेरी सुरक्षा में जो पुलिस कर्मी लगाए हैं, उन्हें तुरन्त वापिस ले लिया जाए। इन सभी पुलिस कर्मियों को काशी की जनता की सुरक्षा के लिए लगाया जाए। मुझे सुरक्षा नहीं चाहिए। काशी की जनता मेरी सबसे बड़ी सुरक्षा है। काशी के लोग मुझे बहुत प्यार करने लगे हैं। काशी में मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बाबा विश्वनाथ जी का मुझ पर आशीर्वाद है, फिर किस बात का डर।

आप काशी की जनता की भाजपा के गुण्डों से सुरक्षा कीजिए, मेरी सुरक्षा की चिन्ता छोड़ दीजिए।

धन्यवाद्,
अरविंद केजरीवाल
राष्ट्रीय संयोजक, आम आदमी पार्टी

ak in kashi

अप्रैल 30, 2014

ध्रुवीकरण के धुरंधर – रवीश कुमार (NDTV)

Muslim tirangaमुसलमान एक तरफ़ जाएगा तो उसके ख़िलाफ़ हिन्दू दूसरी तरफ़ जाएगा। इससे मिलता जुलता विश्लेषण आप टीवी पर ख़ूब सुनते होंगे। मतदान की आती तस्वीरों के साथ टीवी स्टुडियो में बैठे जानकार किस आधार पर यह बात कह रहे होते हैं समझना मुश्किल है। हमारी राजनीति में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण एक तथ्य है मगर यह मिथक भी है। ध्रुवीकरण सतही और सामान्य व्याख्या का ऐसा औज़ार हो गया है जिसके सहारे जानकार एक मतदाता को साम्प्रदायिक रंग से पेंट कर देते हैं। इसी के साथ एक और मिथक की रचना करने लगते हैं। ‘टैक्टिकल वोटिंग’ का मिथक। क्या अन्य जाति धर्म समूह इस तरह से वोटिंग नहीं करते अगर करते हैं तो क्या वो इस कथित टैक्टिकल वोटिंग के जैसा ही है।

एक साइड मुसलमान तो दूसरी साइड हिन्दू। ऐसा लगता है कि स्टुडियो में बैठे जानकार एक ख़ास समुदाय की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि मुसलमान एकजुट हो रहे हैं । भाजपा के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं लिहाज़ा स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को भी भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाना चाहिए। अख़बारों में भी ऐसी बातें ख़ूब लिखी जा रही हैं। कई बार लगता है कि एक रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है। मतदान प्रक्रिया का एक अदना सा एक्सपर्ट भी जान सकता है कि कुछेक अपवादों को छोड़ सामान्य रूप से यह बात सही नहीं है। कई बार लगता है कि चुनाव के समय ऐसे विश्लेषणों के सहारे समाज में साम्प्रदायिकता को भड़काने का काम किया जाता है।

क्या हिन्दू हमेशा यह देखकर वोट देता है कि मुसलमान किस तरफ़ वोट दे रहा है या मुसलमान यह देखकर वोट देता है कि हिन्दू किस तरफ़ देता है । इसका वैज्ञानिक आधार क्या है। हर चुनाव में मुस्लिम मतदाता को ब्रांड करने का खेल खेला जाता है। जैसे उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं है और वो सिर्फ मुसलमान बनकर वोट करता है। अगर ऐसा होता तो यह बात सही होती कि एक आम मुस्लिम मतदाता इमाम बुख़ारी जैसे धर्मगुरुओं के कहने पर ही वोट कर देता। किसी भी चुनाव का आँकड़ा देखेंगे तो यह ग़लत साबित होता है। आम मुस्लिम मतदाता बड़े आराम से मतदान के फ़ैसले में मुल्ला मौलवियों की दख़लंदाज़ी को पसंद नहीं करता। खुलकर बोलता भी है लेकिन मीडिया ऐसे धर्मगुरुओं के बहाने मुस्लिम मतदाताओं का सांप्रदायिकरण करता रहता है।

इसी संदर्भ में एक और बात कहना चाहता हूँ। बाबा रामदेव जैसे कई योग गुरु और धर्मगुरु भी तो किसी पार्टी के लिए वोट मांगते हैं। इमाम बुख़ारी का अपील करना साम्प्रदायिक और बाबा रामदेव या शंकराचार्य का अपील करना राष्ट्रभक्ति। कैसे? मैं दोनों की तुलना नहीं कर रहा लेकिन मूल बात यह है कि सभी प्रकार के मज़हबी नेता चुनाव के वक्त सक्रिय होते हैं। कोई आशीर्वाद के नाम पर इनके पास जाता है तो कोई अपने भाषणों में देवी देवताओं के प्रतीकों का इस्तमाल करके धर्म का इस्तमाल करता है। खुद को ईश्वर का दूत बताना क्या है।

