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मार्च 24, 2017

सेक्युलरवाद से संवाद – योगेन्द्र यादव

 उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे। उसी घड़ी एक सेक्युलर मित्र से सामना हो गया। चेहरे पर मातम, हताश और चिंता छायी हुई थी। छूटते ही बोले “देश में नंगी साम्प्रदायिकता जीत रही है। ऐसे में आप जैसे लोग भी सेक्युलरवाद की आलोचना करते हैं तो कष्ट होता है।”

मैं हैरान था: “आलोचना तो लगाव से पैदा होती है। अगर आप किसी विचार से जुड़े हैं तो आपका फर्ज़ है कि आप उसके संकट के बारे में ईमानदारी से सोचें। सेक्युलरवाद इस देश का पवित्र सिद्धांत है। जिन्हें इस सिद्धांत में आस्था है उनका धर्म है कि वो सेक्युलरवाद के नाम पर पाखंडी राजनीति का पर्दाफाश करें।”

वो संतुष्ट नहीं थे। कहने लगे “अब जलेबी न बनायें। मुझे सीधे-सीधे बताएं कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से आपको डर नहीं लगता?”

मैंने सीधी बात कहने की कोशिश की: ” डर तो नहीं लगता, हाँ दुःख जरूर हुआ। जिसे इस देश में गर्व हो उसे ऐसे किसी नेता के इतनी ऊँची कुर्सी पर बैठने पर शर्म कैसे नहीं आएगी? जिसे योग में सम्यक भाव अपेक्षा हो वो आदित्य नाथ जी योगी कैसे मान सकता है? जो धर्म को कपड़ों में नहीं आत्मा में ढूँढता है वो घृणा के व्यापार को धार्मिक कैसे कह सकता है?”

अब उनके चेहरे पर कुछ आत्मीयता झलकी “तो आप साफ़ कहिये न, कि मोदी, अमित शाह और संघ परिवार देश का बंटाधार करने पर तुले हैं।”

मैं सहमत नहीं था: “सेक्युलरवादी सोचते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दुष्प्रचार, संघ परिवार के घृणा फैलाने के अभियान और भाजपा की राजनीति ने आज सेक्यूलरवाद को संकट में पहुंचा दिया है। लेकिन इतिहास में हारी हुई शक्तियां अपने विरोधियों को दोष देती है। सच यह है कि इस देश में सेक्यूलरवाद स्वयं सेक्यूलरवाद के एकांगी विचार और सेक्यूलरवादियों की कमजोर और पाखंडी राजनीति के कारण संकट में है।”

उनके चेहरे पर असमंजस को देखकर मैंने कुछ विस्तार दिया: “संकट की इस घड़ी में सेक्यूलर राजनीति दिशाहीन है, घबराई हुई है। जनमानस और सड़क पर सांप्रदायिकता का प्रतिरोध करने की बजाय सत्ता के गलियारों में शॉर्टकट ढूंढ़ रही है, भाजपा की हर छोटी-बड़ी हार में अपनी जीत देख रही है। हर मोदी विरोधी को अपना हीरो बनाने को लालायित है। सांप्रदायिक राजनीति अपने नापाक इरादों के लिए संकल्पबद्ध है, इस मायने में सच्ची है। आत्मबल और संकल्प विहीन सेक्यूलर राजनीति अर्धसत्य का सहारा लेने को मजबूर है। सांप्रदायिकता नित नई रणनीति खोज रही है, अपनी जमीन पर अपनी लड़ाई लड़ रही है। सेक्यूलरवाद लकीर का फकीर है, दूसरे की जमीन पर लड़ाई हारने को अभिशप्त है। सांप्रदायिकता आक्रामक है तो सेक्यूलरवाद रक्षात्मक। सांप्रदायिकता सक्रिय है, सेक्यूलरवाद प्रतिक्रिया तक सीमित है। सांप्रदायिकता सड़क पर उतरी हुई है, सेक्यूलरवाद किताबों और सेमिनारों में कैद है। सांप्रदायिकता लोकमत तक पहुंच रही है, सेक्यूलरवाद पढ़े-लिखे अभिजात्य वर्ग के अभिमत में सिमटा हुआ है। हमारे समय की यही विडम्बना है-एक ओर बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है तो दूसरी ओर थके-हारे सेक्यूलरवाद की कवायद।”

