Posts tagged ‘Bali’

फ़रवरी 22, 2017

समर शेष है … रामधारी सिंह दिनकर

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time (A Novel) …कुछ झलकियां

RamStory2

‘सर, मुझे लगता है वह आदमी अभी जिंदा होगा’| मेजर शैलेन्द्र रावत ने कहा|

‘रावत, तुम ऐसा दावे के साथ कैसे कह सकते हो’? कर्नल सिंह ने कहा|

‘सर, मैं एक गढवाली हूँ| मैंने हिमालय में बहुत सी ऐसी गुफाएं देखी हैं जहां योगी और साधू अभी भी साधना किया करते हैं| यह गुफा भी प्राकृतिक गुफा नहीं थी वरन मानव निर्मित थी| यह अवश्य ही साधुओं और तपस्वियों की किसी परम्परा दवारा विकसित गुफा है जो अभी भी साधना के लिए उपयोग में ली जाती है| संन्यासी सदियों से ऐसी गुफाओं का इस्तेमाल करते रहे हैं| हजारों हजार तपस्वियों की साधना से ऐसी गुफाएं ऊर्जा से लबरेज रहती हैं| साधना के इच्छुक साधुओं और योगियों को यहाँ भेजा जाता है ताकि वे एकांत में साधना कर सकें| यदि वह आदमी इस गुफा में कुछ दिन रुका तो ऐसा नहीं हो सकता कि जिस परम्परा की यह गुफा है, उस परम्परा के संन्यासियों को इस बात का पता न चला हो| हो न हो संन्यासी उस व्यक्ति को अपने साथ ले गये होंगे और वह सांसारिक बंधनों से मुक्त्त होकर स्वयं भी संन्यासी बन गया होगा|’

‘शैलेन्द्र, कैसे तुम इतना ठोस दावा कर सकते हो?|

‘सर, मैंने गुफा में धूप बत्ती की राख देखी और लोबान की सुगंध को महसूस किया और मुझे पूरा विश्वास है कि वह आदमी तो अपने साथ धूप लेकर गया नहीं होगा| संन्यासी धूप का प्रयोग करते हैं गुफा के अंदर रोशनी के लिए और यह अंदर की वायु को भी शुद्ध करती है| सूबेदार दीक्षित ने इन् बातों पर ध्यान नहीं दिया किन्तु मैंने ऐसे छोटे छोटे संकेतों पर ध्यान केंद्रित किया| केवल एक बात मेरी समझ में नहीं आई और जो मुझे उसी समय से परेशान कर रहे एही जबसे मैंने गुफा के अंदर पैर रखा था| मेजर रावत ने खोये खोये से स्वर में कहा|

सब लोग शांत होकर मेजर रावत की बात सुन रहे थे, उन सभी को अपनी ओर देखते हुए पाकर, मेजर ने कहा,”सर, गुफा के गीले पथरीले फर्श पर मैंने दो जोड़ी पांवों के निशान देखे| हालांकि गुफा के बाहर पैरों के बहुत सारे निशान थे, पर अंदर केवल दो ही जोड़ी थे| और एक जोड़ी पाँव के निशान असामान्य थे और आकार में काफी बड़े थे| इतने बड़े पैरों के निशान सामान्य मनुष्य के नहीं हो सकते”|

‘तो, तुम कहना क्या चाहते हो?”

‘पता नहीं सर, मैं खुद इस गुत्थी को नहीं सुलझा पा रहा हूँ’|

‘क्या वे किसी जानवर के पंजों के निशान थे?’

‘नहीं सर, जानवर के पंजे के निशान तो बिल्कुल भी नहीं थे| थे इंसानी पाँव के निशान ही, परन्तु बहुत ही बड़े पैरों के निशान थे, और निशान की स्पष्ट छाप बता रही थी कि वे किसी बहुत भारी मनुष्य के पैरों के निशान थे’|

‘ह्म्म्म’|

कुछ देर की खामोशी के बाद जवान मधुकर श्रेष्ठ ने आगे बढ़कर हिचक के साथ कहा,”साहब अनुमति हो तो मैं भी कुछ कहूँ?”

‘जरुर’|

‘साहब, उत्तराखंड और नेपाल में ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी अमर हैं और वे अभी तक हिमालय में विचरण करते हैं| सर, ऐसा कहा जाता है कि जो भी उन्हें देख लेता है वह या तो पागल हो जाता है या मर जाता है| कृपया इसे एक बुढाते व्यक्ति का अंध-विश्वास मान कर नकारिये मत| मुझे विश्वास है कि वे असामान्य पांवों के निशान अवश्य ही हनुमान जी के थे| आज के दौर के मनुष्यों के पांवों के निशान वैसे हो ही नहीं सकते|”

‘क्या ऊलजलूल बात कर रहे हो?’

