Posts tagged ‘Aurat’

अप्रैल 20, 2013

दिल्ली है सांडों की, बलात्कारियों की!

ये दिल्ली है!
भारत देश की राजधानी|

यहाँ रहते हैं
प्रधानमंत्री से लेकर तमाम केन्द्रीय मंत्री,
तमाम बड़े बड़े नेता
यहाँ रहते हैं देश के प्रथम नागरिक|

कहा जाता रहा है –
– दिल्ली है दिल वालों की –
ज़रा सामने तो आओ और कहो कि –
दिल्ली है दिल वालों की?

नहीं हुजूर!
दिल्ली दिल वालों की नहीं हो सकती!
दिल्ली तो है अब सांडों की!
कामुक जानवरों की!
जो देश के कोने कोने
से यहाँ आकर,
अपने विकृत दिमाग को लाकर
नारी से बलात्कार करने में मशगूल हैं|

ये बलात्कारी सांड
अपने मनोविज्ञान में
किसी नारी से कोई भेद भाव नहीं करते
इनके लिए
स्त्री चाहे एक साल से छोटी शिशु हो
या साठ से ऊपर की वृद्धा
सब बलात्कार के योग्य हैं|

ये मानसिक रोगी
हरेक उम्र की,
हरेक रंग रूप की,
नारी को रौंदने का
बीडा उठाये
घूम रहे हैं
दिल्ली की गलियों में
दिल्ली के कूचों में
ये वही गलियाँ हैं
जिनमें से किन्ही में
ग़ालिब जैसी आत्माएं घूमा करती थीं
और आज कामुक सांड घुमा करते हैं|

ये जानवर घरों में,
बसों में,
कारों में
लगभग हरेक जगह
नारी को शिकार बनाते
घूम रहे हैं
और जिन्हें सडकों पर
नारी को सुरक्षा देने के लिए
घूमना चाहिए
वे वर्दी वाले
नारियों पर ही लात-घूसे-लाठी और गालियों
की बौछार कर रहे हैं|

हवा में हर तरफ
दहशत है
बच्चियों की चीख पुकार है
ये नेता, सत्ता और विपक्ष के,
ये हाकिम,
ये वर्दी वाले,
ये सोते कैसे हैं?
ये किस चक्की का पिसा
आटा खाते हैं
जो इन्हें नींद आ जाती है?

इनमें कुछ ऐसे भी हैं
जो ऐसे हर मामले के बाद
संवाद बोलने लगते हैं
कि वे पिता हैं
दो-दो, तीन-तीन बेटियों के
अतः वे स्त्री के दुख को समझते हैं भली भांति|

क़ानून उनके हाथ में है
नये क़ानून बनाना उनके हाथ में है
क़ानून का पालन करवाना उनकी जिम्मेदारी है
पर दिल्ली है कि
भरी पडी है बलात्कारियों से|

कुछ बलात्कारी नेता हैं
कुछ बलात्कारी नेताओं के बेटे, या नाते रिश्तेदार
कुछ बड़े अफसरों के बेटे
कुछ छोटे अफसरों के बेटे
कुछ बिना लाग लपेट के
सीधे सीधे गुंडे हैं
या गुंडों के बेटे हैं
ये सब बलात्कारी
बहुत शक्तिशाली हैं
इन्हें किसी भी हालत में बलात्कार करना ही करना है
क़ानून इनके नौकर की तरह काम करता है|

अगर इन सबके रहते
दिल्ली अब भी दिल वालों की है
तो नारी क्या करे?
दुनिया तो छोड़ नहीं सकती
तो क्या दिल्ली छोड़ दे?

 

मार्च 9, 2013

अद्भुत औरत

Maya Angelou की प्रसिद्द कविता Phenomenal Woman का हिन्दी अनुवाद

औरतें उत्सुक रहती हैं  

जानने को कि कहाँ छिपे हैं

मेरे चुम्बकीय व्यक्तित्व के रहस्य?

