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नवम्बर 2, 2014

अरविंद केजरीवाल : रहस्य स्टील के गिलास का

AKHungerstrikeअरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, और गोपाल राय, सैंकड़ों अन्य स्वयंसेवकों के साथ 25 जुलाई July 2012 को भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ SIT घोषित करने की मांग के साथ अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गये| अरविंद केजरीवाल के मधुमेह के रोगी होने के कारण बहुत से लोग उनके अनशन करने के निर्णय से चिंतित थे| अनशन न करने के लोगों हजारों लोगों के अनुरोध एवं मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों की चेतावनी को दरकिनार कर अरविंद अपने फैसले पर अडिग रहे और अनशन पर बैठ गये|

मैं मधुमेह रोग का विशेषज्ञ चिकित्सक हूँ और मुझे पता था कि वे एक जिद्दी रोगी हैं और उनका एलोपैथिक पद्धति पर कम और नेचुरोपैथी (प्राकृतिक चिकित्सा) पर ज्यादा विश्वास है| एक चिकित्सक के नाते मेरे लिए वे पहले ही catabolic अवस्था के मरीज थे, और उनका शुगर लेवल कुछ समय से अनियंत्रित था, और यह तय था कि अगर वे उपवास पर जाते हैं तो ketosis का ख़तरा उन पर छायेगा ही छायेगा|

उनके अनशन से पहले मुझे बहुत सी मेडिकल सामग्री पढनी पड़ी यह सीखने के लिए कि अगर मधुमेह का रोगी उपवास करता है तो उसकी शारीरिक स्थितियों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है| कुछ ऐसी रिपोर्ट्स थीं जहां मधुमेह के रोगी लम्बी भूख हड़ताल के बावजूद जीवित बच गये| मैं अरविंद के लगातार संपर्क में था और जंतर मंतर पर उनके अनशन के दौरान उनके साथ रहने के लिए सहमत था| Dr Atul Gupta (Anesthesiologist) और Dr Vipin Mittal (dentist) अरविंद और अन्य उपवासियों की देखभाल कर रही मेडिकल टीम के मुखिया थे| दोनों फोन के दवारा निरंतर मेरे संपर्क में थे, क्योंकि उपवास के तीन दिनों तक मुझे जयपुर में ही रुकना पड़ा जहां मेरे कुछ साथी अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर जमे हुए थे|

28 जुलाई 2012 को सुबह-सवेरे ही मैं जंतर-मंतर पहुँच गया| मैंने अरविंद की जांच की और उनकी मेडिकल स्थिति की ताजा रपटें पढीं| जैसा कि अपेक्षित था वे ketosis की अवस्था में पहले ही आ चुके थे| सुनीता केजरीवाल (अरविंद की धर्मपत्नी), ड़ा. मित्तल, और रणसिंह आर्य (प्राकृतिक चिकित्सक) मेरे साथ थे और मधुमेह रोग का विशेषज्ञ होने के नाते मैं उन्हें अरविंद की मेडिकल स्थिति और संभावित खतरों के बारे में समझा रहा था| एलोपेथिक चिकित्सा की परिभाषा से वे पहले ही उस स्थिति में पहुँच चुके थे जहां उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाना जरूरी था, हालांकि वे बाहर से ठीक दिखाई दे रहे थे और आत्मविश्वास से भरे हुए थे पर उनकी मेडिकल जांच रपट में ketone का स्तर बहुत ज्यादा था| अरविंद को अस्पताल में भर्ती करे जाने के लिए तैयार करना बहुत कठिन था, वे जब तक कि बेहोश न हो जाएँ तब तक वहाँ से हटने को तैयार नहीं थे| हमारे पास उस समय तक उन पर निगाह रखने के सिवा कोई चारा नहीं था जब तक कि वे गंभीर रूप से बीमार न हो जाएँ| ड़ा. मित्तल को सांत्वना मिली यह जानकर कि मैं उपवास के खत्म होने तक चौबीसों घंटे वहाँ रहूंगा और अरविंद की मेडिकल स्थितियों पर नजर रखूंगा| चिकित्सक की दृष्टि से देखूं तो यह एक चमत्कार ही था कि अरविंद अगले एक हफ्ते तक अनशन पर डटे रहे|