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

‘आह पवित्र वेदों के ज्ञान को मौखिक रूप से अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए श्रुति की परम्परा को सुरक्षित करने के लिए एक और शिष्य! लेकिन परिश्रमी मनुष्यों के कठोर परिश्रम को पार्श्व में ढकेल कर देवताओं और उनसे सम्बंधित सर्वथा कर्महीन राजाओं की झूठी महानता का वर्णन क्यों? कथाओं में राजाओं का संबंध ईश्वर से स्थापित करके उन्हें आम जनता की निगाहों में अजेय और अमर बनाकर राजवंशों को अमरता प्रदान करने का षड्यंत्र कब तक चलेगा?’ विश्वामित्र ने क्षुब्ध होकर सोचा|

विश्वामित्र ने धीमे स्वर में पूछा,”चारुदत्त, तुमने यह कहानी कहाँ सुनी?”

“भगवन, ब्रह्म-ऋषि वशिष्ठ के गुरुकुल में”|

विश्वामित्र अपनी निराशा छिपा नहीं पाए और सयंत लेकिन दबे हुए क्रोधित स्वर में बोले,” चारुदत्त, मुझे नहीं पता, वहाँ क्या पढ़ाया जाता है| राज्यों के कोष से चलने वाली शिक्षण संस्थाएं इतिहास का पुनर्लेखन एवं पुनर्पाठ करती हैं क्योंकि यह उनके आश्रयदाता के हितों के अनुकूल होता है| भगीरथ की असली कहानी क्या है, कोई नहीं जनता लेकिन जिसमें मैं विश्वास रखता हूँ , मैं तुम लोगों को वह सुनाता हूँ”|

* * * * * * * * * * * * * * * * *

“रानी सुमित्रा के दो जुड़वा बेटे हैं, लक्ष्मण और शत्रुघ्न| लक्ष्मण अपनी माँ की तरह है, लाग-लपट से दूर, सीधे सच्चे बोंल बोलने वाला| शत्रुघ्न को राजमहल की ऐश्वर्यपूर्ण जीवन शैली पसंद है पर लक्ष्मण को महल से बाहर का जीवन भाता है| वह तीव्र बुद्धि वाला मेहंताकश इंसान है| अपनी माँ की तरह उसे भी राजा दशरथ की महिलाओं के प्रति कमजोरी, राजा की चापलूसों से घिरे रहने की आदत, और सबसे छोटी रानी कैकेयी के सामने घुटने टेक कर रहने की प्रवृति सख्त नापसंद है| लक्ष्मण के पास सूचना एकत्रित करने का तंत्र विकसित करने की विलक्षण प्रतिभा है| राजसी सेवकों में लक्ष्मण बेहद लोकप्रिय है और वे उसके प्रति बेहद निष्ठावान हैं| एक बार मैंने लक्ष्मण से पूछा कि वे कैसे सेवकों से एकदम सही सूचना निकलवा पाने में सफल रहते हैं, सेवक उनको क्यों इतना पसंद करते हैं ?”|

विनम्र लक्ष्मण ने हँस कर उत्तर दिया,” शायद वे महसूस करते हैं कि मैं उनमें से एक हूँ”|

“मैंने सुना है राम कैकेयी को पसंद नहीं करते”| विशालक्ष ने अँधेरे में तीर छोड़ा|

धरमरुचि ने उसकी ओर ऐसे देखा मानों अनुमान लगा रहा हो कि यह प्रश्न अज्ञानता का फल है या मूर्खता का|

‘नहीं, ऐसा नहीं है| लक्ष्मण से उलट, राम के कैकेयी के साथ अच्छे संबंध हैं| कैकेयी के शुरुआती मानसिक द्वंद को छोड़कर, वे आसानी से राम के ह्रदय में प्रवेश कर गयीं| कैकेयी बेहद सुंदर थीं और उनकी उम्र भी बहुत नहीं थी, राम से हो सकता है छह सात साल ही बड़ी हों, मुझे निश्चित नहीं पता”|

* * * * * * * * * * * * * * * * * *

‘मुनिवर, इसमें क्या हानि है अगर किसी ने पुराना और व्यर्थ पड़ा धनुष तोड़ दिया’? लक्ष्मण ने लापरवाह अंदाज़ में कहा|