अब वो “ऊँची बात कर दी श्रीमान ने” वाली मुद्रा में थे। तय नहीं कर पा रहे थे कि मैं दोस्त हूँ या दुश्मन। इसलिए मैंने इतिहास का सहारा लिया।

“आजादी से पहले सेक्यूलर भारत का सपना राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा था और सभी धर्मों के भीतर सामाजिक सुधार के लिए कटिबद्ध था।

आजादी के बाद से सेक्यूलरवाद इस देश की मिट्टी से कट गया। सेक्यूलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी इबारत से सेक्यूलर भारत स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गांधी की भाषा छोड़कर विदेशी मुहावरा बोलना शुरू किया। सेक्यूलरवाद का सरकारी अनुवाद ‘धर्मनिरपेक्षता’ इसी उधारी सोच का नमूना है। धर्म के संस्थागत स्वरूपों और अलग-अलग पंथ के बीच तटस्थ रहने की नीति धीरे-धीरे धर्म के प्रति निरपेक्षता में बदल गई। सेक्यूलरवाद का अर्थ नास्तिक होना और एक औसत भारतीय की आस्था से विमुख होना बन गया। सेक्यूलरवाद का विचार भारत के जनमानस से कटता गया।”

अब उनसे रहा नहीं गया: “यानि कि आप भी मानते हैं कि सेक्युलरवाद वोट बैंक की राजनीति है?”

“ये कड़वा सच है। आजादी के आंदोलन में सेक्यूलरवाद एक जोखिम से भरा सिद्धांत था। आजादी के बाद सेक्यूलरवाद एक सुविधाजनक राजनीति में बदल गया। चुनावी राजनीति में बैठे-बिठाए अल्पंसख्कों के वोट हासिल करने का नारा बन गया। जैसे-जैसे कांग्रेस की कुर्सी को खतरा बढ़ने लगा, वैसे-वैसे अल्पसंख्यकों के वोट पर कांग्रेस की निर्भरता बढ़ने लगी। अब अल्पसंख्यकों, खासतौर पर मुसलमानों, को वोट बैंक की तरह बांधे रखना कांग्रेस की चुनावी मजबूरी हो गई।”
“तो अब आप ये भी कहेंगे कि मुसलमानों का तुष्टिकरण भी एक कड़वा सच है?” अब उनकी दृष्टि वक्र थी।

” नहीं। तुष्टिकरण मुसलमानों का नहीं, उनके चन्द मुल्लाओं का हुआ। आजादी के बाद मुस्लिम समाज उपेक्षा, पिछड़ेपन और भेदभाव का शिकार था। देश के विभाजन के चलते अचानक नेतृत्वविहीन इस समाज को शिक्षा और रोजगार के अवसरों की जरूरत थी। लेकिन उनकी इस बुनियादी जरूरत को पूरा किए बिना उनके वोट हासिल करने की राजनीति ने सेक्यूलरवाद की चादर ओढ़ना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सेक्यूलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाए रखने की राजनीति हो गई-मुसलमानों को खौफज़दा रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट अपनी झोली में बंटोरते जाओ। नतीजतन मुस्लिम राजनीति मुसलमानों के बुनियादी सवालों से हटकर सिर्फ सुरक्षा के सवाल और कुछ धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों (उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, शादी-ब्याह के कानून) के इर्द-गिर्द सिमट गई।