अरविंद के राजनीतिक विरोधियों ने उनकी मेडिकल स्थितियों और मधुमेह के बावजूद अनशन जारी रखने के बारे में कई कहानियां उडानी शुरू कर दीं| सोशल मीडिया पर उनके स्टील के गिलास को चर्चाओं का केन्द्र बनाया गया| क्योंकि अरविंद कैमरे पर स्टील के गिलास में पानी पीते दिखाए गये थे तो उनके विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया कि स्टील के गिलास में जीवन रक्षक द्रव अरविंद को दिया जा रहा था अगर ऐसा न होता तो वे पारदर्शी शीशे के गिलास में पानी पीते| मुझे अब तक आरोप आश्चर्य में डालता है अगर अरविंद स्टील के गिलास में छिपा कर लिक्विड डायट ग्रहण करते तो उन्हें यह सरेआम कैमरों के सामने करने की क्या जरुरत थी?

बहरहाल इन् फिजूल बातों से अलग यह बात मार्के की है कि बिगड़े हुए मधुमेह के रोगी होने के बावजूद वे कैसे 10 दिनों से ज्यादा समय तक अनशन करके जीवित रह पाए?

उनके उपवास की तैयारियां तकरीबन एक माह पूर्व शुरू हो चुकी थीं| हम जैसे एलोपैथिक चिकित्सक ऐसे मामलों से सबन्धित साहित्य पढ़ रहे थे और प्राकृतिक चिकित्सकों की टीम उनके शरीर को एक लंबे उपवास के योग्य बनाने में जुटी हुयी थी| तथ्यात्मक रूप से अगर अरविंद इतने लंबे उपवास के बावजूद बच पाए तो इस एक कारण से कि उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सकों दवारा उनके लिए तैयार किये गये प्रोटोकोल का पूरी तरह से पालन किया| अरविंद का विश्वास एलोपैथी पर नहीं था और हम वहाँ केवल किसी आपातकालीन स्थिति से निबटने के लिए उपस्थित थे| हमने उनके स्वास्थ्य का नियमित रिकार्ड बनाया और मीडिया को इसके बारे में नियमित रूप से अपडेट करते रहे| प्राकृतिक चिकित्सकों की टीम अनुभवी थी और मधुमेह के रोगियों के उपावास को पहले संभाल चुकी थी| बल्कि उन्होंने यह तक दावा किया कि वे लमने उपास के माध्यम से ही मधुमेह के कुछ रोगियों को ठीक कर चुके थे| उनकी तैयारी अच्छी और उनका आत्मविश्वास दृढ़ दिखाई देता था|

प्राकृतिक चिकित्सकों ने उपवास से एक माह पहले अरविंद की डायट को इस तरीके से संचालित किया जिससे उनका शरीर भरपूर मात्रा में प्रोटीन ग्रहण कर सके और उनके भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा न्यूनतम हो| इस डायट से संभावना थी कि उनके शरीर की पाचन व्यवस्था anabolic अवस्था की ओर अग्रसारित होगी| जब उन्होंने उपवास शुरू किया अताब तक उनके शरीर में प्रोटीन की अच्छी खासी मात्रा संचयित हो चुकी थी और अब तक उनका शरीर भोजन में कार्बोहाइड्रेट के निम्न स्तर का आदि हो चुका था|

अरविंद एरोबिक्स, योग और प्राणायाम के संयुक्त प्रोटोकोल (तीनों एक एक घंटे की अवधि के लिए) का भली भान्ति पालन कर रहे थे| व्यायाम और प्राणायाम के इस संयुक्त कार्यक्रम ने उनके शरीर की Insulin संवेदनशीलता को बढ़ाया होगा और beta cell function में बढोत्तरी की होगी| इसी अनुशासन के कारणउपवास के शुरुआती दिनों में glycemic नियंत्रण स्थायी रहा जबकि उनकी मधुमेह की दवाइयां बंद की जा चुकी थीं| वास्तव में उनकी सारी anti-diabetic medicines उपवास से कुछ दिन पहले ही बंद कर डी गई थीं और ऐसा करना इसलिए उपवास के दौरान hypoglycemia की स्थिति न उत्पन्न हो जाए|