क्रोध से उबल कर परशुराम ने अपने विशाल फरसे से वार किया किन्तु लक्ष्मण ने उतनी ही शीघ्रता से फरसे के वार से अपना बचाव कर लिया|

यह सब देख, विश्वामित्र ने आगे बढ़कर परशुराम को चेताया|

‘भार्गव, यह युद्ध स्थल नहीं है| यह राज दरबार है| कृपया इसकी मर्यादा का सम्मान करें| एक बालक के ऊपर फरसे से वार करना आपको शोभा नहीं देता’|

‘पितामह, यदि परम्परा का सम्मान नहीं होगा तो मेरा फरसा हर व्यक्ति को समुचित उत्तर देगा चाहे वह राजा जनक हो या दशरथ का यह युवा पुत्र| आप कृपया मेरे मामले में न पड़ें’|

विश्वामित्र ने परशुराम को शांत करके समझाने का प्रयत्न किया|

राम, आपने यहाँ आने का कष्ट किया| मैं आपके गुस्से को समझ पाने में असमर्थ हूँ| आप एक पुराने धनुष की तुलना परम्परा तोड़ने से कर रहे हैं| क्यों? कृपया इस आयोजन की मूल भावना को समझने का प्रयत्न करें| मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपने फरसे का उपयोग धर्म की रक्षा के लिए करें’|

‘कौशिक, जिस किसी ने शिव के महान पिनाकी का अपमान किया है, मैं उसे नहीं छोडूंगा| प्रतीकों की अपनी गरिमा होती है| अगर आप मेरे दुश्मनों के साथ खड़े होंगें तो मैं भूल जाउंगा कि आप मेरे पितामह हैं’|

‘भार्गव आपके दुश्मन कौन हैं? राजर्षि जनक या राम, जिसने कि राक्षसों का संहार किया है कमजोर लोगों की सहायता करने के लिए? ऐसा क्यों है कि रावण जैसे आतंकवादी आपके दुश्मन नहीं हैं?’|

‘कौशिक मेरा ध्यान बंटाने की चेष्टा मत कीजिये| मैं रावण को अपना दुश्मन क्यों मानूं?’

‘क्यों नहीं? आपके लिए शिव भक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण है, मासूमों और निर्दोषों के हत्यारों को सजा देने से| क्षमा कीजिये परन्तु आप छिलके की रक्षा कर रहे हैं और फल को सड़ने दे रहे हैं!’

*   * * ** * * * * * * * * * * * * * * * * * *

रात्री में लक्ष्मण ने राम से पूछा,”हनुमान औरों से अलग कैसे हैं, विशेषकर अंगद से? क्या किसी साधारण मानव दवारा ऐसा चमत्कारिक कर्म करना संभव है”?

‘जब एक साधारण मनुष्य चमत्कार करता है तभी वह महान बनता है| लक्ष्मण, हमारा दृष्टिकोण हमें अलग बनाता है| दृष्टिकोण ही हमें प्रेरित करता है, जोखिम उठाने के लिए तैयार करता है, और हमारे निश्चय को दृढ बनाकर, हमें प्रतिबद्ध बनाता है ताकि हम अपने धर्म को जी सकें, अपना कर्म को पूर्णता प्रदान कर सकें|’

अंगद और अन्यों ने क्यों समुद्र पार करने से इंकार कर दिया?’ लक्ष्मण ने पूछा|

‘केवल हनुमान ने असफल होने के भय को किनारे करके आगे बढ़ने का जोखिम उठाया| हरेक के लिए यह कहना आसान था कि वे समुद्र किनारे तक गये पर सीता का कोई सूत्र उन्हें नहीं मिला| कोई भी उनसे प्रश्न नहीं करता| परन्तु लक्ष्मण, लक्ष्य था सीता को ढूँढना| वह थी प्रतिबद्धता| जोखिम उठाने वाला दृष्टिकोण हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है| इससे असीमित ऊर्जा और संभावनाओं का प्रस्फुटन होता है| इसके लिए, फले हमको अपने अंदर से असफल होने की लज्जा बाहर निकालना पड़ता है|

‘क्या सीता को ढूँढने के अभियान के वक्त अंगद का व्यवहार अजीब नहीं था?’