 

खूबसूरती की उनकी परिभाषा की समझ से

मैं किसी भी हिसाब से खूबसूरत नहीं हूँ

न ही मैं फैशन माडल्स जैसे आकार प्रकार वाली हूँ

लेकिन जब में उन्हें अपनी गोपनीयता बताना शुरू करती हूँ

तो वे सोचती हैं

मैं झूठ बोल रही हूँ |

 

मैं कहती हूँ

रहस्य मेरी बाहों के घेरे में है

मेरे नितंबों के फैलाव में है

लंबे-लंबे डग भरती मेरी चाल में है

मेरे होठों के घुमावों और कटावों में है|

  

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

मैं प्रवेश करती हूँ किसी कक्ष में

जैसी मैं हूँ

अपने सारे वजूद को साथ लिए

और पुरुष,

वे सब खड़े हो जाते हैं

या अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं

वे मेरे इर्द गिर्द

ऐसे एकत्रित हो जाते हैं

जैसे छत्ते के करीब मधुमक्खियाँ

मैं कहती हूँ

रहस्य छिपा है

मेरी आँखों में बसी आग में

मेरे दांतों की चमक में

मेरी कमर की लचक में

मेरे पैरों के जोश में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

पुरुष खुद अचरज करते हैं

कि वे क्या देखते हैं मुझमे

वे कोशिश तो बहुत करते हैं

पर कभी छू नहीं पाते

मेरे अंदुरनी रहस्य को

जब मैं उन्हें दिखाने की कोशिश करती हूँ

वे कहते हैं –

वे देख नहीं पा रहे अभी भी|

मैं कहती हूँ,

रहस्य तो छिपा है

मेरी रीढ़ की चाप में

मेरी मुस्कान के सूरज में

मेरे वक्षों के उठान में

मेरे मनोहरी सलीके में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

अब तुम्हे समझ में आ गया होगा

क्यों मेरा सिर झुका हुआ नहीं रहता है

मैं शोर नहीं मचाती,

कूद-फांद नहीं मचाती

अपने को जाहिर करने के लिए

मुझे प्रयास नहीं करने पड़ते

पर जब तुम मुझे देखो

पास से जाते हुए

तुम्हारे अंदर मुझे लेकर गर्व का भाव जगना चाहिए|

 

मैं कहती हूँ,

मेरे चुम्बक का रहस्य  

छिपा है –

मेरे जूते की हील की खट-खट में

मेरे बालों की घुंघराली लटों में

मेरे हाथों की हथेलियों में

मेरी देखरेख की जरुरत में,

‘क्योंकि’ मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत,

हाँ वह हूँ मैं |

[Maya Angelou]

जुलाई 18, 2011

दहशत

आजकल मै डरा हुआ हूँ
यह एक रचनाकार का डर है
शब्द ही नहीं मिलते मुझे कि
लिखूँ
विज्ञापन में नंगी देह दिखाती युवती की
विशेषतायें क्या हैं।
उसकी वाइटल स्टेटिस्टिक्स मुझे किस तरह
लुभाती है
कि मैं दो बच्चों का बाप,
और बच्चे भी बड़े हो गये हैं
किस तरह महसूसता हूँ ऐसे पलों को।

सुगंधित साबुन से नहाती युवती की
महकती देह
सुडौल गोल और चिकनी जाँघों को
सहलाना चाहता हूँ,
स्क्रीन पर ही सही
तो क्या यह पाप है?

मुझे औरत की छातियाँ और गोलाइयाँ
खींचती हैं अपनी ओर
उनके आधे-अधनंगे ब्लॉउजों में
जहाँतक झाँक सकता हूँ
डाल देता हूँ आँखें
दिखते सौन्दर्य को न देखना
उसका अपमान है।

सौन्दर्य भी तो वस्तु नहीं
आँखों में होता है
न देखूँ तो
आँखों का होना बेकार है।

मगर पूछना चाहता हूँ कि
इन ब्लॉउजों की डिजाइन
किसने की है?
जिसने की है
उसका मकसद क्या है?
और पहनने वालियाँ क्या
पाना चाहती हैं?

एक कॉम्प्लीमेंट कि
यू आर ब्यूटीफुल…
लुकिंग गॉर्जियस…
स्टनिंग…?
यकीन मानिये
बहुत सी महिलायें
इन्ही आधे-अधूरे वाक्यों से
हो जाती हैं
लहालोट।

फिर जो कुछ होता है
उसी को लिखना चाहता हूँ मैं
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते है
क्योंकि,
बाद की स्थितियों को
गंदगी उपजाने वाला यह लिथड़ा समाज
अश्लील कहता है।

घुटनों को मोड़कर
एड़ियों पर नितम्बों को टिकाए
बैठी जवान औरतों को
घूरने वाले
लपलपाती जीभ निकाले मर्दों को
जब देखता हूँ,
उन्ही में से मैं भी हूँ,
तो डर जाता हूँ
कि
एक दिन जब सारी गोलाइयाँ
लटककर झूल जायेंगी
हड्डियों से प्यार करता माँस
चिचुककर लटक जायेगा
तब वह कितनी खूबसूरत लगेगी
तब कितना खूबसूरत दिखूँगा मैं?