उपवास के दौरान शरीर में एक उचित हाइड्रेशन बनाए रखने के लिए उन्हें समुचित मात्रा में पानी पीने के लिए दिया गया| शरीर में हाइड्रेशन का स्तर अच्छा बनाए रखने के साथ पानी का काम उपवास के कारण शरीर में उत्पन्न ketone को बाहर निकाल भी था| उपवास के दौरान, जब कि रोगी को खाना नहेने दिया जाता तो उसके शरीर में जमा वसा (फैट) ऊर्जा देने के काम आती है| पर इस क्रिया के दौरान Ketone bodies भी उत्पन्न हो जाती हैं जो शरीर के लिए बेहद हानिकारक हैं|

समुचित हाइड्रेशन स्तर बनाए रखने के साथ साथ शरीर से ketone bodies और अन्य toxins को बाहर निकालने के लिए अरविंद को प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण तरीके कुंजल और एनिमा भी दैनिक स्तर पर अपनाने पड़े|

अरविंद की शारीरिक गतिविधियों को न्यूनतम स्तर पर नियंत्रित करके कैलोरीज के खर्च होने पर नियंत्रण पाया गया| उन्हें न ताली जा सकने वाली बिल्कुल आवश्यक गतिविधियों से ज्यादा चलने फिरने नहीं दिया गया| कैलोरीज क्रचने के स्तर को नियंत्रित करके ketone bodies के उत्पन्न होने को नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि अब वसा की कम मात्रा शरीर में पचाई जा रही है|

उनकी शारीरिक जांच नियमित रूप से की जा रही थी और उनके शरीर की बायोकमिस्ट्री भी नियमित जांची जा रही थी| उन्हें नियमित रूप से जांच के लिए खून के सैम्पल देने में एतराज था| उपवास के अंतिम पांच दिन एलोपैथी में विश्वास करने वाले सभी लोग बेहद चिंतित हो चले थे| उनका ketones का स्तर 4+ और 5+ के बीच झूल रहा था, electrolytes असामान्य अवस्था में थे और अंतिम 3 दिनों में bilirubin भी बढ़ना शुरू हो गया था| लेकिन रपट में इन् सब आकंडों में लगातार वृद्धि होने से शरीर के लगातार कमजोर होते रहने के बावजूद अरविंद पूरी तरह से जीवंत थे और अपने निश्चय पर अडिग|

उपवास के छठवें दिन ketone bodies का स्तर स्थायीत्व को प्राप्त कर गया और उससे ज्यादा नहीं बढ़ा| उस समय तक उनके शरीर ने शायद सारे संचित फैट का क्षय कर लिया था, और नके शरीर की कैलोरीज की आपूर्ति के लिए प्रोटीन्स टूट गये थे और यह यूरिक एसिड लेवल के बढे होने से भी सिद्ध हो रहा था|

सरकारी डाक्टरों की एक टीम अरविंद की जांच करने आई और उन्होंने दबाव डाला कि अरविंद को अविलम्ब अस्पताल में भर्ती करवाना चाहिए| हमारे डाक्टरों की टीम तब तक अरविंद के अपने विश्वास में अपना विश्वास समाहित कर चुकी थी और सब अरविंद के समर्थन में खड़े रहे| जीवन और मृत्यु का मामला आते ही कोई भी चिकित्सक तनिक भी ख़तरा नहीं उठाना चाहता| सरकारी डाक्टरों ने वही सलाह डी थी जो मैंने उपवास के चौथे दिन अरविंद को दे थी| भोपाल से आए हुए cardiologist, Dr Ayyar, ने भी यही सलाह दी|

चौबीसों घंटे जंतर मंतर पर उपस्थित देशभक्ति के गीत गाते, उन पर झूमते, और तिरंगा लहराते दीवाने लोगों और स्वयंसेवकों के मध्य हम लोग भी केवल मेडिकल जांच रपटों पर ही विश्वास करने वाले चिकित्सक न रहकर उन जैसे आम भारतीय ही बन चुके थे, जिनका प्रारब्ध पर पूर्ण विश्वास था|

मैं 2 अगस्त के शाम को जीवन भर नहेने भूल सकता जब अन्ना हजारे ने घोषित किया कि अरविंद एवं साथी अगले दिन उपवास तोड़ देंगें| मेरे हाथ में अरविंद की नवीनतम मेडिकल रपट थी और उनका serum pottasium 3.2,(सामान्य स्तर 3.5-5 meq/l) था| Hypokalemia एक बेहद खतरनाक स्थिति है और उनके स्तर खतरनाक स्थिति की ओर जा रहे थे| Further drop in Potassium के स्तर में और घटोत्तरी का मतलब था एकदम से ह्रदय समस्या के खतरे का उत्पन्न होना|