‘कैसे?’ राम ने पूछा|

‘अपने दल के सदस्यों को प्रेरित करने के स्थान पर उसने उन्हें निराश करने की कोशिश की| इसके अलावा उसने सुग्रीव को अपशब्द कहे और युवराज जैसे पद से न कहने वाले वचन कहे|’

‘लक्ष्मण, अंगद के भय असुरक्षा की भावना से उपजे हैं| ऐसा युवा जो कि अपनी संभावनाओं के प्रति शंकालू हो और जो जोखिम लेने में रूचि न रखता हो, वह असफलता से घबराएगा ही| हमें उसे मजबूती प्रदान करनी होगी और उसे आत्मविश्वास से भरना होगा| मैं युद्ध से पहले यह काम करूँगा|’

लक्ष्मण को अपनी ओर देखता पाकर राम ने कहा,”लक्ष्मण, असफलता का भय हमें अपनी पूरी शक्ति से काम करने से रोकता है| एक बात बताओ, क्यों कोई भी वानर इस अभियान पर जाने के लिए तैयार नहीं था? वे सब असफलता से डरे हुए थे, उन्हें शर्म आ रही थी कि अगर वे असफल हो गये तो वे सुग्रीव का या मेरा सामना कैसे करेंगे|’

* * * * * * * * * * * * * * * * * *

मेघनाद ने अपने रथ पर हाथ-पैर बांध कर खड़ी की गई स्त्री को दिखाते हुए गरज कर कहा,” राम यही वह स्त्री है न जिसके लिए तुम युद्ध कर रहे हो| आज मैं तुम्हारे सामने इसका अंत कर देता हूँ”|

ऐसी घोषणा करके मेघनाद ने अपनी तलवार स्त्री के सीने में घोंप दी और दूसरे वार में स्त्री का सिर धड़ से अलग कर दिया| इस वीभात्स्कारी कृत्य ने सभी को स्तब्ध कर दिया| हनुमान ने कूदकर स्त्री के मृत शरीर को हथियाना चाहा पर मेघनाद हनुमान की उम्मीद से ज्यादा तेज गति से अपने रथ को युद्धभूमि से दूर ले गया|

दुखी हनुमान और कुछ अन्य सैनिक रोते हुए राम के पास पहुंचे| कुछ पल के लिए राम भ्रमित हो गये और फिर धीरे से धरा पर बैठ गये|

‘क्या तुम्हे विश्वास है वह सीता ही थी?’ राम ने मंद स्वर में पूछा|

स्तब्ध हनुमान के कंठ से स्वर न निकला पर उसने सिर हिलाकर अनुमोदन किया|

राम को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ|

विभीषण भाग कर आया और कहा,” राम, यह सब माया का खेल है, इसके जाल में मत फंसना| युद्ध के बीच में हारते हुए दुश्मन पर क्यों भरोसा किया जाए? राम, रावण और उसका पुत्र दोनों मायाजाल के स्वामी हैं| हनुमान भी घटना का अनुमोदन करें तो भी मैं विश्वास नहीं कर सकता कि सीता को ऐसे मारा जा सकता है| राम, भावनाओं को अलग रख कर सोचो, रावण सीता को क्यों मारेगा?”

लक्ष्मण को विभीषण की बात पर भरोसा नहीं हुआ,” विभीषण, वह क्यों ऐसा नहीं करेगा? रावण पहले ही अपनी आधी से ज्यादा सेना, अपने भाई और बहुत सारे करीबी रिश्तेदारों की आहुति इस युद्ध में दे चुका है| यह बदला है| यदि वह हार भी गया तो वह हमें सीता को वापिस क्यों करेगा?”

लक्ष्मण, मैं रावण को आपसे ज्यादा जानता हूँ| रावण एक अहंकारी राजा है और उसके अहं को जो पोषित करे उसे वही काम और रास्ते भाते हैं| सीता को मारने का विकल्प उसके लिए कभी मायने नहीं रख सकता, क्योंकि ऐसा करने से उसके दिमाग में उसके अपने बारे में सर्वश्रेष्ठ योद्धा, सर्वश्रेष्ठ राजा, और धरती पर जन्में सर्वश्रेष्ठ पुरुष की छवि खंडित हो जायेगी| राम, ऐसा आदमी मेघनाद को सीता को युद्धस्थली पर लेकर आने की अनुमति क्यों देगा? और मेघनाद रावण से जुड़े किसी भी मामले में अपनी तरफ से कोई भी निर्णय नहीं लेगा|

* * * * * * * * * * * * *

(मूल अंग्रेजी से अनुवादित)

जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time

RamStory2

 

