Posts tagged ‘Ahsaas’

नवम्बर 9, 2013

तुम आयी थीं क्या?

stars-001यही कोरा सफ़ेद कागज़ है जहाँ

हर रोज़ मुझे अकेला छोड़ जाती है तू

तेरे जाने के बाद भी बहुत देर तलक

मैं अंधेरों में जुगनू तलाशा करता हूँ

कुछ अहसास तेरे  होने का

आ आ के टटोलता रहता हूँ…

गाल पे सूखे हुए आंसुओं के निशान की तरह

मेरी उँगलियों के निशान इस की शिनाख्त करते हैं

मैं हर रोज़ सोचता हूँ कि इस

सफ़ेद कोरे कागज़ पे

तेरी नीली हंसी टांक दूँ

तेरी आवाज़ पिरो दूँ इसमें

हर शाम तेरे आने तक फिर सुनूँ

तेरी मखमली आवाज़ इंतज़ार को कुछ

रंगीन कर दे शायद…

वरना इस अँधेरे में

जुगनू की चमक क्या रंग देगी…

कुछ छोड़ जाया कर इस मोड़ पे हर रोज़

कुछ गर्म साँसे उतार कर अपनी

कुछ अपनी महक…

कुछ उजाले अपनी आँखों के

मैं हर दफा कुछ बहाने से इधर आता हूँ

पूछ जाता हूँ कि तुम आयी तो नहीं…

तुम आयी थीं क्या?

(रजनीश)

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नवम्बर 8, 2013

चलो एक बार फिर से मिल जाएँ हम

मेरी  सारी  हसरतें…  lovers-001

सारी तमन्नाएँ…

मेरे सारे अरमान…

मेरे सारे सपने

सिल गए हैं …

अस्तित्व से तुम्हारे ही

तुम मेरे शब्-ओ-रोज़ के हर लम्हे में

देखे अनदेखे

ख्वाबों की चलती फिरती तस्वीर हो…

कहे अनकहे लफ़्ज़ों की जिंदा तासीर हो…

मैं शुरू होता हूँ

हर सुबह तुम से…

ख़त्म हो जाता हूँ हर शब तुम में ही…

ढूंढता रहता हूँ तुम्हारे  होठों का स्पर्श…

अपनी उँगलियों  के पोरों  में

तलाशती  रहती हैं आँखें सीने पे

तुम्हारी गर्म साँसों के निशाँ हर लम्हा…

अहसास तुम्हारी छुअन का जिंदा रहता है

मुझमे हर पल…

रखता है मुझे जिंदा हर पल…

आओ

दूरियां समेट दें अपने जिस्मों की हम

संगम हो

मेरे  तुम्हारे वजूद का

ऐसे कि

बहे ज़िन्दगी लहू में फिर से…

वैसे भी तो तुम्हारा प्यार गरम लावे सा

समेटे रखता है मुझे अपने में

बन के चादर गर्म अहसासों  की बिछा रहता है

पूरी तरह मुझ पे …

पूरी पूरी रात …

पूरा पूरा दिन…

(रजनीश)

अप्रैल 19, 2013

पकड़ो मत! जकड़ो मत!

या तो पकडे बैठे रहो,
जकड़े बैठे रहो,
पर तब
हर पल का,
हर कदम का,
हर गति का,
हर इशारे का,
हिसाब लगाते रहना होगा|

और तय है यह भी कि
इस पकडन में,
इस जकडन में,
ऐठन भी होगी,
तनाव भी होगा,
तंगी का अहसास भी होगा|

समय लाएगा ही लाएगा
घुटन भी,
विचलन भी,
विवशता भी,
और असली अलगाव भी|

असली मुक्ति,
पकड़ने से मुक्त रहने में है,
स्वतंत्रता,
जकड़ने से दूर रहने में है,
स्वायत्ता,
अपने साथ बंधी
पकडन,
और जकडन से
भी परहेज करने में है|

विकल्प हमेशा है-
या तो जकडन और पकडन
के रास्ते हैं –
जहां भीड़ है,
सबके साथ खड़े होने,
सबके साथ होने
के अहसास हैं,
पर समय ही
यह अहसास भी कराता है
कि ये साथ झूठे हैं,
नकली हैं,
तनाव और दुख के जन्मदाता हैं,
या फिर रास्ते हैं
आनंद के,
पर इन पर चलने की शर्त वही –
पकड़ो मत!
जकड़ो मत!

[राकेश]…

मार्च 17, 2011

ज़िंदगी फकत एक लहर लम्हों की (रफत आलम)

कौन रोया किसकी आँख पानी हुई
दीवाना मर गया खत्म कहानी हुई

जिंदगी क्या थी वक्त के समंदर में
एक लहर लम्हों की आनी जानी हुई

अपने आप झुकने लगे बाप के कंधे
घर में बिटिया जब कोई सयानी हुई

ईमानदारी का सबक सुन के बाप से
आज के बच्चों को बहुत हैरानी हुई

रसूख का पैमाना है घूस या घोटाला
चोरी हुई साहब ये के हुक्मरानी हुई

बेगुनाह प्यार को बेसबूत जला दिया
झुकने नहीं दी गाँव ने मूँछ तानी हुई

मज़हब कई थे पर मज़हबी कोई नहीं
बंदगी हुई हमसे या जाने शैतानी हुई

अहसास के आंसू हैं ये अर्थहीन शब्द
आलम हमसे कब गज़ल-ख्वानी हुई

(रफत आलम)

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