मैं उस जगह गया जहां अरविंद को रखा गया था| वे उस वक्त अकेले थे| मैंने उन्हें potassium के कम स्तर के बारे में सूचित किया और इससे होने वाले खतरों के प्रति सचेत किया| मैंने उनके सामने तर्क दिया – “अन्ना पहले ही देश के सामने घोषित कर चुके हैं कि उपवास कल टूट जायेगा और हम लोग देश को एक राजनीतिक विकल्प देने जा रहे हैं तो आज की रात के खतरे को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा| जब कल उपवास टूटना ही है तो आज की रात आपके जीवन को खतरे में डालने का क्या मतलब है| अगर आप थोड़े से नारियल पानी का सेवन कर लें तो potassium का स्तर सामान्य हो सकता है, और आपके जीवन से एक बड़ा ख़तरा टल सकता है और नारियल पानी के सेवन से आपका उपवास भी नहीं टूटेगा| इसे आपद-धर्म समझा जाए”|

अरविंद ने कहा,

“ड़ा. पारिख, मैं ईश्वर को धोखा नहीं दे सकता, हम दोनों के सिवा यहाँ कोई और नहीं है पर ईश्वर तो हमारे साथ सदैव ही है| अन्ना ने कहा है कि उपवास कल टूटेगा तो यह कल ही टूटेगा उससे पहले नहीं| चाहे जो कुछ भी मेरे साथ हो जाए, और चाहे मेरा निश्चय सार्थक न लगता हो, पर मैं मुँह से कुछ भी ग्रहण नहीं करूँगा जब तक कि कल अन्ना घोषणा न कर दें”|

क्या उन्हें जिलाए हुए था तमाम प्रतिकूल शारीरिक परिस्थितियों में? क्या रहस्य था स्टील के गिलास का? ये रहस्य हैं – कर्म में दृढ़ विश्वास, लक्ष्य में पूर्ण आस्था और अगर आवश्यकता हो तो अंतिम त्याग करने की पूर्ण तैयारी|
जंतर मंतर पर व्यतीत किये गये सात दिनों में मैं मुश्किल से ही सो पाया और उस रात तो मैं एक झपकी तक न ले पाया| Potassium के घटते स्तर का ग्राफ मेरी आँखों के सामने तैरता रहा| लेकिन, यह आदमी- अरविंद केजरीवाल, जिसे यह विश्वास नहीं था कि वह अगली सुबह जीवित उठ पायेगा या नहीं, शान्ति से अपने बिस्तर पर सो रहा था|
अगले दिन, अरविंद के उपवास तोड़ने के बाद, जयपुर जाने के लिए जंतर मंतर से निकलने से पहले मैं भीड़ से घिरे अरविंद के पास गया| मैंने उनके कक्ष के दरवाजे से उनकी ओर हाथ हिलाया और अरविंद ने मुझे अंदर बुलाया और बाहें खोल कर मुझे गले लगा लिया| मेरे सब्र का बाँध टूट गया और उनकी बाहों में बंध कर मैं एक बच्चे की भांति फूट-फूट कर रो पड़ा| मैं इस भावुकतापूर्ण क्रंदन के पीछे कोई कारण नहीं खोज पाता| यही वे क्षण थे जब मैं एक बहुत बड़े तनाव और दबाव से मुक्त हुआ| मेरे कन्धों पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी एक ऐसे आदमी की मेडिकल देखरेख की जिसे लाखों भारतीय युवा प्रेम करते हैं और जिसकी ओर समूचा देश आशा भरी दृष्टि से देख रहा था| हर क्षण उनका जीवन ईश्वर की दया के वश लगता था जबकि बाकी लोगों का विश्वास था कि उनकी देखरेख एक कुशल चिकित्सक के हाथों हो रही है| शायद इसी दबाव से मुक्ति आंसुओं के रास्ते बह निकली|

 

[ड़ा. राकेश पारिख]