मानव जाति का इतिहास गवाह है कि अच्छाई और बुराई एक साथ नहीं रह सकते, स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद एक साथ नहीं रह सकते, अच्छी और बुराइयों से ग्रस्त सभ्यताओं में टकराव अवश्यंभावी है, इसे कोई कभी नहीं टाल सका और कभी कोई टाल भी नहीं सकेगा| हमेशा ही अच्छाई और बुराई आपस में टकराये हैं| बुराई कुछ समय के लिए जगत पर छा गयी प्रतीत होती है पर उसे हराने के लिए अच्छाई पनप ही जाती है| साधारण मनुष्य अच्छाइयों और बुराइयों का मिश्रण है और जीवन भर उसके अपने अंदर इन् दो प्रवृत्तियों के टकराव चलते ही रहते हैं| ऐसे महापुरुष भी हर काल में होते आए हैं जिन्होने बहुत कम आयु में ही अपने अंदर अच्छाई को बढ़ावा दिया और जो अपने अंदर की बुराई को पराजित करते रहे|

इन् महामानवों में भी सर्वश्रेष्ठ किस्म के मनुष्य हुए जिन्होने अपने अंदर की बुराई पर ही विजय प्राप्त नहीं की वरन जगत भर के मनुष्यों को अच्छाई की राह दिखाने के लिए बाहरी जगत में बेहद शक्तिशाली बुरी शक्तियों से टक्कर ली, नाना प्रकार के कष्ट सहे पर वे मनुष्यों के सामने अच्छाई को स्थापित करके ही माने| इन् सर्वश्रेष्ठ महामानवों में कुछ को ईश्वर का अवतार भी मनुष्य जाति ने माना| इनमें से जिन महामानवों ने ध्येय की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता पर विशेष जोर दिया उनमें राम का नाम बहुत महत्व रखता है| इसी नाते उन्हें मर्यादा पुरुषोतम राम कह कर भी पुकारा जाता है|

सदियों से हर काल में राम-कथा मनुष्य को आकर्षित करती रही है और भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रचनाकारों ने रामकथा को अपने नजरिये से जांचा परखा और प्रस्तुत किया है| राम को ईश्वर मान लो और रामकथा को सार रूप में ग्रहण कर लो तो बात आसान हो जाती है कि राम तो ईश्वर के अवतार थे, सब कुछ स्क्रिप्टेड था और तब राम के जीवन से एक दूरी बन जाती है क्योंकि जन्म के क्षण से ही वे अन्य मनुष्यों से अलग समझ लिए जाते हैं और केवल भक्ति भाव से ही मनुष्य उनके जीवन के बारे में जानते हैं पर इन सबमें राम की वास्तविक संघर्ष यात्रा अनछुई और अनजानी ही रह जाती है|

पर वास्तविकता तो यह नहीं है, मनुष्य रूप में जन्मे राम को जीवनपर्यंत विकट संघर्षों और कष्टों से गुजरना पड़ा| किसी भी काल में सत्ता निर्ममता, क्रूरता और तमाम तरह के हथकंडों के बलबूते चलाई जाती रही है और जहां सत्ता के दावेदार एक से ज्यादा हों वहाँ हमेशा षड्यंत्र होते ही रहते हैं| राम के पिता दशरथ ने अपने जीवन को और अपने राज्य को जटिल समस्याओं में उसी वक्त बांध दिया था जब उन्होंने तीन विवाह किये और तीसरा विवाह अपने से बेहद कम उम्र की कैकेयी के साथ किया| इन् परिस्थितियों में अयोध्या का राजमहल षड्यंत्रों से परे रहा होगा यह मानना नासमझी का सबब ही बन सकता है|

राम कोई एक दिन में नहीं बन जाता, बचपन से उनका जीवन तमाम तरह के संघर्षों से गुजरकर निखरता रहा| अपनी खूबियों को निखारते हुए वे कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके ऐसे बने जिस रूप में कि दुनिया उन्हें जानती है|

राम के जीवन पर आधारित हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित नया उपन्यास “Ram The Soul Of Timeरामकथा को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है और रामकथा के कई अनछुए पहलुओं को प्रकाश में लाता है| यह उपन्यास “राम” की सर्वकालिक प्रासंगिकता को स्थापित करता है| आधुनिक काल में अँधेरे की ओर तेजी से अग्रसर मानवता को राम जैसे एक प्रेरणादायक वैश्विक नेता के मार्गदर्शन की ही जरुरत है जो हर मुसीबत का सामना वीरता, संकल्प और बुद्धिमानी के साथ करे और जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता से समझौते न करे और आदर्श के सच्चे और पवित्र रूप को स्थापित करे|