आम मतदाता को इससे सचेत होने की ज़रूरत है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हमारे तमाम धर्मों के गुरुओं का समाज से गहरा नाता होता है। झट से उनके किसी राजनीतिक आचरण को साम्प्रदायिक क़रार देने से पहले देखना चाहिए कि वे क्यों ऐसा कर रहे हैं। उनका आधार सांप्रदायिक है धार्मिक है या राजनीतिक। अगर विरोध करना है तो एक साथ डेरों, मठों, मस्जिदों की राजनीतिक दख़लंदाज़ी का विरोध कीजिये।

मैं फिर से लौटता हूँ अपनी मूल बात पर। तमाम अध्ययन बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता अपनी पसंद के हिसाब से अलग अलग राज्यों में अलग अलग पार्टी और नेता को वोट करता है। मुसलमान एक नहीं कई दलों को वोट करने के साथ साथ बीजेपी को भी वोट करता है। मध्यप्रदेश राजस्थान और गुजरात में भी करता है। हो सकता है कि प्रतिशत के लिहाज़ से कम हो लेकिन आप यह भी तो देखिये कि बीजेपी ने इन राज्यों में लोकसभा के चुनावी मैदान में कितने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में कितने उतारे हैं। पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी को पचीस छब्बीस प्रतिशत मत मिले थे शेष और पचहत्तर फ़ीसदी मत अन्य दलों को। अगर हिन्दू वोट जैसा कुछ होता तो बीजेपी को पचहत्तर फ़ीसदी वोट मिलते। जो हिन्दू बीजेपी को वोट नहीं करते उनके न करने के आधार क्या हैं। हमारे ये जानकार हिन्दू मतदाताओं के विवेक के साथ भी अन्याय करते हैं। मतदाताओं का अति हिन्दूकरण कर साम्प्रदायिक रंग देते हैं।

चलिये इस बात को एक और तरीके से देखते हैं। हर समुदाय या जाति के लोग अपने उम्मीदवारों को वोट देते हैं। इसी आधार पर कांग्रेस बीजेपी सब अपने उम्मीदवार तय करते हैं। तब भी बीजेपी को हराने के लिए मुसलमान किसी मुसलमान उम्मीदवार को वोट नहीं करता है। वो उसी दल या उम्मीदवार को वोट करेगा जिसके पास पर्याप्त वोट हो। यह वोट कहाँ से आता है। कथित रूप से हिन्दू समाज से ही न। तो यह बात कैसे उचित ठहराई जा सकती है कि हिन्दू एक तरफ़ जाते हैं और मुस्लिम दूसरी तरफ़ । क़ायदे से तो एक दूसरे की पार्टी को हराने के लिए दोनों मिल-जुल कर एक दूसरे के ख़िलाफ़ गोलबंद होते हैं। इसके बाद भी सारे मुसलमान किसी एक व्यक्ति या दल को वोट नहीं करेंगे।

मुसलमानों को कथित रूप से बीजेपी के ख़िलाफ़ पेश किये जाने के बाद भी जानकार जानते हैं कि वे कहीं भी एकमुश्त वोटिंग नहीं करते। यह संभव भी नहीं है। ऐसा होने लगा तो समझिये कि मुस्लिम समाज के भीतर आपसी टकराव ही समाप्त हो जायें। आप भी जानते हैं कि मुसलमानों के बीच अगड़े पिछड़े और दलित मुसलमानों के हक़ को लेकर ज़बरदस्त टकराव है। पिछले दिनों कई राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश, केरल और असम, मुस्लिम दलों का उदय हुआ है क्या ये सभी बीजेपी के ख़िलाफ़ उभरे हैं? नहीं। इनसे चुनौती कांग्रेस सपा बसपा लेफ़्ट को भी मिलती है।