मूल लेख

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नवम्बर 24, 2013

अंतस के परिजन: एक डॉक्टर की डायरी

antasमनुष्य जीवित है तो उसका साथ शारीरिक और मानसिक कष्टों और रोगों से होता ही रहेगा और ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सिक से दूरी तो रह नहीं सकती| किसी भी विधा में अभ्यास करता हो चिकित्सिक, चाहे वह वैध हो, हकीम हो, एलोपेथिक डॉक्टर हो या होमियोपैथी से इलाज करता हो, वह हर काल में समाज का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है|

जीने से मनुष्य का अगाध मोह है और एक ही नहीं हजारों भगवद गीता रच दी जाएँ, सामूहिक स्तर पर  मनुष्य जीवन से इस मोह को मिटाना संभव नहीं है और लाखों-करोड़ों में से कोई एक ही जीवन और शरीर के मोह से ऊपर उठ पाता है| जीने के प्रति इस गहरे भाव के कारण ही मनुष्य के लिए चिकित्सक ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व करता है| वही है जो उसे मौत के मुँह में से भी खींच लाता है और उसकी काया से रोगों को दूर भगाने में उसकी सहायता करता है उसका पथ –प्रदर्शक बनता है| इस आदर के कारण मानव की चिकित्सिक से अपेक्षायें भी बहुत ज्यादा होती हैं| बीमारी की हालत में चिकित्सिक के वरदहस्त में पहुँचते ही रोगी को आशा बांधने लगती है कि अब शायद वह अच्छा हो जायेगा और फिर से जीवन की ओर वापस करेगा|

असल जीवन में नर्स बोलते ही मानव के मन मस्तिष्क में Florence Nightingale नाम तैरने लगता है| डा. कोटनिस एक त्यागमयी चिकित्सिक के रूप में मनुष्य को देवता स्वरूप लगते आए हैं|

साहित्य, नाटक और फ़िल्में जैसी विधाएं भी चिकित्सक के विभिन्न चरित्रों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करती रही हैं, उनमें से कुछ ऐसे चरित्र हैं जिनकी अच्छाइयों के कारण वे दर्शक के मनमानस में गहरे जाकर बैठ जाते हैं|

कौन भूल सकता है आनंद फिल्म के डा. भास्कर बनर्जी, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपने बेहद अच्छे अभिनय से जीवंत किया था, को जो अपने पास आने वाले रोगियों को कभी भी गलत सलाह नहीं देता और चिकित्सीय पेशे की ईमानदारी उसके लिए खुद की कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उसी के साथी लोगों से छल करके धनी बनते रहते हैं वह ईमानदारी का दामन पकडे रखता है| खामोशी फिल्म की नर्स राधा (वहीदा रहमान) को क्या भुलाया जा सकता है जो अपने को नर्स होने के दायित्व के प्रति इस कदर समर्पित कर देती है कि मानसिक संतुलन खो बैठती है|

भारत जैसे विकासशील देश में तो चिकित्सक वाकई ईश्वर का ही एक रूप लगता है| लोगों की भावनाएं किस तरह चिकित्सक से जुडी रहती है इसके लिए कुछ वर्ष पूर्व प्रदर्शित हुयी हिंदी फिल्म- मुन्नाभाई एम्.बी.बी.एस, याद की जा सकती है| एक महाबली, पर सह्रदय गुंडे की भावनाओं से जनता की भावनाओं का मेल ज्यादा गहरे स्तर पर होता है न कि एक कठोर ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर के अनुशासन से| धोखे से मेडिकल कालेज में प्रवेश लेकर पढ़ रहे गुंडे के वचन और दयालू कर्म जनता के अंतर्मन को भिगो देते हैं और बहुत पढ़ा लिखा, बहुत बड़ा डॉक्टर जो मेडिकल कालेज का प्रिंसिपल भी है खलनायक लगने लगता है क्योंकि उसके पास भावना नाम के चीज है ही नहीं| रोगी इंसान है ही नहीं उसके लिए|

मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह चिकित्सा के क्षेत्र में भी अच्छे और बुरे दोनों किस्म के व्यक्ति मिलते हैं पर मनुष्य की चिकित्सक पर निर्भरता कुछ इस कदर गहरी है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हम सिर्फ और सिर्फ अच्छे मनुष्यों को ही देखना चाहते हैं| प्रेमचंद की कहानी “मंत्र” का डा. चड्ढा, घमंडी और रोगी के प्रति असंवेदनशीलता से भरा हुआ होने के कारण एक खलनायक है और जब मन्त्रों से सर्पदंश का इलाज करने वाला, डा. चड्ढा की असंवेदनशीलता और दुर्व्यवहार का शिकार होकर अपने इकलौते पुत्र को खोने वाला, बूढ़ा भगत, डा. चड्ढा के पुत्र को मौत के मुँह से निकाल लाता है और डा. चड्ढा भोर की हल्की रोशनी में बूढ़े भगत को पहचान कर शर्मिन्दा होते हैं तो जीवन में केवल अच्छे चिकित्सकों से ही मिलने की आस लगाए पाठक ही नहीं विजेता महसूस करते बल्कि पूरी मानवता जीतती हुयी प्रतीत होती है|

जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में भी ईमानदारी और मूल्यों का बहुत बड़ी मात्रा में ह्रास हुआ है| ऐसे ऐसे किस्से मिल जाते हैं पढ़ने-देखने को जहां पैसे के लिए चिकित्सिक ने अपने व्यवसाय में उतरने से पहले ली गयी कसम को तो भुलाया ही मानवता को भी भुला दिया और अपनी आँखों के सामने मरीज को मर जाने दिया पर उसका इलाज करना शुरू न किया क्योंकि मरीज के परिवार वाले उसकी फीस भरने में असमर्थ थे| ऐसे भी मामले प्रकाश में आए हैं जहां चिकित्सिक मरीज के शरीर से अंग निकाल लिए हैं किसी और धनी मरीज को जीवनदान देने के लिए और गरीब मरीज गरीबी का शाप भोगने को विवश रहकर विकलांग जीवन जीने को भी विवश हो जाता है|

हालत ऐसी हो गयी है कि बीस-बीस साल के अनुभव के बाद भी चिकित्सक कहते पाए जा सकते हैं कि उन्होंने नई “दुकान” खोली है|

दुकान!

क्लीनिक और डिस्पेंसरी अब अनुभवी चिकित्सकों तक के लिए भी दुकान बन गये हैं|

साहित्य ने मरीजों की तरफ से लिखी गयी सामग्री प्रस्तुत की है, अगर साहित्यकार खुद मरीज बन गया है तो उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से अच्छा साहित्य दुनिया को दिया है| रशियन

Aleksandr Solzhenitsyn ने Cancer Ward जैसे कालजयी उपन्यास की भेंट दुनिया को दी| लेखकों ने दूर से देखे या पूर्णतया कल्पित चिकित्सक चरित्रों की रचना भी की है और उनमें से बहुत से विश्वसनीय भी लगते हैं| पर तब भी उन्होंने चरित्र के उन्ही भागों का वर्णन किया है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित है और उनके व्यवसाय से सतही सामग्री ही सामने आती रही है| ऐसे में ऐसा तो लगता ही है कि अगर किसी चिकित्सक में लेखकीय गुण भी हों तो उसका लेखन बेहद विश्वसनीय तरीके से इस क्षेत्र का गहराई से वर्णन कर पायेगा|

डा. भवान महाजन की स्व:अर्जित अनुभवों से सम्पन्न मराठी पुस्तक – मैत्र-जिवाचे, उस ओर एक कदम है|

अशोक बिंदल, जो अपनी तरह के एक अलग ही कला -दीवाने, कवि एवं लेखक हैं, ने मराठी मूल की पुस्तक को हिंदी में इस तरह प्रस्तुत किया है कि “अंतस के परिजन” कहीं से भी अनुवादित किताब होने का आभास नहीं देती|

मरीज, उनके नाते-रिश्तेदार, चिकित्सक का त्रिकोण रोगी और चिकित्सा के हर मामले से सम्बंधित पाया जाता है और “अंतस के परिजनतीनों प्रकार के चरित्रों को पाठक के सम्मुख लाती है|

एक उम्र होती है जब पाठक हर किस्म की पुस्तक पढ़ने के लिए लालायित रहता है क्योंकि उसमें नये से नया पढ़ने की भूख होती है और उतना पढ़ने की ऊर्जा और समय भी| उम्र के साथ पाठक चुनींदा साहित्य ही पढ़ने लग जाते हैं क्योंकि समय अन्य कामों में भी लगने लगता है, ऊर्जा में कमतरी होने लगती है| ऐसे में जब तक कोई बहुत ही किसी पुस्तक की चर्चा न करे, ऐसा संदेह रहता है कि हर पाठक हर किस्म की पुस्तक अपने आप पढ़ ही लेगा|

“अंतस के परिजन की चर्चा किसी तक न पहुंचे तो ऐसा नहीं कि पाठक दरिद्र रह जाएगा पर अगर वह इसे पढ़ ले तो जीवन में सवेदनशीलता के थोड़ा और नजदीक आएगा|

हरेक व्यक्ति कभी न कभी या तो स्वयं बीमार पड़ता है या किसी नजदीकी व्यक्ति की तीमारदारी करता है और इस नाते उसका पाला चिकित्सक से पड़ता ही पड़ता है और लगभग हरेक व्यक्ति को चिकित्सक से मुठभेड़ का कोई न कोई अनुभव जरुर ही होता है| अब यह अनुभव खट्टा भी हो सकता है, मीठा भी और कड़वा भी|

“अंतस के परिजन सब तरह के अनुभवों को समेटती है|

ये डा. भवान महाजन के चिकित्सीय जीवन के संस्मरण हैं जहां देहात के इलाकों में वे भिन्न-भिन्न किस्म के मरीजों से मिले, उनके नाते-रिश्तेदारों से मिले अलग अलग किस्म के रोगों से सीमित साधनों के बावजूद जूझे|

एक सरल, और सहज भाषा में अशोक बिंदल ने डा. महाजन के संस्मरण हिंदी में प्रस्तुत किये हैं| डा. महाजन ने न केवल मोती-माणिक सरीखे मरीजों का वर्णन किया है जिनसे मिलकर कोई भी अंदर से अच्छा महसूस करेगा बल्कि ऐसे मरीजों और उनके रिश्तेदारों का भी वर्णन किया है जो किसी भी चिकित्सक को भलमनसाहत का रास्ता छोड़ देने पर विवश कर दें| ऐसे चिकित्सक भी इस पुस्तक में हैं जो चिकित्सा के क्षेत्र की दैवीय छवि को दीमक की तरह से नष्ट कर रहे हैं और जो इस बात का लिहाज भी नहीं करते कि उनका मरीज उनके ही हमपेशा चिकित्सक का करीबी है| वे प्रेमचंद द्वारा रचित डा चड्ढा के आधुनिक अवतार ही लगते हैं, जिनके लिए उनके सुख और ऐश्वर्य मरीज के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं|

पुस्तक में शामिल संस्मरण पाठक को अंदर तक छू जाते हैं|

ऐसी पुस्तक को कम से कम छोटे परदे पर एक धारावाहिक के रूप में जरुर अवतरित होना चाहिए|

पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी यहाँ प्राप्त की जा सकती है|

एक संस्मरण भोर को यहाँ पढ़ा जा सकता है|

अंतस के परिजन” के बारे में कुछ लेखों एवं कवियों के वचन|

गुलज़ार लिखते हैं –

अशोक बिन्दल ने कमाल किया। पढ़ कर ये नहीं लगता कि ये किसी और का अनुभव है जो वो अपनी ज़बान में बता रहे हैं।

विश्वनाथ सचदेव कहते हैं |

अनुवाद सृजन से कम महत्वपूर्ण और कम मुश्किल नहीं होता | पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे अशोक बिंदल ने काम बड़ी आसानी से किया है | मराठी में इस पुस्तक की काफी प्रशंसा हुई है | मुझे विश्वास है हिंदी-जगत में ही वैसा ही स्नेह सम्मान मिलेगा…

बालकवि बैरागी लिखते हैं|

‘अंतस के परिजन’ मैं पढ़ गया | अच्छे संस्मरण यदि ऐसी सलिल भाषा में मिल जाएं तो मन भीग ही जाता है | डा. श्री भवान महाजन ने अशोक बिंदल के माध्यम से प्रभावित किया…

कवि नईम लिखते हैं|

अंतस के कई परिजनों ने रुला दिया | उनसे एक उनसियत हो गई जैसी डा. भवान महाजन को उनसे थी | लेखक की आत्मीयता के ये पात्र हैं बल्कि लेखक इतना आत्मीय अंतस का नहीं होता, तो इन्हें पुनर्जीवित नहीं कर सकता था| कमोबेश उसी भावावेश में हिचकोले खाते हुए अशोक ने भावानुवाद किया है…..

…[राकेश]

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