उपन्यास में “रामकथा” बड़े ही रोमांचक माहौल में जन्मती है| कुछ अरसा पहले उत्तराखंड में मनुष्य की लोलुपता ने प्रकृति को इतना परेशान किया कि ऊपर पहाड़ों पर चहुँ ओर विनाश बरपने लगा| विनाश के तांडव में घिरे हुए एक अकेले पड़ चुके मनुष्य का, जिसे नहीं पता कि वह जीवित रहेगा या नहीं और अगर जीवित रहा भी तो कितने दिन, विज़न है यह रामकथा| मृत्यु के सामने खड़े इस मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज है यह रामकथा|

भ्रष्ट और उपभोक्तावादी राक्षसी सभ्यता को दुनिया भर की सिरमौर सभ्यता बनाने का संकल्प रखने वाले राक्षसराज रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण किया इसलिए राम ने रावण के साथ युद्ध किया, ऐसी धारणा बहुत से लोग रखते हैं| यह उपन्यास इस धारणा को पूरी तरह से नकारता है और स्थापित करता है कि अच्छाई की तलाश कर रहे राम का संघर्ष बुराई को जगत में स्थापित करते जा रहे रावण से होना ही था, चाहे वह किसी भी तरीके से होता| वनवास के तेरह सालों में “राम” एक एक कदम बुराई के खिलाफ उठा आगे बढ़ रहे थे| रावण का साम्राज्यवाद पनप ही नहीं सकता था राम के रहते| रावण को राम को अपने रास्ते से हटाना ही था अगर उसे पूरी दुनिया पर अपना राज कायम करना था|

उपन्यास दर्शाता है कि ऋषि विश्वामित्र पृथ्वी पर अच्छाई और, और अच्छी, मानवीय और विकास वाली सभ्यता की स्थापना करने के अपने यज्ञ में कर्म की आहुति डालने के लिए पृथ्वी पर सर्वथा योग्य राम का चयन करते हैं और उनका सपना राम की प्राकृतिक प्रवृति से मिलकर राम के लिए एक ध्येय बन जाता है|

राम के जीवन पर सीता की अग्नि परीक्षा, गर्भवती सीता को वनवास और एक शम्बूक नामक शूद्र को वेद सुनने पर दण्डित करने के आरोप लगाए जाते हैं|

यह उपन्यास सीता की अग्नि परीक्षा को बिल्कुल नये तरीके से संभालता है और जो ज्यादा वाजिब लगता है और यह भाग किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि भी कहा जा सकता है| यह उपन्यास राम दवारा विभीषण को लंका का राजा बनाने के साथ समाप्त हो जाता है|

आशा है लेखक अपने अंदाज वाली “रामकथा” का दूसरा भाग लिखेंगे और उसमें सीता को वनवास और शम्बूक प्रकरण की व्याख्या अपने अनुसार करेंगे|

रामकथा” में इच्छुक लोगों को यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए|

Novel – Ram The Soul Of Time

Author – Yugal Joshi

Pages – 479

Publisher – Har Anand Publications Pvt. Ltd (Delhi)

info@haranandbooks.com, haranand@rediffmail.com

जनवरी 5, 2014

अरविन्द केजरीवाल : पुराना सड़ा तंत्र सलीब लिए खड़ा है तुम्हारे लिए

सैयादे बागबां के तेवर बता रहे हैंarvind-001

ये लोग फस्लेगुल के कपड़े उतार लेंगे|

तुम सरीखे नई बात बोलने और करने वालों पर भी उपरोक्त शेर मौजूं बैठता है|

ये घाघ बहेलिये, खेले खाए चिडीमार तुम्हे आजाद पंछी की तरह कैसे उड़ने दे सकते हैं? ये तुम्हे कहीं न कहीं कैसे भी पकड़ने और अपने हाथों सजा देने का प्रयास करते रहेंगे|

गलती तुम्हारी है तुम क्यों शिकारियों और सोते हुए शिकारों के मध्य लालटेन लेकर खड़े हो गये और हुंकार भरने लगे कि शिकारों को जगाऊँगा… शिकारियों को भगाऊँगा|

अब भुगतो!

