Posts tagged ‘Akaash’

दिसम्बर 18, 2014

बच्चे स्कूल जा रहे हैं…

हुआ सवेरा
ज़मीन पर फिर अदब से
आकाश अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
नदी में स्नान करके सूरज
सुनहरी मलमल की पगडी बाँधे
सड़क किनारे खड़ा हुआ
मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
हवाएँ सर-सब्ज़ डालियों में
दुआओं के गीत गा रही हैं
महकते फूलों की लोरियाँ
सोते रास्तों को जगा रही हैं
घनेरा पीपल गली के कोने से
हाथ अपने हिला रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
फ़रिश्ते निकले हैं रोशनी के
हर एक रस्ता चमक रहा है
ये वक़्त वो है
ज़मीं का हर एक ज़र्रा
माँ के दिल सा धड़क रहा है
पुरानी इक छत पे वक़्त बैठा
कबूतरों को उड़ा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
(निदा फाजली)

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फ़रवरी 5, 2014

काई जम गई इंतज़ार की मुंडेर पे

इस सावन में बरसी आँखें

काई जमी इंतज़ार की मुंडेर पे

रखे हाथ कंपकपाते हैं

सब कुछ छूट जाने को जैसे

पैरों के नीचे से ज़मीन

बहुत गहरी खाई हो गयी

आँखे पता नहीं किसके लिए

आकाश ताकती हैं…

साँसों की आदमरफ्त रोक के

जिसको फुर्सत दी सजदे के लिए

उस खुदा को और बहुत

एक मेरी निगहबानी के सिवा…

मुझे कोई गिला नहीं…

शिकवा कमज़र्फी है…

हाथ कंपकपाते ज़रूर हैं

अभी मगर फिसले नहीं हैं…

Rajnish sign

अप्रैल 18, 2011

उसकी याद में

गोरे गाल पर
चुम्बन का निशान
कितनी देर ठहरता है
फूल का दिल चीर कर
लम्हों में
उड़ जाती है शबनम
मेरी दोस्त
तुम भी थी
चाँदनी की नाज़ुक रूह
तुम्हे धूप में मरना ही था

गमले में खिला हुआ फूल
पल–पल मुरझाता है
उसने भी
मेरी बाहों में
तिल-तिल मर के
दम तोड़ दिया
मजबूर और बेबस मैं
वक्त को कब पकड़ पाया

मुझसा बेदर्द कौन होगा
माटी के अँधेरे घर में
सुला कर उसे
आंसू और गुलाब सजा कर
कब्र के पास बैठा हूँ
चुपचाप
सदा के लिए

माँ कहती थी
मरने वाले
आकाश में
जगमग तारे बन जाते हैं
शहर की चकाचौंध में
आकाशगंगा कब दिखती है
गांव लौट रहा हूँ
जहाँ
अब भी आकाश निर्मल है
तेरी कब्र के पास

लम्हों की सवारी पर
जारी है जिंदगी का सफर
साथ था सलोना एक हमराही
जो छोड़ कर
मुझे दरबदर
सौंप गया दिन-रात की आवारगी
न राह है अब न मंजिल कोई
रूठी हुई है मुझसे
बेवफा मौत भी

(रफत आलम)

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