Posts tagged ‘Baat’

सितम्बर 1, 2016

कील कहाँ से निकल कर चुभ जाती है? (रघुवीर सहाय)

Raghuvir Sahayयह क्या है जो इस जूते में गड़ता है
यह कील कहाँ से रोज़ निकल आती है
इस दु:ख को रोज़ समझना क्यों पड़ता है?

हम सहते हैं इसलिए कि हम सच्चे हैं
हम जो करते हैं वह ले जाते हैं वे
वे झूठे हैं लेकिन सबसे अच्छे हैं

पर नहीं, हमें भी राह दीख पड़ती है
चलने की पीड़ा कम होती जाती है
जैसे-जैसे वह कील और गड़ती है

हमको तो अपने हक सब मिलने चाहिए
हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन
कम से कम वाली बात न हमसे कहिए
(रघुवीर सहाय)

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जनवरी 24, 2014

आज भी हम बिलकुल वैसे हैं…

कभी कभी बातों के राही

मुड़ जाते हैं

यादों की पगडण्डी पर क्यूँ?

कुछ यादें जो बंद करीं थी

तहखानो में

बहुत दबा कर

सारे चिन्ह मिटा डाले थे

वक़्त की जिन पर धूल जमाई

सोच लिया था

खो जाएँगी

आज मिलीं तो पता हुआ

कि

आज भी वो बिलकुल वैसी हैं

आज भी हम बिलकुल वैसे हैं…

Rajnish sign

नवम्बर 16, 2013

हर प्रीत नूतन है!

पांच बरस लंबी सड़क पर AB-001

पता नहीं सोता सा चला था शायद !

कि,

हर नया दिन,

पुराने का हिस्सा नहीं लगता|

लगता है, सड़क भी बनी है,

टुकड़ों-टुकड़ों में!

कल की याद ही नहीं कुछ-

बस अहसास भर होता है कि

कुछ गुजरा भर था|

मुझे कुछ याद नहीं है-

न परिणय

न चुम्बन

न कलह

जब तुमसे मिलता हूँ,

लगता है फिर कोंपलें फूट आई हैं

फिर नया सवेरा है

और हर बात,

हर प्रीत नूतन है|

Yugalsign1

नवम्बर 15, 2013

एक चाय तो पिलाती जा यार

एक प्रहर बादwomanhill1-001

उठकर चल देती है वह

नीचे जाती पगडंडी पर

उसे जाता देख

मैं सोचता हूँ हैरान

जिंदगी से तंग आए

जीवों की जमात है यह

न है कोई गीत

न है कोई राग

न है कोई बात

पर,

तभी बीवी पलटी है

उसकी आँखों की चमक

जंगल को रौशन कर गई

प्लम वाले ने बस पूछा भर है –

“एक चाय अपने हाथों से पिला जा ना यार!”

Yugalsign1

अप्रैल 8, 2013

मिटाने वाले …गजल (हंसराज ‘रहबर’)

ज़ख्म हंस हंस के उठाने वाले
फन है जीने का सिखाने वाले
आज जब हिचकी अचानक आई
आ गये याद भुलाने वाले

बात को तूल दिए जाते हैं
झूठ का जाल बिछाने वाले
रहनुमा जितने मिले जो भी मिले
हाथ पर सरसों उगाने वाले

लो चले नींद की गोली देकर
वो जो आये थे जगाने वाले
वे जो मासूम नज़र आते हैं
आग भुस में हैं लगाने वाले

सांच को आंच नहीं है ‘रहबर’
मिल गये हमको मिटाने वाले|

हंसराज ‘रहबर’

जुलाई 26, 2011

प्यार की बात

मत करो मुझसे इस समय
प्यार की बात,
बहुत मजबूरियाँ हैं,
पिता नहीं हैं
माँ बूढ़ी है
सबसे छोटी बहन फलाँगते हुये
चढ़ गयी है सीढ़ियाँ उम्र की
और छोटा भाई
डिग्रियों का बोझ लादे
बेकार है।

करनी है बहन की शादी
लगाना है भाई को
रास्ते पर
देखना है घर-परिवार,
ऐसे में
क्या करुँ मैं तुमसे
प्यार की बात
ज़िंदगी में बहुत कुछ है
प्यार से ऊपर,
जिन्हे जिम्मेदारियाँ कहते हैं!

मैं भी चाहता हूँ
कुंतला,
येलोकेशी,
जिसके अंग सुते हुये हों साँचें में
एक गौरांगी प्रिया
जो लम्बी हो,
स्लिम हो
गहरी नाभी और सपाट पेट वाली हो
जिसकी कमर मेरी बाहोँ के घेरे में आने से शरमाए
जो मुझे चाहे मेरी तरह।
हर भारतीय नौजवान की तरह
मुझे भी लुभाती है हर यौवना।

मगर यह संभव नहीं है
हकीकतें ज़िंदगी से बड़ी हैं।
देश में
जिस वक्त्त हर मोर्चे पर
हो रहा हो अनवरत भ्रष्टाचार
और जहाँ घर में
बैठी हो जवान बहन
भाई बेकार
वहाँ मैं कर सकता हूँ
केवल
क्रांति
पर नहीं कर सकता प्यार
फिलहाल इस समय एक युवती से।

{कृष्ण बिहारी}

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