आराम से जनतंत्र में लूट का मजा ले रहे बलियों,  महाबलियों और बाहुबलियों को ललकारोगे तो क्या वे चुप बैठे रहेंगे? नहीं वे अपने सामर्थ्य भर आक्रमण तुम पर करेंगे| और ये बात तो तय है ही कि टुच्चई पर ऐसी ताकतों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है बल्कि टुच्चापन ऐसे ही लोगों के कारण धरा पर जीवित है|

एक तो बहुत बड़ी गलती तुमने दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान कर दी जब तुमने जाति,सम्प्रदाय और क्षेत्रवाद की गंदगी से लबलबाती राजनीति में मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू प्रत्याशी चुनाव में उतार दिए, एक क्षेत्र के बहुमत से घिरे इलाकों में दूसरे क्षेत्र के प्रत्याशी खड़े कर दिए और उनमें से बहुत से जीत भी गये और जो हारे भी वे भी अधिक से अधिक दो हजार मतों से हारे| इन् तत्वों वाली ध्रुवीकरण से बजबजाती राजनीति करके जनतंत्र पर कब्जा करे बैठे लोगों की नींद उड़ाने का गुनाह तुमने किया ही अब सजा भुगतो|

अभी तुम देखते जाओ अभी तो ट्रेलर भी पूरा नहीं हुआ है| पूरी फिल्म तो शुरू होनी बाकी है|

तुम पर हर ओर से आक्रमण किया जाएगा| तुम्हे हर संभव तरीके से बदनाम किया जाएगा|

शपथ लेते समय तुमने ऊनी स्वेटर और मफलर क्यों पहना था जबकि आम आदमी को ऊनी कपड़े मयस्सर नहीं होते|

तुम फलां फलां रंग के कपड़े क्यों पहनते हो?

तुम ऐसा क्यों खाते हो वैसा क्यों गाते हो| गाना न आने के बावजूद तुमने हिम्मत कैसे की कवि प्रदीप के लिखे गीत को हजारों लोगों की भीड़ के सामने की| तुम अभी तक अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों के साथ ४ कमरों के फ़्लैट में रहते रहे हो तो तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी आई.ऐ.एस अधिकारियों को मिलने वाले ५ कमरों के फ़्लैट में रहने जाने की मंजूरी देने की? इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा सचिव वहीं किसी ऐसे ही मकान में रहता होगा|

सुनो, तुम्हे तो ट्री-हॉउस में रहना चाहिए था जहां आराम से गुलेल या हाथों से ये शिकारी लोग पत्थर मारते रहते|

कैसी कैसी गलतियां तुम करते हो? तुमसे बौखलाए ये लोग तुम पर आक्रमण करेंगे ही| इंडिया शाइनिंग जैसे मनलुभावन नारों के बावजूद पिछले दस सालों से विपक्ष में बैठी भाजपा को पूरा यकीन था कि इस बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे और भाजपा को पूर्ण बहुमत अपने बल पर मिल जाएगा और तुमने बीच में घुसकर संदेह उत्पन्न कर दिया और उनके हवाई मिशन, जिसे प्रोपेगंडा के बल पर वे विस्तार देते जा रहे थे, की हवा निकलने लगी| तुम्हारी वजह से भाजपा ४ सीट पीछे रह गयी दिल्ली में बहुमत से और पन्द्रह साल से विपक्षी बने रहने की अपनी नियति को इस बार भी न बदल पाई| उसे तो तुम पर आक्रमण करने ही हैं|

जनता का एक बहुत बड़ा तबका निराशावादिता नामक बीमारी से इस कदर ग्रस्त हो चुका है कि उसे अपने से अच्छा कोई भी आदमी अच्छा ही नहीं लगता| निराशा ने इन लोगों को परपीड़ा में आनंद लेने वाला बना दिया है| ऐसे लोगों की भीड़ कभी नहीं चाहेगी कि भारत के हालात सुधरें और लोगों का जीवन स्तर सुधरे, देश में चारों ओर ईमानदारी का वास हो क्योंकि अगर सब कुछ अच्छा होने लगा तो वे निंदा किसकी करेंगे और अपने जीवन में कठिनाइयों से उत्पन्न पीड़ा का आनंद कैसे उठाएंगे? वे तो बस इन्तजार कर रहे हैं कि तुम थको, हारो, और तुम पर कालिख पोत दी जाए जिससे घायल होकर जब तुम धरती पर पड़े हो तो वे दूर से तुम पर पत्थर, गालियाँ, और व्यर्थ चीजें फेंककर अपने मनपसंद संवाद बोल सकें और तुम पर लानत भेज सकें और कह सकें – धिक्कार है तुम पर, बहुत महारथी बनने चले थे अब देखो क्या हाल हो गया है तुम्हारा|