जिस खेल को पहले कांग्रेस ने शुरू किया, उसे बाद में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और लेफ्ट ने भी अपना लिया। डर के मारे मुसलमान सेक्यूलर पार्टियों का बंधक बन गया। मुसलमान पिछड़ते गए और सेक्यूलर राजनीति फलती-फूलती रही। मुस्लिम समाज उपेक्षा और भेदभाव का शिकार बना रहा, लेकिन उनके वोट के ठेकेदारों का विकास होता गया। वोट बैंक की इस घिनौनी राजनीति को सेक्यूलर राजनीति कहा जाने लगा। व्यवहार में सेक्यूलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े हुए दिखना। पहले जायज हितों की रक्षा से शुरुआत हुई। धीरे-धीरे जायज-नाजायज हर तरह की तरफदारी को सेक्यूलरवाद कहा जाने लगा। धीरे-धीरे एक औसत हिंदू को लगने लगा कि सेक्यूलरवादी लोग या तो अधर्मी है या विधर्मी। उसकी नजर में सेक्यूलरवाद मुस्लिमपरस्ती या अल्पंसख्कों के तुष्टिकरण का सिद्धांत दिखने लगा। उधर मुसलमानों को लगने लगा कि सेक्यूलर राजनीति उन्हें बंधक बनाए रखने का षड्यंत्र है। इससे तो बेहतर है कि वे खुलकर अपने समुदाय की पार्टी बनाए। इस तरह देश का एक पवित्र सिद्धांत देश का सबसे बड़ा ढकोसला बन गया।”

“यानि आप कह रहे हैं कि हम योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद दें कि उनके बहाने हमारी आँखे खुल गयीं ” इतना बोल मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना वे आगे बढ़ गए। मुझे लगा उनके चेहरे पर उतनी हताशा नहीं थी, उनकी चाल में एक फुर्ती थी।

फ़रवरी 3, 2015

आम आदमी पार्टी के पत्र सुप्रीम कोर्ट, सोनिया गांधी और अमित शाह के नाम

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मई 18, 2014

हाथी-घोड़ा-पालकी : कहानी भाजपा की जीत, और कांग्रेस के Fall की!

कांग्रेस को इस पतन की उम्मीद थी, न भाजपा को ऐसे आरोहण की। जनता भी कभी छप्पर फाड़ कर देती है। पहली बार भाजपा को अपने बूते पूर्ण बहुमत मिला है। और कांग्रेस को अपूर्व विमत। पंद्रह साल पहले सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं। पार्टी के इतिहास में उसकी वह न्यूनतम उपलब्धि थी। इस दफा, जब चुनाव की कमान राहुल गांधी के हाथों में रही, कांग्रेस को 43 सीटें मिली हैं। यारो, कैसा गिरने में गिरना है!

भाजपा ने राजग गठबंधन में चुनाव लड़ा। लेकिन जनता ने राजग की 336 सीटों में भाजपा को 282 सीटें दे दी हैं। यानी अब सरकार चलाने को गठबंधन की बैसाखी की जरूरत नहीं, न काम करने या न करने के पीछे गठबंधन को जिम्मेदार ठहराने के बहाने ढूंढ़ने की गुंजाइश। पिछले पच्चीस बरसों में सबसे ज्यादा 244 सीटें कांग्रेस को मिली थीं, 1991 में। खरीदफरोख्त के बाद गठबंधन सरकार बनी, घोटाले हुए। फिर गठबंधन का युग चल निकला। मनमोहन सिंह जैसे भले मगर नाकारा प्रधानमंत्री की नाक नीचे विराट घोटाले हुए , ठीकरा फिर गठबंधन के मत्थे फोड़ा गया। क्या इसी सब के चलते जनता जनार्दन ने नरेंद्र मोदी की ‘अच्छे’ दिनों या सुशासन की पुकार सुनी। और उन्हें प्रचण्ड बहुमत अता फरमाया है?

हम जानते हैं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को संदेह का लाभ देते हुए जनता ने पांच साल पहले दुबारा चुना था। एक भले और अर्थशास्त्र के विद्वान प्रधानमंत्री को पूरे दस बरस राज करने का मौका मिला। लेकिन प्रगति की जगह बंटाढार हुआ। भले ही क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो की तर्ज पर मनमोहन सिंह ने कहा कि भविष्य में इतिहास उन्हें सही समझेगा। उनके एक सलाहकार ने चुनाव के बीच मुनादी की कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी प्रगति हुई है, उतनी मानव जाति के इतिहास में किसी देश में कभी न हुई होगी। लेकिन ऐसे दावे इतिहास की प्रविष्टियों से अर्थवत्ता नहीं पाते। लोग देखते हैं कि उनके दैनंदिन जीवन में क्या प्रगति हुई है। देश की अर्थव्यवस्था कहां पहुंची है। आटे-दाल का भाव कम हुआ है या ज्यादा। रुपया कितना चढ़ा या लुढ़का है। देश में हिंसा बढ़ी है या घटी है। खेती, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, कानून-व्यवस्था, पर्यावरण या हवा-पानी आदि जीवन से सीधे जुड़े क्षेत्रों में हम कितना आगे बढ़े हैं। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों का सचमुच कितना उद्धार हुआ है। दूसरे देशों की नजरों में हमारी साख ऊंची हुई है या गिरी है।

