Posts tagged ‘Amrita Shergil’

फ़रवरी 21, 2017

अमृता शेरगिल के चित्र को देख कर …

amritashergil1अंधी रात का तुम्हारा तन :

दाहिने हाथ की उठी हथेली ;

नग्न कच्चे कुचों –

कटी के मध्य देश- –

लौह की जाँघों से

आंतरिक अरुणोदय की झलक मारता है

ओ चित्र में अंकित युवती:

तुम सुंदर हो!

मौन खड़ी भी तुम विद्रोही शक्ति हो!

(केदारनाथ अग्रवाल – ०९ अक्टूबर १९६०)

 

जून 15, 2011

प्रेम : अंततः पारदर्शी मन


छुआ है जिस दिन से तुमने
मेरा मन
समा गयी है उष्णता तुम्हारी
मुझमें।

यह गरमी और इस आँच की खुश्बू
कहाँ जाये?
यह उम्र झूठ बोलने की नहीं है
पैंतालिस की उम्र में
प्लेटॉनिक/ अदभुत प्रेम
होता नहीं
और जो होता है
लाख कोशिशों के बावजूद
सोता नहीं।
चाहता है एकांत विज़न
दैहिक मिलन
धूप-छाँही तपन
सामंती थकन।

सच्ची बात-
प्रेम
तुम्हारा भी माँसल है
प्लेटॉनिक नहीं
होती है तुम्हे भी गुदगुदी
मुझसे मिलकर
बहाने से ही सही
तुम्हारी भी कोई अतृप्ति
होती है तृप्त
या पूरा होता है
बचपना
या कोई सपना
जो कभी अपना न बना।

उसे देख रहे हो मुझमें तुम
भीतर के सच
और बाहर के झूठ के साथ
यह जानते हुये भी कि
अब कुछ भी नहीं है
अपने हाथ
जो सहायक बने मिलन में।

मेरी बात
मेरा सच
क्या है, बताऊँ?

तुम सपनों में आने लगे हो
दुनिया में
दुनिया का वश चल जाये
मुमकिन है
पर
सपनों में अपना वश भी नहीं चलता
कोई सपना
अपने आप अनायास नहीं पलता
सपना
बहुत दूर दूर तक सोची हुयी,
समझी गुयी
हकीकत है
जो सच हो जाये तो
मुसीबत है।

परदे-
ढ़कते हैं खिड़कियाँ,
दरवाजे
दिल और एकांत नहीं।
ऐसे में सात परदों में भी
चाहे रहो तुम
ऊपर से जगत के लिये
चाहे जैसे दिको तुम
पर भीतर से मुझे
जाकी रही भावना जैसी
निर्वसन/ नग्न तन
दिखने लगे हो
साथ रहने लगे हो।

स्वप्न में दर्शन
दर्शन में स्पर्श
स्पर्श में एहसास
अंततः पारदर्शी मन का
कामुक
विह्वल
उच्छृंखल सहवास
खुलवा दे
जूड़ा,
कंगन,
चूड़ा,
न रहे बंधन किसी विन्यास का
सूत और कपास का
सांसों की गमक का
पसीने के महक
भाप सी लगे
देह से बाहर आये और
हमारी बर्फ को
दहकाये,
पिघलाये,
गलाये
तब कहीं प्रेम को
अदभुत बनाये।

{कृष्ण बिहारी}

चित्र: अमृता शेरगिल की पेंटिंग – श्रंगार

मार्च 9, 2011

नारी उपेक्षिता…

सुबह की पहली किरण के साथ
आँख खुलती है और
बेगार की ये जिंदा मशीन
झुलसने लगती है
चाय की भाप से।

 

चूल्हे चौकी के साथ
राशन के आटे का आता है ख्याल
गैस सिलेंडर का हलकापन
बेचारी को डराने लगता है
घर में दूध की एक ही थैली का है जुगाड़
सरताज की चाय है ज़रूरी।

मुन्ने का क्या है भूखा रो लेगा
मर भी गया तो अगले साल
एक और बदनसीब का दुनिया में आना तय है
सिंदूर के धनी के लिए।

ये नामित अर्धांगिनी
टांगों तले की दासी के सिवा कुछ भी नही
शहर भर के तलवे चाटने वाली मूंछों के लिए
अक्सर डाट –डपट या लात-थप्पड़ से
अपनी नाकामियों की खीझ उतरने का
सुलभ साधन है।

पैदा होते ही गला घोंटने की कोशिस करने वालो
तुम लाख आज़ादी के दावे-वादे करते रहो
चूड़ियों में नहीं बेड़ियों में है औरत
यही कड़वा और बड़ा सच है

(रफत आलम)

चित्र : अमृता शेरगिल की पेंटिंग्स

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