Posts tagged ‘Astitva’

जनवरी 14, 2014

रूह और जिस्म

जिस्म मिलते हैं तो रूहें मिलती हैं…akhiri-001

या रूहें मिलती हैं तो जिस्म…

रूह और जिस्म जुदा नहीं कभी

एक के बिना दूसरे का मरण तय

रूह और जिस्म के इस झंझट में

कौन तय करे…

कौन ऊपर

कौन नीचे…

रूह अगर मरती नहीं

तो जिस्म चुकते ही क्यों अपने

अस्तित्व को खो देती है?

मरना ही तो हुआ?

जिंदा अगर यादों में रहने को भी कहते हैं

तो जिस्म तेरा मेरी यादों में

न सिर्फ जिंदा है…

जवान भी है…

हर चेहरे में…

तेरे जैसे रंग में

Rajnish sign

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नवम्बर 8, 2013

चलो एक बार फिर से मिल जाएँ हम

मेरी  सारी  हसरतें…  lovers-001

सारी तमन्नाएँ…

मेरे सारे अरमान…

मेरे सारे सपने

सिल गए हैं …

अस्तित्व से तुम्हारे ही

तुम मेरे शब्-ओ-रोज़ के हर लम्हे में

देखे अनदेखे

ख्वाबों की चलती फिरती तस्वीर हो…

कहे अनकहे लफ़्ज़ों की जिंदा तासीर हो…

मैं शुरू होता हूँ

हर सुबह तुम से…

ख़त्म हो जाता हूँ हर शब तुम में ही…

ढूंढता रहता हूँ तुम्हारे  होठों का स्पर्श…

अपनी उँगलियों  के पोरों  में

तलाशती  रहती हैं आँखें सीने पे

तुम्हारी गर्म साँसों के निशाँ हर लम्हा…

अहसास तुम्हारी छुअन का जिंदा रहता है

मुझमे हर पल…

रखता है मुझे जिंदा हर पल…

आओ

दूरियां समेट दें अपने जिस्मों की हम

संगम हो

मेरे  तुम्हारे वजूद का

ऐसे कि

बहे ज़िन्दगी लहू में फिर से…

वैसे भी तो तुम्हारा प्यार गरम लावे सा

समेटे रखता है मुझे अपने में

बन के चादर गर्म अहसासों  की बिछा रहता है

पूरी तरह मुझ पे …

पूरी पूरी रात …

पूरा पूरा दिन…

(रजनीश)

अक्टूबर 13, 2011

मुक्त हो अर्थहीन काया

कभी आँखों से गिरे होंगे अश्रु
पानी की बहती बूंदे थाम लेने के वास्ते
तब, एक रेशमी आँचल था।

आसान था धूप का सफर भी
घनेरी जुल्फ के साये में
जिंदगी सुस्ता लेती थी।

फिर चल पड़ता था आशाओं का कारवां
मरीचिकाएं भी उन दिनो
मंजिलों के निशान हुआ करती थीं
हर प्यास का इलाज थे
अमृत भरे होठ किसी के।

समय के घने कोहरे पीछे
छिप गए सायों का ज़िक्र ही क्या?
खुद अपना अस्तित्व तक
बेबसी के अँधकार के पास गिरवी है
ना राह, ना सफर, ना मंजिल की आरजू
बस सोचता है शून्य सा दिमाग
किसी तरह साँसों का क़र्ज़ कटे
किसी तरह हाड-माँस की केद से
मुक्त हो अर्थहीन काया

(रफत आलम)

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