कहना न होगा, इन सवालों के जवाब में हाथ मलता भारतवासी चुनाव नजदीक आते-न-आते अपने सबसे ताकतवर हथियार- मताधिकार- की धार तेज करने में लग गया था। जिस कारपोरेट जगत यानी बड़ी पूंजी के जमावड़े ने कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वह उसे उखाड़ फेंकने में जुट गया। गुजरात में विकास के नारे उछालने वाले नरेंद्र मोदी से उसका इश्क पहले से परवान पर था। हालांकि कांग्रेस ने चुनिंदा मंत्री तक कारपोरेट घरानों की मरजी मुताबिक नियुक्त किए थे। राडिया टेप याद करें तो यह दास्तान याद आएगी। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी का बेदाग ‘परसोना’ थे, मगर कारपोरेट को उनसे बाजार को संभाल लेने की उम्मीदें थीं। मोहभंग होने पर कमान उनके हाथ से खिंचने लगी। मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब के हवाले खयाल करें तो वित्त मंत्री तक प्रधानमंत्री की जानकारी के बगैर तय होने लगे। खुद को सत्ता का निर्मोही जाहिर कर सोनिया गांधी ने आखिर मनमोहन सिंह को भोलेपन में आगे नहीं किया था। वे तन कर खड़े नहीं हो सकते थे। क्वात्रोकी की मुक्ति जैसे मामले तो बहुत मामूली थे। एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रहते जितने बड़े आर्थिक घोटाले सरकार में हुए , पहले कब हुए होंगे? मगर सोनिया-मनमोहन भी सब उद्यमियों की इच्छाएं पूरी न कर सके। नतीजतन ताकतवर कारपोरेट का नरेंद्र मोदी के पाले में जा खड़े होना कांग्रेस के लिए खतरे की खुली घंटी बन गया।

जो इस खेल को समझने से आंख चुराएगा, उसे सब मोदी का जलवा दिखाई देगा। ‘मोदी-मोदी’ या ‘हर-हर मोदी’ का रंग-रोगन बाद का है। इतना तो गाफिल भी कहता मिलेगा कि ऐसा खर्चीला चुनाव पहले नहीं देखा। पैसा पानी का तरह नहीं बहा, हवा की तरह उड़ा। सिर्फ इसलिए नहीं कि रोज के दो-तीन लंबे दौरों-सभाओं के बाद शाम को मोदी को अपने घर गांधीनगर लिवा लाने के लिए दो गुजराती उद्योगपतियों के तीन हवाई जहाज तैनात रहते थे। आधुनिक तकनीक वाले तमाम प्रचार माध्यमों और पेशेवर प्रतिभाओं की मदद से प्रधानमंत्री पद के दावेदार का सुनियोजित रूपक गढ़ा गया। मीडिया का एक हिस्सा मिलीभगत में अभियान का हिस्सा बन गया। साबुन-तेल के प्रचार की मानिंद मॉडलिंग करते ‘मोदीजी’ का रूपक गली-गली हर जुबान पर पहुंचाया गया। कोई अखबार, टीवी, रेडियो, सड़क, दीवार, यहां तक कि सोशल मीडिया पर बेनामी षड्यंत्रकारी भी खाली न रहे। जरा सोचें कि इतने संसाधनों, तैयारी के साथ प्रचार अभियान की कमान अगर सुषमा स्वराज के हाथ होती तब भी परिणाम क्या बहुत भिन्न होते?

