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अप्रैल 12, 2013

दिल का हाल सुनाओ तो सही

सूरज डूबेगा तो रात भी हो जायेगी ,

बाजी लगेगी तो मात भी हो जायेगी ,

धीरज खाना महज भूल है बड़ी

प्यार होगा तो मुलाक़ात भी हो जायेगी|

मुझे ज़िंदगी का फटा कफ़न सी लेने दो,

न बहलाओ उन्ही की आस पे जी लेने दो,

पीऊँगा न कल एक भी घूँट तुम्हारी ही कसम,

मगर आज तो जी भर के पी लेने दो|

आकर पास ज़रा, आँख मिलाओ तो सही,

दिल की बात को ओठों पे लाओं तो सही,

मालूम नहीं है पर मेरे दिल का हाल,

न हो, अपने दिल का हाल सुनाओ तो सही|

– ‘जगत्प्रसाद ‘सारस्वत

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फ़रवरी 17, 2013

सारा सावन पिघल न जाए

वही कहानी मत दुहराओ

मेरा मन हो विकल न जाए

भावुकता की बात और है

प्रीत निभाना बहुत कठिन है

यौवन का उन्माद और है

जनम बिताना बहुत कठिन है

आँचल फिर तुम मत लहराओ

पागल मन है मचल न जाए

दर्पण जैसा था मन मेरा

जिसमें तुमने रूप संवारा

तुम्हे जिताने की खातिर में

जीती बाजी हरदम हारा

मेघ नयन में मत लहराओ

सारा सावन पिघल न जाए

तोड़ा तुमने ऐसे मन को

पुरवा जैसे तोड़े तन को

सोचो मौसम का क्या होगा

बादल यदि छोड़े सावन को

मन चंचल है मत ठहराओ

अमरित ही हो गरल न जाए

कदम कदम पर वंदन करके

यदि में तुमको जीत न पाया

कमी रही होगी कुछ मुझमे

जो तुमने संगीत न पाया

तान मगर अब मत गहराओ

जीवन हो फिर तरल न जाए

{कृष्ण बिहारी}

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