Posts tagged ‘bachpan’

जनवरी 6, 2014

यक्ष प्रश्न

यक्ष प्रश्न हैwomanleavingman-001

क्या पागलपन है?

क्यूँ पागलपन है?

यक्ष प्रश्न है…

उत्तर क्या दें?

उत्तर कैसे दें?

उत्तर किसे दें?

अब न तो शब्द बचे हैं

न जुबां रही है

किस भाषा को वो समझेगा?

अब जुबां क्या बदलेगी हमारी?

न उसका दिल बदलेगा…

प्रश्न बहुत हैं …

उत्तर कम हैं

कम क्या ?

कुछ के उत्तर ग़ुम हैं

जाओ दिल पे बोझ न लादो

अपने मन को मत अपराधो

आज से बस तुम इतना जानो

दोष तुम्हारा तनिक नहीं है

अपना दिल तो है ही पागल

उम्र के साथ नहीं चल पाया

अब तक बचपन में जीता है

टूटे चूड़ी के टुकड़ों को

सिरे गला कर फिर सीता है

दुनियादारी नहीं समझता…

तुमसे आगे नहीं देखता

तुम न होती तब भी इसका

हर हाल में होना ये था

पागल था…पागल है

पागल होना था…

सयानों के साए में इसका

दम घुटता है…

Rajnish sign

सितम्बर 27, 2011

दूर और कुछ जाना है

साथ तुम्हारे ही चलकर के दूर और कुछ जाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी पथ मेरा अंजाना है
चिर परिचित से मुझे लगे हो
शायद जन्मों साथ रहे हो
या फिर कोई और बात है
सुख-दुख जो तुम साथ सहे हो
मुझको तो ऐसा लगता है मन जाना-पहचाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
मिलना और झगड़ना मिलकर
यह तो अपनी आम बात है
जीत मिली है हरदम तुमको
मुझको तो बस मिली मात है
सारी उम्र मुझे तो शायद हरदम तुम्हे मनाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
जब-जब भी मिल जाते हो तुम
मन पर चाँद उतर आता है
दूर तुम्हारे होते ही पर
सुख जैसे सब छिन जाता है
बहुत रोकता हूँ मैं आँसू पर वह तो बाहर आना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
अपने पीछे था कल बचपन
आज द्वार पर आया यौवन
कल तक कोई रोक नहीं थी
आज लग गये मन पर बंधन
इनसे डरकर मेरे मन अब और नहीं घबराना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
प्रेम हमारा दीया-बाती
या फिर है चातक-स्वाति
निस दिन इसको बढ़ना ही है
जैसे नदिया चलती जाती
हमको भी तो मंजिल अपनी आज नहीं कल पाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी…

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 24, 2011

माँ के ये लाल

बचपन में
माँ का दुलार छला

जवानी में
छाती पर मूंग दली

चिता का सामान बनी
जो होनी चाहिए थी
बुढापे की लकड़ी।

(रफत आलम)

जुलाई 15, 2011

संस्कार

हमेशा
हर बार की तरह
आज भी मैं
अपनी माटी और माँ
की शरण में
अपने गांव और घर पहुंचा हूँ
पुनः अपने भीतर
वही जान फूंकने
जिसे मैंने अपनी माटी
और
माँ के सहारे
अपने संघर्षमयी जीवनपथ पर
चलते हुए
अटूट साहस और धैर्य से
अर्जित करके
जीवन के कठिनतम क्षणों को भी
बड़े धैर्य और शालीनता से
जिया है
पहाड़ों की कोख में बसी
माँ का शरीर
उम्रदराज हुआ तो क्या
हिमालय सा मजबूत
इरादे वाला उसका दिलों-दिमाग
अभी भी डगमगाया नहीं
थका नहीं
पहले की तरह
मुझमे अभी भी
माँ का वही अदब है
इस बार भी थोड़ा
बतियाने के बाद
माँ कह रही है
शाम को खेतों का चक्कर काट आना
फसल देख लेना
कैसी उगी है|