इसीलिए जानकारों को ध्रुवीकरण की बेहद सतही और ख़तरनाक व्याख्या से बचना चाहिए। बनारस में नरेंद्र मोदी जब अपने नामांकन के लिए जा रहे थे तो उस भीड़ में भी कैमरे मुसलमान ढूँढ रहे थे। उनका क्लोज़ अप दिखा रहे थे। मुझे इस बात से आपत्ति है। क्या कैमरे उस भीड़ में शामिल अन्य लोगों को भी उसी निगाह से देख रहे थे। अगर नहीं तो फिर एक या दो मुसलमान की तलाश क्यों हो रही थी। तब भी जब नरेंद्र मोदी के साथ मुख़्तार अब्बास नकवी नज़र आ रहे थे। बीजेपी भले हिन्दुत्व या संघ के कहने पर चले पर उसे मिलने वाला हर वोट इसके लिए नहीं मिलता। बीजेपी के कार्यकर्ता चाहें जितना हिन्दुत्व के रंग रूप में ढल कर आक्रामक हो जायें उनकी पार्टी को मिलने वाला हर वोट हिन्दू वोट नहीं है। ज़्यादातर दलित मतदाताओं को खुद को इस पहचान से जोड़ कर देखे जाने से आपत्ति हो सकती है जबकि हो सकता है कि वो वोट बीजेपी को दें।

हमें जनमत का साम्प्रदायिकरण नहीं करना चाहिए। सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण हमारी राजनीति की ख़तरनाक सच्चाई है लेकिन ऐसा हर जगह किसी एक फ़ार्मूले के तहत नहीं होता कि मुसलमान इधर गए तो हिन्दू उधर चले जायेंगे । कई बार लगता है कि जानकार मुस्लिम मतदाताओं का मज़हबी चरित्र चित्रण करते हुए ग़ैर मुस्लिम मतदाताओं को इशारा कर रहे होते हैं कि उन्हें वोट कहाँ देना चाहिए।

(रवीश कुमार)

मार्च 25, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नरेंद्र मोदी @ वाराणसी : क्यों?

aktrain25 मार्च को बनारस में सुबह एक अलग ही किस्म की होगी…
इतनी उत्सुकता, बनारस की गलियों, इसके मोहल्लों, इसके कूचों, और इसके बाशिंदों ने अरसे से न महसूस की होगी जैसी 25 मार्च की सुबह लेकर आयेगी|

रहे होते आज बिस्मिल्लाह खान साब तो किसी और ही अंदाज में गंगा तट पर शहनाई बजाते आज की सुबह|
बनारस, दुनिया के प्राचीनतम शहरों में से एक, (जिसका पुराना नाम काशी/वाराणसी/बनारस दो हजार साल से चला आ रहा है), बहुत बड़ी जिम्मेदारी अपने कन्धों पर उठाने जा रहा है|

बनारस ने सदियों से दुनिया को ज्ञान दिया है, सभ्यता की मिसालें दी हैं, सांस्कृतिक और कलात्मक धरोहरें प्रदान की हैं…

और आज फिर देश बनारस की ओर देख रहा है…

बनारस को निर्धारित करना है …

– यह संकुचित विचारधारा अपनाने वाली बुरी राजनीतिक शक्ति को, जिसके पास धन बल की सामर्थ्य बहुत बड़ी है और जिसने आपनी राजनीतिक दुकान साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर, देश के मानस को बांटकर चलाई है, समर्थन देकर अपने अस्तित्व पर एक कालिख मल लेता है,

या

– यह देश के लिए बदलाव की बात करने वाली उदारवादी, एक नई राजनीतिक आशा को शक्ति प्रदान करता है|

 

AK@Benaras

 

जुलाई 9, 2010

भारत पाक शांति प्रयास : भारतीय शायर अली सरदार जाफरी

Dove Talk के दूसरे भाग में प्रस्तुत है मशहूर शायर मरहूम अली सरदार जाफ़री साब की कविता जो उन्होने पाक शायर अहमद फराज़ साब के कलाम [यहाँ पढ़ें] के जवाब में पढ़ी थी।

जो हाथ तुम ने बढ़ाया है दोस्ती के लिये
मेरे लिये है वो एक ग़म गुसार के हाथ

खुदा करे कि सलामत रहे ये हाथ अपने
अता हुये हैं जो जुल्फें संवारने के लिये

करें अहद के औजार-ए-जंग है जितने
उन्हे मिटाना है और खाक में मिलाना है

करें ये अहद के अरबाबे-जंग है जितने
उन्हे शराफत-ओ-इंसानियत सिखाना है

तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बरदोश
हम आये सुबह बनारस की रोशनी लेकर
और उसके बाद ये पूछें कि कौन दुश्मन है?

{Dove Talkअली सरदार जाफ़री}

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