Posts tagged ‘Apaatkaal’

जून 27, 2014

हट जाओ : आपातकाल पर :अज्ञेय” की कविता (४)

तुम agyeya
चलने से पहले
जान लेना चाहते हो कि हम
जाना कहां चाहते हैं।
और तुम
चलने देने से पहले
पूछ रहे हो कि क्या हमें
तुम्हारा
और तुम्हारा मात्र
नेतृत्व स्वीकार है?

और तुम
हमारे चलने का मार्ग बताने का
आश्वासन देते हुए
हम से प्रतिज्ञा चाहते हो
कि हम रास्ते-भर
तुम्हारे दुश्मनों को मारते चलेंगे।

तुम में से किसी को हमारे कहीं पहुंचने में
या हमारे चलने में या हमारी टांगें होने
या हमारे जीने में भी
कोई दिलचस्पी नहीं हैः
उस में
तुम्हारा कोई न्यास नहीं है।

तुम्हारी गरज़
महज़
इतनी है कि जब हम चलें तो
तुम्हारे झंडे ले कर
और कहीं पहुंचें तो वहां
पहले से (और हमारे अनुमोदन के दावे के साथ)
तुम्हारा आसन जमा हुआ हो।

तुम्हारी गरज़
हमारी गरज़ नहीं है
तुम्हारे झंडे
हमारे झंडे नहीं हैं।
तुम्हारी ताक़त
हमारी ताक़त नहीं है, बल्कि
हमें निर्वीर्य करने में लगी है।

हमें अपनी राह चलना है।
अपनी मंज़िल
पहुंचना है
हमें
चलते-चलते वह मंज़िल बनानी है
और तुम सब से उसकी रक्षा की
व्यवस्था भी हमें चलते-चलते करनी है।

हम न पिट्ठू हैं न पक्षधर हैं
हम हम हैं और हमें
सफ़ाई चाहिए, साफ़ हवा चाहिए
और आत्म-सम्मान चाहिए जिस की लीक
हम डाल रहे हैं:

हमारी ज़मीन से
हट जाओ।

(अज्ञेय)

छवि एवं कविता : साभार – श्री ओम थानवी, संपादक “जनसत्ता”

जून 26, 2014

संभावनाएं : आपातकाल के दौरान “अज्ञेय”

अब आप ही सोचिएagyeya
कितनी संभावनाएं हैं।
– कि मैं आप पर हंसूं
और आप मुझे पागल करार दे दें;
– या कि आप मुझ पर हंसें
और आप ही मुझे पागल करार दे दें;
– या आप को कोई बताये कि मुझे पागल करार दिया गया
और आप केवल हंस दें…
– या कि
हंसी की बात जाने दीजिए
मैं गाली दूं और आप –
लेकिन बात दोहराने से लाभ?
आप समझ तो गये न कि मैं कहना क्या चाहता हूं?
क्यों कि पागल
न तो आप हैं
न मैं;
बात केवल करार दिये जाने की है –
या, हां, कभी गिरफ्तार किये जाने की है।
तो क्या किया जाए?
हां, हंसा तो जाए –
हंसना कब-कब नसीब होता है?
पर कौन पहले हंसे?
किबला, आप!
किबला, आप!
(अज्ञेय)

[ हिंदी के महान कवि अज्ञेय इमरजेंसी के मुखर विरोधी और जयप्रकाश नारायण के सहयोगी थे; जेपी के साप्ताहिक एवरीमेंस वीकली का उन्होंने संपादन किया। अज्ञेय ने इमरजेंसी के खिलाफ कविताएं भी लिखीं। यह मार्च 1976 में लिखी गई थी]

कविता और अज्ञेय की छवि – साभार : श्री ओम थानवी, संपादक “जनसत्ता

%d bloggers like this: