Posts tagged ‘Baarish’

जनवरी 4, 2014

शून्य…

दुनियावी झमेलों से शुरू होकरlifeman-001

कभी न खत्म होने वाली भूलभुलैया

के बीच,

रास्ते में एक विश्राम

अब यदि हो बारिश, तो होवे

अब यदि आएं झंझावात, तो आवें!

मेरा बहुत पुराना स्व:

इस अस्तित्वहीन प्रकृति में

जहां,

मृत्यु के बाद न है जाना कहीं

न है कुछ भी !

Yugalsign1

[Zen Ikkyu की एक कविता का अनुवाद …]

जुलाई 29, 2011

गुलाबी दुपट्टा

ऐसी ही भीगी रातों में
कांपते थे हाथ, दिल और दिमाग
जब परत दर परत
जिस्मों के तलिस्म खुलते थे।

अधखुली पलकों में
ठहर जाती थी रात
होठों के जाग उठे उभारों पर
सियाह बदलियाँ अमृत बरसा जाती थी।

चाहत की मदिरा पीकर
मदहोश हो जाता था अहसास
विस्मरति के भवँर में डुबाते
आत्मबोध के वे लम्हे
शरीर के बंधनों से परे
आत्माओं का मिलन करा जाते थे
जहाँ अंतर मिट जाता है
मैं और तू के बीच
वही पल तो थे अपनी पहचान के।

आज भी खुल कर बरस रही है घटा
खिड़की के गीले शीशों से परे
धुंधला गए है सब मंज़र
उसी तरह के जब
मैंने माटी के अंधे घर में छोड़ा था तुम्हे।

साथ गुज़ारे लाखो लम्हे
एक साथ जल रहे थे
सुन्न हो गये ज़हन के अलाव में
आखों के चश्मे में भाप थी मगर
उस रोज रो कब पाया था मैं।

सुहाग का जोड़ा पहने
दूर जाते,
बहुत दूर जाते देखता रहा था तुम्हे,
तब से एक गुलाबी दुपट्टा
मेरे ख्यालों में लहरा जाता है अक्सर
सुहाने मौसमों में रुला जाता है अक्सर।

(रफत आलम)

जुलाई 5, 2011

अहसास जो तुम्हे जीवंत रखता है

जीवन के
सर्द कठिन दिनों में
आसमान में
एक बादल का टुकड़ा
मन व्याकुल कर देता है
सूरज की गर्मी से
वंचित होने के अहसास से
तपती दोपहरी में
तपते हाँफते वदन को
यही वह बादल का टुकड़ा
मन
अलाह्दित ,हर्षित कर देता है
वर्षा की बौछार की
राहत देने वाली
आशा से
फिर वर्षा ऋतु में
यही बादल का टुकड़ा
भयभीत….
आतंकित कर देता है
जोर की वर्षा से
होने वाली
तबाही से
और यही बादल का टुकड़ा
हेमंत में फिर
शरद आने का
आभास दिलाकर
फिर व्याकुल कर देता है
सतरंगी खिली धूप के साथ
सुगन्धित खिलते फूलों की
मुस्कान से मदमाती खुशी
लेकर आते
बसंत की
आहट तक
बादल का यह टुकड़ा मन है
और
आत्मा सूरज है
सूरज के इर्द-गिर्द घूमते
बादल के टुकड़े
और
आत्मा के इर्द-गिर्द घूमते
मन का अहसास
एक जैसा ही है
जैसे बादल का टुकड़ा
अल्प काल के लिए
सूरज को छिपा तो सकता है
लेकिन उसके होने के
अहसास को
मिटा नहीं सकता
ठीक जिस तरह मन
अल्प काल के लिए
आत्मा को भ्रमित
तो कर सकता है
लेकिन उसके होने का
अहसास नहीं मिटा सकता
मौसम
ऋतु परिवर्तन
स्वाभाविक है
नियति है
इसीलिए तो
परिवर्तित होता है मन
व्याकुलता और हर्षता में
लेकिन हर स्थिति
परिवर्तन में
यही एक अहसास
तुम्हे जीवंत रखता है
और सुख देता है कि
बादल से मन के
टुकड़े के पीछे
सूरज सी आत्मा की रोशनी
सदैव महसूसती
और
अहसासती है!

(अश्विनी रमेश)

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