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मार्च 20, 2015

सूरज को नही डूबने दूंगा …(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा।
देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैं
मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं
और ढलान पर एड़ियाँ जमाकर
खड़ा होना मैंने सीख लिया है।

घबराओ मत
मैं क्षितिज पर जा रहा हूँ।
सूरज ठीक जब पहाडी से लुढ़कने लगेगा
मैं कंधे अड़ा दूंगा
देखना वह वहीं ठहरा होगा।

अब मैं सूरज को नही डूबने दूँगा।
मैंने सुना है उसके रथ में तुम हो
तुम्हें मैं उतार लाना चाहता हूं
तुम जो स्वाधीनता की प्रतिमा हो
तुम जो साहस की मूर्ति हो
तुम जो धरती का सुख हो
तुम जो कालातीत प्यार हो
तुम जो मेरी धमनी का प्रवाह हो
तुम जो मेरी चेतना का विस्तार हो
तुम्हें मैं उस रथ से उतार लाना चाहता हूं।

रथ के घोड़े
आग उगलते रहें
अब पहिये टस से मस नही होंगे
मैंने अपने कंधे चौड़े कर लिये है।

कौन रोकेगा तुम्हें
मैंने धरती बड़ी कर ली है
अन्न की सुनहरी बालियों से
मैं तुम्हें सजाऊँगा
मैंने सीना खोल लिया है
प्यार के गीतो में मैं तुम्हे गाऊँगा
मैंने दृष्टि बड़ी कर ली है
हर आँखों में तुम्हें सपनों सा फहराऊँगा।

सूरज जायेगा भी तो कहाँ
उसे यहीं रहना होगा
यहीं हमारी सांसों में
हमारी रगों में
हमारे संकल्पों में
हमारे रतजगों में
तुम उदास मत होओ
अब मैं किसी भी सूरज को
नही डूबने दूंगा।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

जुलाई 15, 2011

संस्कार

हमेशा
हर बार की तरह
आज भी मैं
अपनी माटी और माँ
की शरण में
अपने गांव और घर पहुंचा हूँ
पुनः अपने भीतर
वही जान फूंकने
जिसे मैंने अपनी माटी
और
माँ के सहारे
अपने संघर्षमयी जीवनपथ पर
चलते हुए
अटूट साहस और धैर्य से
अर्जित करके
जीवन के कठिनतम क्षणों को भी
बड़े धैर्य और शालीनता से
जिया है
पहाड़ों की कोख में बसी
माँ का शरीर
उम्रदराज हुआ तो क्या
हिमालय सा मजबूत
इरादे वाला उसका दिलों-दिमाग
अभी भी डगमगाया नहीं
थका नहीं
पहले की तरह
मुझमे अभी भी
माँ का वही अदब है
इस बार भी थोड़ा
बतियाने के बाद
माँ कह रही है
शाम को खेतों का चक्कर काट आना
फसल देख लेना
कैसी उगी है|

मुझे याद है
बचपन में जब माँ
हम सब बच्चों को
स्कूल की छुटी के बाद
खेत में मक्की काटने
और
आलू खोदने ले जाया करती थी
और जब स्कूल छूटा तो
दोपहर में आराम के बाद
यह अदब कि
माँ अभी आवाज़ देगी
तीन बज गए
क्या सोकर जीवन कट जाएगा
अब उठ जा
खेत जाना होगा

माँ के ये शब्द
हमेशा मुझे
आलस्य की नींद से
जगाते रहें हैं
अपनी माटी और माँ के
एक अटूट संस्कार को
जीने के लिए
सोचता हूँ
गर में अपनी माटी और माँ के
इस संस्कार को न जीता
तो शायद मैं
एक संस्कार रहित
अधूरा व्यक्ति होता
जिसे यह मालूम न होता कि
माटी के अन्न
और माँ के संस्कार का
संघर्षमयी जीवन में
एक व्यक्ति को
सार्थक व्यक्ति बनाने में
कितना अर्थपूर्ण
और
अद्वितीय
योगदान होता है !

(अश्विनी रमेश)

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