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फ़रवरी 11, 2011

रेगिस्तान में हिमपात : कविराज की पहली पुस्तक

और अंततः कविराज, जैसे कि पढ़ाई के जमाने से ही वे मित्रों में पुकारे जाते थे, की पहली पुस्तक प्रकाशित हो ही गयी। बीसियों साल लगे हैं इस पुण्य कार्य को फलीभूत होने में पर न होने से देर से होना बेहतर!

पहले कम्प्यूटर इंजीनियरिंग और बाद में मैनेजमेंट की पढ़ाई करके प्रबंधन के क्षेत्र में झण्डे गाड़ने की व्यस्तता के कारण उन्हे ऐसा मौका नहीं मिल पाया कि वे किताब प्रकाशित करा पाते । पर एक दिन किताब छपवाने का ख्याल फिर से आ गया तो उसने जाने का नाम ही नहीं लिया। सर पर चढ़ कर बैठ गया विचार कि इससे पहले की तुम और गंजे हो जाओ उससे पहले किताब छपवा लो। बस विचार के आगे समर्पण करके उन्होने अपने पुराने हस्तलिखित कागज ढूँढे। हिन्दी में टाइप करना सीखा और युद्ध स्तर पर कम्प्यूटर में अपनी पुरानी कवितायें टाइप करके संग्रहित कर दीं।

विरोधाभासी बातें एक ही कविता में कहना उनका एक खास गुण रहा है और इसीलिये उन्होने अपनी किताब का शीर्षक भी ’रेगिस्तान में हिमपात’ रखा है।

तब हॉस्टल के समय वे बैठे बैठे, चलते चलते, नहाते नहाते, खाते खाते  कवितायें उवाचते रहते थे, बल्कि उनके रुम मेट तो कहा करते थे कि यह बंदा नींद में भी कवितायें गढ़ता रहता है। एक बार तो ऐसे ही मित्रों ने किसी अवसर पर खुद खाना बनाने का आयोजन किया तो प्याज काटते काटते कविराज के मुख से सुर झड़ने लगे।

नैनों में अश्रु आये प्याज जो काटी हाये
ऐसे में कोई आके मोहे चश्मा लगा दे

कविता में कैसी भी तुकबंदी कर दें पर कविराज गाते बहुत अच्छा थे। किशोर के गीत को उनके जैसी आवाज में खुले गले से गाने की कोशिश करते और मुकेश के गीत को उनके जैसी विधा में।

वैसे तुकबंदी की प्रेरणा उन्हे अभिनेता प्राण से मिली। हुआ यूँ कि उन्होने दिल दिया दर्द लिया फिल्म देखी और प्राण के बचपन की भूमिका निभाने वाले बाल कलाकार के मुख से निकले एक  काव्यात्मक नारे ने उन्हे बहुत लुभाया था। वह पात्र दूध लेकर आये नौकर से गाकर कहा करता था

दूध नहीं पीना तेरा खून पीना है

कविराज को भी बचपन से ही दूध नापसंद था सो स्पष्ट है कि उन्हे उपरोक्त्त नारा पसंद आना था। हाँ खून पीने की बात उन्हे पसंद न आयी थी। सो उन्होने उसकी जगह चाय रख दी थी और अक्सर वे गुनगुनाते थे।

दूध नहीं पीना मुझे चाय पीनी है

और भी तमाम फिल्मों में प्राण कुछ न कुछ काव्यात्मक तकियाकलाम बोला करते थे और उनके अभिनय की यही बात कविराज को लुभा गयी। बाद में उन्होने प्राण के तरीके से ही बड़े अभ्यास के बाद सिगरेट के धुंये से हवा में छल्ले बनाना सीख लिया। हालाँकि वे धुम्रपान नहीं करते थे पर ऐसा करने वाले साथियों से कहते थे कि जब थोड़ी सी सिगरेट रह जाये तो मुझे छल्लों की प्रेक्टिस के लिये दे देना।

बकौल खुद उनके, कविता रचने के प्रति उनका प्रेम जीवन के पहले पहले प्रेम के कारण ही पनपा। आठवीं कक्षा में पढ़ते थे और साइकिल पर स्कूल जाते हुये उन्हे एक अन्य स्कूल की छात्रा से प्रेम हो गया। उनकी साइकिल बिल्कुल उसी गति और तरीके से चलने लगी जैसे कि उस लड़की की साइकिल के पहिये चलते।

घर में कविराज के पिता भी आरामकुर्सी पर आँखें बंद करके  देखा देखी बलम हुयी जाये गाती हुयी बेग़म अख्तर की आवाज में घंटों खोये रहते थे।

प्रेम का जीन तो पक्का पीढ़ी दर पीढ़ी जिंदा रहता है।

कविराज का प्रेम जब देखादेखी की हदों में सिमटने से इंकार करने लगा और पढ़ते हुये कॉपी किताबों के पन्नों में भी तथाकथित प्रेमिका का चेहरा दिखायी देने लगा और बैठे बैठे वे उसके ख्याल में खो जाने लगे तो उन्हे प्रेरणा मिली प्रेम पत्र लिखने की। कायदे से यही उनकी पहली रचना थी। दुनिया के बहुत बड़े बड़े लेखकों के लेखन की शुरुआत प्रेम पत्र लिखने से ही हुयी है।

तो शुरुआत उनकी गद्य से हुयी। करुण हास्य का बोध उन्हे इस प्रेम गाथा से गुजरने के बाद ही हुआ। बाद में वे खुद ही चटकारे लेकर अपने पहले प्यार की पहली चिट्ठी का हाथों लिखा और आँखों देखा हाल सुनाया करते थे।

कुछ पंक्त्तियाँ तो अभी भी याद आती हैं। उस जमाने में उन्हे लड़की की नाक बहुत पसंद थी। मुमताज़ उनकी पसंदीदा नायिका थीं और उनके जैसी ही नाक उस लड़की की भी थी। पत्र में उसके प्रति प्रेम को विस्तार से स्वीकारने की औपचारिकता के बाद उन्होने अपनी कल्पनाओं को प्रदर्शित करते हुये लिखा था कि वे उसकी नाक को अपनी नाक से छूना चाहते हैं

तब तो उन्हे पता न था कि संसार के बहुत सारे कबीले ऐसे हैं जहाँ नाक से नाक छुआकर प्रेम को प्रदर्शित किया जाता है।

हंसते हुये लड़की के गाल सुर्ख लाल हो जाया करते थे और उनके अनुसार उन्हे लाल अमरुद याद आ जाते थे। दुनिया के बहुत सारे लोगों की तरह उन्हे भी बचपन में सफेद से ज्यादा लाल रंग वाले अमरुद बहुत ज्यादा आकर्षित करते थे। लाल अमरुद उनके अंदर सौंदर्य बोध जगाता था जैसे कि बसंत में टेसू के फूल भी उन्हे आह्लादित कर जाते थे। नदी किनारे लगे अमलतास के पेड़ तो उन्हे इतना आकर्षित करते थे कि वे बहुत बार पेड़ से लटकी फूलों की झालरें तोड़ने के लिये नीचे नदी में गिर चुके थे। तैरना उन्हे थोड़ा बहुत आता था पर तैरने में कुशलता तो उन्होने अपनी इसी हरकत से हासिल की।

कहने का तात्पर्य यह है कि बचपन से ही वे कुदरती तौर पर एक प्रेमी थे। जिसे अंग्रेजी में कहा जाता है,” Ohh! By nature he was a romantic person”, ऐसे वे हुआ करते थे। अभी भी हैं।

प्रेम करना या प्रेम में होना उनके लिये बहुत जरुरी था। वे भी कहते थे और बहुत सारे मित्र इस बात से इत्तेफाक रखते थे कि भारत नामक देश में, खासकर हिन्दी भाषी प्रदेशों में, युवा लोग दो इच्छाओं का तहेदिल से पीछा करते हैं- एक थी किसी लड़की से प्रेम करना और दूसरी आई.ए.एस बनना। दूसरी इच्छा बहुत कठिन श्रम माँगती है तो उसे सम्भालने के लिये और जीवन की अन्य कठिनाइयों से उत्पन्न ऋणात्मक ऊर्जा को सम्भालने के लिये युवा प्रेम में आसरा खोजा करते थे। आजकल भी खोजा करते होंगे बस प्रेम अब कागजी और हवाई न रहकर देह से ज्यादा जुड़ गया है और अब जैसे भी हो जल्दी से जल्दी देह-सम्बंध बनाने की इच्छा कुलबुलाती रहती है।

बहरहाल कविराज ने कॉपी से पन्ने फाड़कर एक लम्बा सा रुक्का लिखा जिसमें उन्होने अपने पहले प्यार की सारी भावनायें बहा दीं और कई दिनों तक मौका तलाशते रहे कि लड़की उन्हे मिनट भर को भी अकेली मिल जाये। एक दिन सुबह स्कूल जाते हुये उन्हे ऐसा मौका मिल भी गया और उन्होने शीघ्रता से साइकिल लड़की की साइकिल के नजदीक लाकर रेलगाड़ी की रफतार से धड़कते दिल के साथ पत्र जेब से निकाला और हकलाते हुये लड़की से कहा,” तुम्हारे लिये है पढ़ लेना“।

चेहरा उनका डर के मारे लाल हो चुका था। पत्र को उसके हाथों में थमाकर उन्होने सरपट साइकिल दौड़ा दी।

दोपहर बाद स्कूल से लौटते हुये उसी जगह जहाँ उन्होने लड़की को पत्र सौंपा था एक बलिष्ठ युवक ने उन्हे रोका।

संयोग की बात कि इस घटना से पहले दिन उनके अंग्रेजी के अध्यापक ने सबको Aftermath शब्द का अर्थ समझाया था पर कविराज उसे समझ नहीं पाये थे। हो सकता है कि उनका अंतर्मन प्रेमिका के ख्यालों में गुम हो और उनकी इंद्रियाँ ज्ञान ग्रहण न कर पायीं। पर उस युवक के रोके जाने के बाद हुयी घटना और उसके बाद मन में उठने वाले भावों ने उन्हे अंग्रेजी के शब्द का अर्थ बखूबी समझा दिया। कहते भी हैं कि जीवन में स्व: अनुभव का बड़ा महत्व है।

उस शाम उनके विचलित मन में प्रथम बार काव्य का प्रस्फुटन हुआ और उन्हे कक्षा में पढ़ी काव्य पंक्तियों के अर्थ ऐसे समझ में आने लगे जैसे उनकी कुंडलिनी जाग्रत हो गयी हो।

वियोगी होगा पहला कवि विरह से उपजा होगा गान

जैसी पंक्त्तियों ने उनसे कहलवाया

वियोगी ही बन पाते हैं कवि विरह से ही उपजता है ज्ञान

तो उपरोक्त्त पंक्ति उनके द्वारा रची गयी पहली काव्यात्मक पंक्त्ति थी। पूरे चौबीस घंटे उनका दिमाग किसी और ही दुनिया में विचरण करता रहा। फिर जाने क्या हुआ कि उन्हे करुण – हास्य जैसे  मिश्रित भाव का बोध होने लगा। अगली रात के करीब दो बजे होंगे, जब पूरे मोहल्ले में शायद वे ही जाग रहे थे, उन्होने सिनेमा के परदे पर भावनात्मक रुप से लुटने-पिटने के बाद एक अजीब सी मुस्कान फेंकने वाले राज कपूर की भांति एक मुस्कान अपने चेहरे पर महसूस की और उनके हाथों में थमी कलम सामने मेज पर रखी कॉपी के पन्ने पर चलने लगी।

कलम रुकी तो उन्होने पढ़ा कि कुछ पंक्तियाँ पन्ने पर ठहाका मार रही थीं। उन्होने उन पंक्तियों को ऐसे पढ़ा जैसे कि इनका अस्तित्व उनके लिये अजनबी हो।

समझते रहे हम आज तक जिसे अपनी कविता
वह तो निकली सूरज पहलवान की बहन सविता
अब कभी न होने वाले साले ने, घुमा के थप्पड़ ऐसे मारे
लाल कर दिये गाल हमारे, आंखों में नचा दिये तारे

तो हास्य मिश्रित करुण भाव से यह उनका पहला साक्षात्कार था। पहले प्यार में खाये थप्पड़ों ने उन्हे यह साहस न करने दिया कि वे यह राज जान पाते कि कैसे लड़की के भाई को उनके प्रेम पत्र के बारे में पता चला। यह राज राज ही बना रहा और उन्हे सालों तक सालता रहा।

पहले प्यार ने उन्हे कवि बना दिया। बाद में उनकी लेखन प्रतिभा उन लोगों के बड़ी काम आयी जो प्रेम करने की जुर्रत तो कर बैठते थे पर प्रेम पत्र तो छोड़िये घर वालों को कुशल क्षेम का पत्र भी नहीं लिख पाते थे ऐसे सारे साक्षर अनपढ़ तथाकथित प्रेमियों के लिये प्रेम पत्र कविराज ही लिखा करते थे।

कविराज की काव्य रचने की क्षमता में सबसे खास बात थी कि जब ’बस दो मिनट’ जैसे विज्ञापन नूडल्स को भारतीयों पर थोप रहे थे वे मिनट भर में ही लुभाने वाली पंक्तियाँ लेकर हाजिर हो जाते थे। नारे बनाने में उनका कोई सानी न था।

सीनियर बुश ने इराक पर हमला किया और सैटेलाइट टी.वी की बदौलत जब दुनिया ने युद्ध का लाइव कवरेज देखा और भारत में बुश और सद्दाम हुसैन के पक्ष और विपक्ष में ध्रुवीकरण होने लगा तो उन्हे सद्दाम हुसैन से व्यक्तिगत कोई लगाव न था पर कविराज बुश की साम्राज्यवादी नीतियों के सख्त खिलाफ थे। एक रोज सुबह जब कुछ लोग जॉगिंग करते हुये नवाबगंज की दीवार के पास से गुजरे तो उन्होने बड़े बड़े अक्षरों में लिखा पाया

सद्दाम उतरे खाड़ी में बुश घुस गये झाड़ी में

बीती रात कविराज खाना खाने के बाद से कुछ घंटों के लिये गायब थे। लौटने पर उन्होने बताया था कि वे पास के सिनेमा हॉल में नाइट शो देखने गये थे।
पहले तो कभी वे अकेले फिल्म देखने न गये थे। उन्होने कभी स्वीकार न किया परंतु मित्रों को संदेह था कि बुश और सद्दाम हुसैन के ऊपर बनाया गया नारा उन्होने ही गढ़ा था।

ऐसा नहीं कि वे केवल तुकबंदी वाली कवितायें ही रचते थे। वे बेहद ज़हीन और संवेदनशील कवितायें भी रचते थे। बस उन्हे देख पाने का सौभाग्य उनके केवल दो मित्रों को ही मिला था और वह भी इस आश्वासन के बाद कि उनके इस संवेदनशील रुप की बात जाहिर न की जाये। वे अमिताभ बच्चन के चरित्रों जैसी दिलजलों वाली धीर-गम्भीर छवि ही बनाये रखना चाहते थे, ऐसा दिलजला जो कॉमेडी का सहारा तो लेता है पर अंदर से अकेला है।

कितने ही साथियों के प्रेम सम्बंध कविराज की लेखनी के कारण मजबूती के जोड़ से जीवित रहे। कितनों के प्रेम सम्बंध शादी की परिणति पा गये। यह संदेहास्पद है कि किसी भी साथी ने अपनी पत्नी पर कभी यह राज खोला होगा कि उसे लिखे जाने वाले उच्च कोटि के प्रेम पत्रों में उसका योगदान बस इतना था कि वह कविराज के लिये चाय, फिल्म और खाने का इंतजाम करता था।

कविराज की कवितायें कॉपियों, रजिस्टरों एवम डायरियों के पन्नों में बंद होती गयीं।

सालों बीत गये। साथी दुनिया में इधर उधर बिखर गये। ईमेल का पर्दापण हुआ तो सम्बंध फिर से स्थापित हुये और फिर ऊर्जा जाती रही तो त्योहारों और नव वर्ष आदि के अवसरों पर शुभकामनायें भेजने तक संवाद बने रहे। यादें तो यादें हैं कभी जाया नहीं करतीं, जीवन कितनी ही और कैसी ही व्यस्तताओं में क्यों न उलझा ले पर ऐसे मौके आते हैं जब बीते हुये की स्मृतियाँ पास आकर बैठ जाती हैं।

और जब एक रोज़ सूचना मिले कि आखिरकार कविराज की कवितायें छप ही गयीं और पुस्तक डाक से पहुँचने वाली है तो प्रसन्नता तो होती है भाई!

प्रसन्नता होनी लाजिमी है।

…[राकेश]

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