पर प्रचार के ऊपर मोदी की ऊर्जा, और नाटकीय सही, वक्तृता अलबत्ता असरदार ज्यादा रही। चरमराई अर्थव्यवस्था, महंगाई, असंतुलित विकास, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को उन्होंने सबसे अहम मुद्दा बनाया। युवा वर्ग, खास कर नए मतदाता को रोजगार का झुनझुना थमाया। गुजरात का सच्चा-झूठा विकास का मिथक उनकी स्थायी टेक बन गया। आखिरी दौर में उन्होंने जातिवादी पत्ता भी चलाया, मुसलमान बस्तियों में घूमे, मुसलिम बुजुर्गों के पांव छुए। तूफानी दौरों में अपने सीमित या फिसलते ज्ञान (अंडमान में भगत सिंह, बिहार में तक्षशिला, गंगा किनारे सिकंदर, मौर्य नहीं गुप्त साम्राज्य के चंद्रगुप्त, श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अस्थियां आदि) के बावजूद कांग्रेस से ऊबे मतदाताओं में मोदी यह उम्मीद जगाने में सफल रहे कि वे परिवर्तन ला सकते हैं। प्रचार प्रबंधकों के गढ़े नारे और गाने (मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट… हम मोदीजी को लाने वाले हैं… अच्छे दिन आने वाले हैं!)  पुरउम्मीद और आहत मतदाता के लिए मरहम का काम करते दिखाई दिए। अनेक राजनीतिक दल हाशिए पर जाने लगे। उत्तर प्रदेश में बसपा पता नहीं कहां धंस गई। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों ने अपनी जमीन खो दी। कारण कांग्रेस वाला ही था। लोग उन्हें आजमा चुके थे और मोहभंग से त्रस्त थे।

इसे प्रचार अभियान का एक अंग कहना ही मुनासिब होगा कि कांग्रेस केंद्रित गठबंधन से उकताए लोगों की परिवर्तन की चाह को चौतरफा ‘मोदी लहर’ के रूप में देखा गया। सच्चाई यह है कि ‘मोदी लहर’ के प्रादुर्भाव के बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए थे। लोगों ने पंद्रह साल पुरानी कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद हार गईं। चुनाव से पहले रोहिणी में नरेंद्र मोदी विराट जनसभा में अपनी रणभेरी बजा गए थे। लेकिन लोगों ने दुबले-पतले मफलर-शुदा अरविंद केजरीवाल की नई-नवेली आम आदमी पार्टी को ज्यादा उम्मीद से देखा।

दिल्ली की सफलता ने केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर पंख पसारने को प्रेरित किया। पर यह फैसला जल्दबाजी का साबित हुआ। फिर बड़े पूंजीपतियों पर हाथ डालते हुए केजरीवाल ने उनको मोदी के हक में पूरी ताकत से एकजुट होने को ही प्रेरित किया। बहरहाल, केजरीवाल पार्टी से ज्यादा एक विचार के रूप में सामने आए थे। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और राहुल गांधी के साथ वे ही केंद्र में नजर आए। जीते ज्यादा नहीं, पर कई जगह उनके उम्मीदवार पार्टी की पहचान बनाने में सफल रहे। मतों का अहम हिस्सा उनकी झोली में भी आया है। दिल्ली में उनके मतों का प्रतिशत बढ़ा है। खुद नरेंद्र मोदी को बनारस में केजरीवाल ने नाकों चने चबाने वाली टक्कर दी। एक नई पार्टी के लिए अपनी पहचान को इतने कम समय में इतना विस्तार देना मामूली बात नहीं। हैरानी नहीं होनी चाहिए जो आने वाले दिनों में मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, करुणानिधि आदि दिग्गज नेताओं के बरक्स उनकी पहचान और पुख्ता हो।

इस घटाटोप में कांग्रेस के खेवनहार बनने वाले राहुल गांधी तो पार्टी के लिए बोझ ही साबित हुए हैं। वे पार्टी के उपाध्यक्ष बने, चुनाव समिति की कमान भी संभाली। वे पार्टी में साफ छवि के उम्मीदवारों के साथ नई बयार लाना चाहते थे। पर खूसट नेताओं के सामने उनकी शायद ज्यादा न चली। मोदी से कम, पर खर्चीले चुनाव प्रचार को निकले। भाषणों में उनके पास ठोस मुद्दे न थे। पार्टी के पुराने मुसलिम-आदिवासी ‘वोट बैंक’ में भी पराए सेंध मार गए। खुद के चुनाव क्षेत्र में बेड़ा पार लगाने के लिए उन्हें छोटी बहन- और पूर्णकालिक राजनीति में अनिच्छुक- प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर देखना पड़ा। ऊंच-नीच की राजनीति के जुमले छेड़ प्रियंका खबरों में रहीं, पर दोनों मिलकर भी मतदाताओं में एक विकल्प का भरोसा पैदा नहीं कर सके।

इस सब के बीच यह घड़ी अंतत: नरेंद्र मोदी को शिखर पर ले आई है। इसके श्रेय पर भाजपा का अपना दावा भले हो। पर पुरजोर दावा संघ ने किया है, जिसके स्वयंसेवकों ने पहली बार इस कदर जी-जान एक की। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी। वजह साफ थी कि पहली बार उनके भरोसे का स्वयंसेवक (वाजपेयी पर इतना भरोसा संघ बाद में कब करता था!) देश की कमान का दावेदार था, विशुद्ध रूप से संघ परिवार के काडर के भरोसे। इसी ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपने ही लोगों के बीच इतना शक्तिमान बनाया कि आडवाणी घर जा बैठे, मुरली मनोहर जोशी की सीट मोदी ने हथिया ली, सुषमा स्वराज राष्ट्रीय पटल से अपने चुनाव क्षेत्र भेज दी गईं, वेंकैया नायडू अंतर्धान मुद्रा में चले गए, जसवंत सिंह पार्टी से बाहर कर दिए गए। गडकरी-जेटली रास्ते पर चले। राजनाथ सिंह ने संघ की बंसी के सुर मोदी के इशारों के अनुरूप रखे। गुजरात के सबसे विवादास्पद नेता अमित शाह ‘साहेब’ की कृपा से और सबों से आगे जा बैठे। इसी के चलते मोदी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता के रूप में सामने आए हैं। यह मोदी की जीत है, मगर कहीं गहरे पार्टी की हार है।

मोदी का मानस कट्टर पहचान देता आया है। सेकुलर विचार उनके घेरे में शायद ही किसी को भाता हो। गोधरा के बाद का खूनखराबा अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। ‘मियां मुशर्रफ’ जैसे संबोधनों की शैली और राममंदिर उनकी विचार-पद्धति का अंग माने जाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने आप को संभाला है। क्या इनसे वे अपने आपको हमेशा के लिए ऊंचा उठा पाएंगे? बाजार को भी उनसे बड़ी आशाएं हैं। मनमोहन सिंह सरकार ढीली थी। दो-दो मंत्री बदलकर भी अंबानी को गैस के मनचाहे दाम न दे सकी। क्या मोदी देंगे? गैस महज एक कसौटी है। कारपोरेट की तो बहुत बड़ी झोली उनके सामने पसरी है।

लेकिन उससे बड़ा फलक जनता की उम्मीदों का है। महंगाई से लोग त्रस्त हैं। पड़ोसियों से तनाव के रिश्ते हैं। आतंकवाद रह-रह कर सिर उठाता है। विभिन्न समुदायों में आपसी सौहार्द वक्त की जरूरत है। इन सब मामलों में कुछ को चाहे मोदी से बहुत कम आशाएं हों, पर देश को उन्होंने बड़े सपनों में बांधा है। पर लोगों को बुलेट ट्रेन से ज्यादा अमन-चैन का जीवन यानी सांप्रदायिक सौहार्द चाहिए। आजाद भारत में अल्पसंख्यक भयभीत होकर कैसे जी पाएंगे। जीत के गाजे-बाजे और हाथी-घोड़ा-पालकी के बीच लाख टके का सवाल यह है कि क्या  इस विराट विजय के बाद मोदी अपना मानस बदलने को तैयार हैं? कमजोर विपक्षके बीच यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है। लोग उनसे रामराज्य यानी सुशासन की उम्मीद रखते हैं। मगर माईबाप संघ अभी से उन्हें राममंदिर और ऐसे ही संकीर्ण लक्ष्यों की याद दिलाने लगा है। देखते हैं देश को रामराज्य हासिल होता है या राममंदिर। या दोनों नहीं।

साभार : श्री ओम थानवी, संपादक – जनसत्ता

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