यह एक ऐसी दहशत है
जो जवान और सुंदर दिखती औरत को
मेरी नज़रों में एक पल में
अचानक बियावान और बदसूरत
बना देती है।

औरत, समाज और अपने बारे में
जो मैं कहना चाहता हूँ
लिखना चाहता हूँ
उसके लिये जितने शब्दों का प्रयोग करुँगा
वे सभी शब्द आज की भाषा में
असंसदीय हैं।

मैं डरा हुआ हूँ
शब्दों के प्रयोग से
कि कहीं माफी न माँगनी पड़े
आवारा ताकतों से
मैं गालियाँ देना चाहता हूँ सबको
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते।

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 26, 2011

न परदा न जीरो फीगर है तेरी हस्ती

पुरातन उसूल परदे में बिठा देते हैं तुझे
बंद कमरों की कैद में छुपा देते हैं तुझे
अति इन हालात की जान पर आफत है
नवीन संस्कार “लिव इन” बना देते हैं तुझे
………..

शोहदों की फब्तियों से किरच किरच बिखर जाती है सहमी हुई लड़की
गूंगी बहरी और अंधी बन के राह से गुज़र जाती है सहमी हुई लड़की
सर झुका के चलने की नसीहतों ने बहुत ज़ुल्म ढाया है इस अबला पर
कई बार तो चलते में अपने ही साये से डर जाती है सहमी हुई लड़की
………….

मीठे गोश्त के शिकारी घात लगा रहे हैं
कहीं दहेज के लालची आँखे दिखा रहे हैं
बहुत भारी है जवान होती बेटी का बोझ
मुफलिस बाप के कांधे झुकते जा रहे हैं
…………

आज के दौर से नज़रें मिला के चल
नीची निगाह वाली सर उठा के चल
तुझ से है ज़माना तू ज़माने से नहीं
जननी, जननों से कदम मिला के चल
…………

बड़ा है तेरा मुकाम नारी तू मादर ए दुनिया है
चूड़ियों की कैद ने तुझको अबला बना दिया है
“ज़ीरो फीगर” से सबक न ले खुद को पहचान
हव्वा तू, दुर्गा तू, सीता तू, मरियम तू, तू जुलेखा है।

(रफत आलम)

अप्रैल 20, 2011

बाबाजी, मैं और औरत

बाबाजी
तुम ब्रह्मचारी
तुम्हारी सोच के अनुसार
औरत नरक का द्वार।

लेकिन
मैं तो ब्रह्मचारी नहीं
दिखने में भी
ढ़ोंगी- पुजारी नहीं
मेरे लिये तो
हर औरत खूबसूरत है
बशर्ते यह कि
वह औरत हो।

तुमने जिसे नकारा
धिक्कारा
और अस्पर्श्य विचारा है
उसके आगे मैंने तो
समूचा जीवन हारा है।

मेरी दृष्टि से देखो कभी
तो जानोगे
नरक का वह द्वार
कितना प्यारा है।

सिर से पाँवों तक
औरत में क्या नहीं
कभी देखो तो सही
दूर से उसके लहराते कुंतल
सुराहीदार गर्दन
गालों में गड्ढ़े
ओठों पर हलचल
कंधों से नीचे
कमर के कटाव
और कमर से नीचे
नितम्बों के भराव
हटती नहीं है दृष्टि
अगर फंस जाये
दैहिक आकर्षण में।

बाबाजी
कुछ तो सोचो
क्या रखा है तुम्हारी सोच,
और ऐसे ही जिये जाते,
किये जाते आत्मतर्पण में?
कभी ध्यान से देखो
औरत के वक्ष
और सोचो कि
ईश्वर ने उन्हे केवल
बच्चे के हाथों का खिलौना
या फिर उसके लिये
दूध का भरा दोना
ही बनाया है
या फिर पुरुषों की नज़रों को
चकाचौंध, हतप्रभ या फिर
आबद्ध स्थिर करते हुये
अद्वतीय सौन्दर्य दिखाया है।

बाबाजी
प्रकृति को कभी
कपड़ों का बोझ ढ़ोते देखा है?
नदी को अपनी अनावृत्त
बासन्ती देह धोते देखा है?
सांगोपांग स्नान करती नदी को
नहाते हुये देखो।

बाबाजी
महसूसो पुरुष होने की वासना
जिओ एक जीवन पूरा
कहते हैं कि
औरत के बिना
की गयी पूजा
मनाया गया उत्सव
होता है आधा-अधूरा।

हर औरत माँ   नहीं होती
बहन नहीं होती
मित्र नहीं होती
बीवी नहीं होती
पर
हर औरत
औरत अवश्य होती है।

उसके लिये भी
हर शख्स पिता नहीं होता
भाई नहीं होता
वह भी सोचती है
बहुत कुछ खोजती है
आदमी में।

कैसी विडम्बना है कि
उसे आज तक
अपना पुरुष
अपने ढ़ंग से मिला नहीं
मगर ताज्जुब है कि
उसके ओठो
पर गिला नहीं।

बाबाजी
एक बात और
मैं अधम और कामी
मुझ पर हावी
कमजोरियाँ और इंद्रियगत गुलामी
इसलिये मेरी ही दृष्टि को
मत अपनाओ
औरत के बारे में जो संतों ने कहा है –
बूड़ा वंश कबीर का…
नारी की झाईं परत…
औगुन आठ सदा उर रहहीं…
भूल जाओ
कुछ व्यापक और
मौलिक दृष्टिकोण बनाओ।

देखो उसे सोचो उसे
भाषा और भूमि से परे
वह मात्र खेती ही नहीं
बेटी भी है।
उसकी शुचिता और
रक्षा की जिम्मेदारी
भावी समाज के निर्माण में
उसकी रचनात्मक हिस्सेदारी
हम पर नहीं तो किस पर है?

{कृष्ण बिहारी}

जनवरी 23, 2011

औरत…(कृष्ण बिहारी)

औरत को मारो पीटो
दहलाओ उसके सुख-दुख
हारी-बीमारी
और हाँ-ना से
कोई सरोकार न रखो
मौका मिलते ही उसे
जांघ के नीचे दबाओ
या फिर उसके
नितम्बों पर चढ़ जाओ
और जंगलीपन दिखाओ।

उसे पत्नी होने का दर्जा
हकीकत में मत दो
उसके आगे वायदों की
बिसात बिछाओ
वरना वह चढ़ जायेगी तुम पर
कर देगी तुम्हारा कद कमतर।

औरत को सताने की शुरुआत
तुम थोड़े ही कर रहे हो
जो तुम्हारे बाप ने किया
तुम्हारी माँ के साथ
वही तुम करो
अपने बेटे की माँ के साथ।

बेटी होने पर
मुँह फुलाओ
बेटा होने पर फुसलाओ
किसी भी बहाने से
उसे फिर से
गर्भिणी बनाओ।

तुम्हारा बाप
तुम और तुम्हारा बेटा
तीनों ही वास्तव में मर्द हो
जिनको पैदा करने की
बहुत बड़ी भूल की है औरत ने
चुकाने दो उसे कीमत
और वसूलो सूद
महाजन बनकर।

दिन में उसे हड़काओ-धमकाओ
रात को उसके लंहगे में गिड़गिड़ाओ
अपनी मर्दागिनी बहाओ।

औरत को निकलने मत दो बाहर
हाथ से निकल जायेगी
करने मत दो किसी से प्रेम
बदल जायेगी
उसे अपनी जरुरत पर
बाहर लाओ
व्यक्तिगत लाभ के लिये
नंगा घुमाओ
उसकी कमाई खाओ।

शरमाने की क्या बात है
शरम कोई हवा का झौंका नहीं है
वह कहीं नहीं जायेगी
मर भी गई तो
तुम्हारे पास दूसरी आयेगी
अकालों के बावजूद
औरतों का टोटा नहीं है।

औरत को इशारों पर
नचाओ
घर में रंग रुप और
सलीके के न होने का आरोप लगाओ
दहेज कम लाने का ढ़ोल बजाओ
सड़क पर, संसद में
उसे मोहरा बनाओ
मंच पर फेंको कुछ सिक्के
खनखनाओ
उसकी देह से बरसेगा सोना
दोनों हाथों से लूटो और कमाओ।

सिनेमा का परदा हो या
विश्व-बंदरियों का जमावड़ा
जिसे पता न हो अपने सौन्दर्य का
उसे खूबसूरत बताओ
उसके अहम को तुष्ट करो
उसे चूतिया बनाओ
और अपना मन बहलाओ।

शास्त्रों और पुराणों में
सत्य वचन
वह तुम्हारे मन बहलाव के लिये बनी है
इसलिये
औरत होने के जुर्म से सनी है।

{कृष्ण बिहारी}

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