मुझे याद है
बचपन में जब माँ
हम सब बच्चों को
स्कूल की छुटी के बाद
खेत में मक्की काटने
और
आलू खोदने ले जाया करती थी
और जब स्कूल छूटा तो
दोपहर में आराम के बाद
यह अदब कि
माँ अभी आवाज़ देगी
तीन बज गए
क्या सोकर जीवन कट जाएगा
अब उठ जा
खेत जाना होगा

माँ के ये शब्द
हमेशा मुझे
आलस्य की नींद से
जगाते रहें हैं
अपनी माटी और माँ के
एक अटूट संस्कार को
जीने के लिए
सोचता हूँ
गर में अपनी माटी और माँ के
इस संस्कार को न जीता
तो शायद मैं
एक संस्कार रहित
अधूरा व्यक्ति होता
जिसे यह मालूम न होता कि
माटी के अन्न
और माँ के संस्कार का
संघर्षमयी जीवन में
एक व्यक्ति को
सार्थक व्यक्ति बनाने में
कितना अर्थपूर्ण
और
अद्वितीय
योगदान होता है !

(अश्विनी रमेश)

अप्रैल 13, 2011

मुफलिस बचपन

रसोई में बरतनों की धोवन की तरह
जिंदगी गुजरी अपनी जूठन की तरह

चंद सिक्के मोल है गरीब की आबरू
चकलाघर के मजबूर बदन की तरह

रोटी सूदखोर के घर में कैद थी और
भूख भटकती फिरी बेरागन की तरह

बदलते कपडों जैसे रिश्तों के दौर में
दिल मिलते कब हैं धडकन की तरह

ज़ब्त ने रखी है गम की लाज वरना
आंसू बरसने को थे सावन की तरह

मुस्कान सजी हुई है मुर्दा चेहरों पर
चंदा उगाही से मिले कफ़न की तरह

जिंदा मर गयीं मासूम उमंगें आलम
मुफलिस बालक के बचपन की तरह

(रफत आलम)

मई 3, 2010

नेह भरा काजल

बचपन,
कभी लगता है कि बस अभी ही तो बीता था,
और आज भी इतना पास है कि हाथ बढ़ाया और छू लिया,
और कभी लगता है कि किसी और ही जन्म में
बचपन भी जीवन में आया था।

पर जब जब बचपन
इसी जन्म की बात लगता है,
तब यह आकर बिल्कुल पास में बैठा रहता है,
आज फिर से यह सखा बन कर तन-मन को स्पर्श करे बैठा है|

कौंच कौंच कर याद दिला रहा है,

माँ अक्सर उस दिए से कालिख लेकर,
जो वह पूजा के लिए देसी घी से जलाया करती थी,
मेरी आँखों में काजल लगाया करती थी,
कहा करती थी,
काजल लगाने से
आखें बड़ी होंगी,
नजर कमजोर नहीं होगी,
और
जमाने की बुरी निगाहों से बचायेगा काला काजल|

इतने बरस बीत गए,
बचपन पीछे छूट गया,
पहले अपने घर से दूर आना पड़ा,
फ़िर अपने शहर से दूर आना पड़ा,
शिक्षा लेने की जरुरत जो न करवा दे,
फ़िर एक दिन अपने देश से भी दूर आना पड़ गया|

माँ आज बहुत याद आ रही है,
आज माँ का काजल लगाना भी याद आ रहा है,
आज बचपन बहुत याद आ रहा है,
साथ याद आ रही है एक एक बात,
जो बीते ज़माने की है,
पर लगती बिल्कुल अभी की हैं|

एक स्नेह भरे काजल की याद,
जाने कहाँ कहाँ ले जाती है,
एक ममता भरा स्पर्श,
जो यूँ तो हमेशा साथ रहता है,
पर केवल एक अहसास की तरह,
और उसके भौतिक साथ की
जरुरत अक्सर महसूस होती है,
आज इतने बरसों बाद
आसुओं ने बहा दिया जिसे,
जाने वह माँ का लगाया काजल था
या उसके स्नेह भरे सुरक्षा कवच का अहसास|

…[राकेश]

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