तुम्हे हारा देख कर ये सेडिस्ट आनंद में ठहाका लगा कर हंस सकेंगे और अगले ही दिन से देश, व्यक्ति निंदा के अपने मनपसंद दैनिक कार्य में लग जायेंगे और राग अलापने लगेंगे – इस देश का कुछ नहीं हो सकता यह तो ऐसे ही चलेगा, यहाँ कभी कुछ नहीं सुधर सकता, यहाँ तो भ्रष्टाचार और गरीबी हमेशा रही है और रहेगी|

ऐसी ऐसी संस्थाएं और उनके सदस्य तुम पर आक्रमण करेंगे और तुम्हे हारा देख खुश होंगे जो अपने को औरों से ज्यादा बड़ा देशभक्त घोषित करते नहीं अघाते| उनके लिए देशभक्ति के काम वही हैं जो वे करते हैं| जो वे सोच सकते हैं बस वही देश के लिए श्रेयस्कर है| उनके अलावा बाकी सब लोग देशद्रोही हैं|

उनके लिए तुम भी देशद्रोहियों की जमात में ही आते हो|

ये सब प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाले और भूमिगत रूप से ही भारत पर नियंत्रण करने वाले लोग तुम्हे हारा हुआ देखना चाहते हैं|

ये तुम्हे सूली चढ़ा कर ही शान्ति पाएंगे|

इनके आक्रमण रोज तीव्र से तीव्रतर होते जायेंगे|

पर एक बात समझ लो, देश भर में जनता का एक तबका ऐसा भी है जिसे तुम पर पूरा विश्वास है| वे चाहते हैं तुम जीतो और इस देश में सुधार लाने के लिए निमित्त बनो| वे अपने सामर्थ्य भर तुम्हारे और तुम्हारे प्रयासों के साथ हैं| वे प्रयास रत हैं क्रान्ति के इस बीज को सम्पूर्ण देश में व्यापक स्तर पर फैलाने के लिए|

कभी इस क्रान्ति की सफलता पर संदेह मत करना| तुम फ़िक्र मत करना योद्धा…

हर वक्त है इम्तहां का

ये दस्तूर है जहां का

जून 7, 2010

शिशु जन्म : ममता नहीं सुरक्षित केवल स्त्री के लिये

शिशु को जन्म देने का विशेष अहसास ही ऐसा प्रतीत होता है जो मानव और पशु दोनों वर्गों की स्त्री प्रजाति में एक जैसा है। एकदम शांत किस्म के जानवरों की मादाओं को भी अपने नवजात शिशु की रक्षा के लिये आक्रामक रुख अपनाते हुये देखा गया है।

नीचे दिये गये वीडियो में देखा जा सकता है कि धरती की सतह पर चलने वाले सबसे बड़े चौपाये जीव समूह की मादा हाथी कैसे अपने अभी अभी जन्मे शिशु हाथी के निश्चल पड़े शिशु की काया को देख वह बैचेन हो उठी है और अपने शिशु को साँस लेने के लिये प्ररित करने के लिये किये प्रयासरत हो जाती है। बिना देखे हुये भी अपने विशाल शरीर को मादा हाथी इस तरह से हिला डुला रही है जिससे शिशु के ऊपर उसका पैर न पड़ जाये। उसकी सहायता के लिये कोई डाक्टर या नर्स या दाई नहीं है। सब कुछ उसे अपने आप ही करना है। उसे जीवन की पहली साँस लिवाने के बाद वह इस बात के लिये प्रयासरत है कि अब उसका शिशु अपने मुँह से कुछ आवाज निकाले और सब कुछ सामान्य करने के बाद वह शिशु को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिये प्रेरित करने में लग जाती है और तभी चैन की साँस लेती है जब शिशु के साथ सब कुछ सामान्य हो जाता है। उसके प्रयास संवेदनशील ह्र्दय वाले व्यक्तियों की आँखों में आँसू ला सकते हैं।

वाह! प्रकृति कितनी खूबी और खूबसूरती से सब जीवों को संभालती है।

सावधानी की नैतिक सलाह : अगर किसी को शिशु के जन्म लेने की प्रक्रिया देखने में अजीब महसूस होता है तो वे कृपया इस वीडियो को न देखें हाँलाकि यह भी सच है कि न देखने वाले एक विलक्षण दृष्य को देखने से वंचित रह सकते हैं।

%d bloggers like this: