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नवम्बर 26, 2013

कुछ देर पुकार…चला जाऊँगा

किसने क्या कहाsilsila-001

किसने क्या सुना

तुमने ये किया

मैंने वो नहीं किया

तुम ऐसी ही हो

तुम वैसे ही हो

तुम ये हो

तुम वो हो

आज भी ये सवाल सुलझाने में

बाकी सब सिरे उलझ जाते हैं

कुछ हो न हो हम में

प्यार तो शर्तिया नहीं रहा कभी

प्यार शायद कुछ और होता होगा

जो मैंने किया…

नहीं किया…

पता नहीं…

तुमने किया…

नहीं किया…

पता नहीं…

सब कुछ ऐसे ही होना था शायद

ऐसे नहीं होना था तो फिर कैसे होना था?

और अगर ऐसे नहीं होना था

तो फिर ऐसे हुआ ही क्यूँ?

इसलिए तुम परेशान न होना मेरे लिए कभी

खुद को इलज़ाम भी न देना कोई

मेरा क्या है?

मैं चंद आवाजें और दूंगा

फिर चला जाऊंगा…

तुम्हारी इसी गली में

जहाँ मेरा चाँद उगा करता था

ये तन्हाई की रात भी गुज़ारूंगा

और निकल जाऊँगा|

आवारा भटकते हुए आ निकला था

या

यहीं आना था

तुम ले आयीं हाथ पकड़

या

मैं आया खुद

मालूम नहीं|

कहते हैं नज़रें हसीं होती है…

मैं भी कुछ लाया था

क्या लाया था…

मालूम नहीं…

हां आज भी कुछ है मेरी आँखों में

कुछ है मगर कोई शिकवा

कोई  शिकायत तो नहीं

मैं आवारा बेहिस बादल की तरह

थोडा सा बरसूँगा…

चला जाऊंगा…

तुम परेशान न होना कभी मेरे लिए….

ज़िन्दगी के सफ़र में सौ मोड़ आयें चाहे

किसी भी मोड़ पे तुम को अहसास-ऐ-तन्हाई न मिले

हर मोड़ पे किसी का साथ रहे

आज के बाद से हर तन्हा रात मेरी

मैं किसी भी तरह गुज़रता चला जाऊंगा

तुम परेशान न होना कभी मेरे लिए

खुद को इलज़ाम भी न देना कोई

मेरा क्या है…

कुछ देर पुकारूँगा…

चला जाऊँगा…

Rajnish sign

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नवम्बर 9, 2013

तुम आयी थीं क्या?

stars-001यही कोरा सफ़ेद कागज़ है जहाँ

हर रोज़ मुझे अकेला छोड़ जाती है तू

तेरे जाने के बाद भी बहुत देर तलक

मैं अंधेरों में जुगनू तलाशा करता हूँ

कुछ अहसास तेरे  होने का

आ आ के टटोलता रहता हूँ…

गाल पे सूखे हुए आंसुओं के निशान की तरह

मेरी उँगलियों के निशान इस की शिनाख्त करते हैं

मैं हर रोज़ सोचता हूँ कि इस

सफ़ेद कोरे कागज़ पे

तेरी नीली हंसी टांक दूँ

तेरी आवाज़ पिरो दूँ इसमें

हर शाम तेरे आने तक फिर सुनूँ

तेरी मखमली आवाज़ इंतज़ार को कुछ

रंगीन कर दे शायद…

वरना इस अँधेरे में

जुगनू की चमक क्या रंग देगी…

कुछ छोड़ जाया कर इस मोड़ पे हर रोज़

कुछ गर्म साँसे उतार कर अपनी

कुछ अपनी महक…

कुछ उजाले अपनी आँखों के

मैं हर दफा कुछ बहाने से इधर आता हूँ

पूछ जाता हूँ कि तुम आयी तो नहीं…

तुम आयी थीं क्या?

(रजनीश)

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