Posts tagged ‘Ashwini Ramesh’

जुलाई 5, 2011

अहसास जो तुम्हे जीवंत रखता है

जीवन के
सर्द कठिन दिनों में
आसमान में
एक बादल का टुकड़ा
मन व्याकुल कर देता है
सूरज की गर्मी से
वंचित होने के अहसास से
तपती दोपहरी में
तपते हाँफते वदन को
यही वह बादल का टुकड़ा
मन
अलाह्दित ,हर्षित कर देता है
वर्षा की बौछार की
राहत देने वाली
आशा से
फिर वर्षा ऋतु में
यही बादल का टुकड़ा
भयभीत….
आतंकित कर देता है
जोर की वर्षा से
होने वाली
तबाही से
और यही बादल का टुकड़ा
हेमंत में फिर
शरद आने का
आभास दिलाकर
फिर व्याकुल कर देता है
सतरंगी खिली धूप के साथ
सुगन्धित खिलते फूलों की
मुस्कान से मदमाती खुशी
लेकर आते
बसंत की
आहट तक
बादल का यह टुकड़ा मन है
और
आत्मा सूरज है
सूरज के इर्द-गिर्द घूमते
बादल के टुकड़े
और
आत्मा के इर्द-गिर्द घूमते
मन का अहसास
एक जैसा ही है
जैसे बादल का टुकड़ा
अल्प काल के लिए
सूरज को छिपा तो सकता है
लेकिन उसके होने के
अहसास को
मिटा नहीं सकता
ठीक जिस तरह मन
अल्प काल के लिए
आत्मा को भ्रमित
तो कर सकता है
लेकिन उसके होने का
अहसास नहीं मिटा सकता
मौसम
ऋतु परिवर्तन
स्वाभाविक है
नियति है
इसीलिए तो
परिवर्तित होता है मन
व्याकुलता और हर्षता में
लेकिन हर स्थिति
परिवर्तन में
यही एक अहसास
तुम्हे जीवंत रखता है
और सुख देता है कि
बादल से मन के
टुकड़े के पीछे
सूरज सी आत्मा की रोशनी
सदैव महसूसती
और
अहसासती है!

(अश्विनी रमेश)

जुलाई 1, 2011

व्यक्ति अब तो आत्मसमर्पण करो

व्यक्ति !
तुमने चाहे
कितने ही युद्ध
क्योँ न लडें हों
जीते हों
कितना ही
संघर्ष
आविष्कार
और उन्नति की हो
लेकिन तुम
हमेशा
और
हर बार
हारे हो
अपने ही अहम से।

अपने अहम की
तस्वीर को
अपने अनुकूल न पाकर
तुम इसको
बार बार
बनाने
बिगाड़ने के लिए
अपने ही मन से
करते गए
मित्रता और शत्रुता
तर्क खोजकर
अपनी ही आत्मा को
ढालना चाहा तुमने
अपने अनुकूल।

लेकिन…..
तुम हमेशा
हारे हो
और इस तरह
तुम
न अपने अहम
न मन
और न अंतरात्मा को पा सके
तो फिर तुमने
पाया क्या…

कुछ नहीं
केवल शून्य
इसलिए
सब कुछ भूलकर
शून्य से ही
आरम्भ करो
अपना नवजीवन
मन शून्य होकर
महसूस करो कि
तुम्हारे भीतर
क्या चल रहा है
जो तुम नहीं चला रहे
इसलिए
प्रकृति के समक्ष
कृतज्ञ होकर
कर डालो
आत्मसमर्पण..
और सहजता से
मान लो कि
तुम्हारा असिस्त्व
वही है जो
समुद्र में
एक पानी की
बूँद का है
न इससे अधिक
और न कम।

और जिस पल
तुम ये अहसास कर लोगे
उस पल तुम
जीत जाओगे
और इसी के साथ
तुम्हारे लिए मिट जाएगा
जीत, हार का अर्थ
और तुम केवल
प्रकृति निष्ठ
व्यक्ति होगे!

(अश्विनी रमेश)

जून 25, 2011

उपभोक्तावाद को ललकारती कविता का शंखनाद

इससे पहले कि
उपभोक्तावाद
तुम्हे
बहरा
गूंगा
और
अन्धा कर दे
और तुम कुछ
सुन
बोल
और
देख न सको
मैं कर रहा हूँ
उपभोक्तावाद को
ललकारती कविता का
शंखनाद—–
ताकि
इसकी ध्वनि
तुम्हारे
अंतर्मन के
अंतरिक्ष में
हमेशा
गूंजती रहे
और
तुम
एक निर्जीव वस्तु की तरह
एक कोने में पड़े हुए
उपभोक्तावाद के
इस खूंखार तांडव को
चुपचाप
देखते न रह जाओ
इसलिए यह
छटपटाते हुए भी
तुम्हे हमेशा
यह जिन्दा अहसास
करवाती रहे कि
तुम वस्तु के लिए नहीं
वस्तु तुम्हारे लिए है
और
यह अहसास भी कि
तुम अकेले नहीं
मैं सत्य की
ऊँची पताका लिए
इस युद्ध में
तुम्हारे साथ
हमेशा खड़ा हूँ !

© अश्विनी रमेश

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