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अप्रैल 7, 2011

प्राण जाये मगर अब तो लड़ जायेंगे

ऊबी आँखों में टूटी हुयी नींद है
रंग अलग सा अलग सी है जीवन की लय
बेहिची, बेदिली, बेकली औसतन
सड़ते गलते हुये सूखे बदन
हँस लिये रो लिये
पी लिये लड़ लिये
ज़िंदा रहना था
करके रहे सौ जतन।

साँस लेना था खूँ को पसीना किया
हाथ शर हो गये, पाँव घिसते रहे
रोशनी के लिये, ज़िंदगी के लिये
रात दिन एक चक्की में पिसते रहे।

आग उगलती हुयी जलती बंजर जमीं
जनम से अब तक जल रहे हैं शरीर
नर्क क्या है कहाँ है कौन जाने है ये
नर्क जैसी जगह पर पल रहे हैं शरीर।

जीने मरने के चक्कर का अंजाम क्या
ये समय क्या, सवेरा क्या शाम क्या
रीत कैसी है ये, क्या तमाशा है ये
कैसा सिद्धांत, कैसा ये इंसाफ है
कितने दिल हैं कि जिनमें है चिंगारियाँ
देखने को सभी कुछ बहुत शांत है।

सिर छुपाने को छाया नहीं न सही
बस ही जायेगी बस्ती कोई फिर नयी
अपने हाथों में चक्की है बाकी अभी
ज़ुल्म के काले डेरे उखड़ जायेंगे
सह चुके हम बहुत अब न सह पायेंगे
न सह पायेंगे
प्राण जाये मगर अब तो लड़ जायेंगे।

काली रातों के पीछे सवेरा भी है
कोई सुंदर भविष्य तेरा मेरा भी है

(मदहोश बिलग्रामी)

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