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फ़रवरी 8, 2017

कलिंग … श्रीकांत वर्मा

एक ही काल, समय और स्थान पर उपस्थित सभी मानवों के ऊपर एक ही बात का असर एक जैसा नहीं होता, बल्कि एक ही कृत्य में शामिल सभी कर्मियों का शामिल होना एक समान नहीं होता, बाहर से भले ही एक जैसा दिखाई दे पर भीतर से एक जैसा कतई नहीं होता| सब अपने तईं किसी घटना में सम्बंधित होते हैं, हो पाते हैं| सभी अपनी अपनी संवेदना, अपमे बोध के स्तर या अपनी नींद सी खुमारी की तीव्रता के कारण किसी बात से अलग- अलग ही स्तरों पर प्रभावित होते हैं| जकड़ना और छोड़ना, जकड़ना और फिर छोड़ना या छोड़ना और फिर पकड़ना, ये सारी प्रक्रियाएं निर्भर करती हैं कि कर्ता कितनी गहराई से इनसे जुड़ा हुआ था| आधे अधूरे स्तर पर पकडने वाले से छूटेगा भी हल्का सा ही, अपनी पूरी शक्ति से पूरी एकाग्रता से जकड़ने वाला ही छोड़ कर बंधन से मुक्ति पा सकता है, तभी सतह पर तैरते साधू पार नहीं हो पाते जीवन भर जबकि जिसे अपराधी या पापी कहता है समाज, वह एक झटके में पार हो जाता है, क्योंकि उसने अँधेरे को पकड़ा तो हुआ था पर जब इसे छोड़ प्रकाश में आया तो समूचा ही आया, कुछ भी उसने फिर अँधेरे में रहने नहीं दिया|

कवि श्रीकांत वर्मा ने अशोक, जिसे दुनिया कलिंग में भयंकर नरसंहार करके विजय प्राप्त करने वाले चक्रवर्ती सम्राट अशोक के रूप में याद रखती है, और जिसे इसलिए भी इतिहास याद रख पाया है कि उसने हिंसा को छोड़ा तो अहिंसा को गले लगा लिया, के बहाने इसी पूर्ण समाहित होने की बात को अपनी कविता “कलिंग में कहा है| लड़े तो अशोक के साथ उसके हजारों सैनिक, पर विरक्ति केवल अशोक को हुयी, बोधि की तरफ रुझान केवल अशोक का हुआ, क्योंकि उसने हिंसा का पूरा वर्तुल पूरा करके शांति और अहिंसा की ओर कदम बढ़ाए| उसने जो किया पूरे मन से किया|

केवल अशोक लौट रहा है

और सब

कलिंग का पता पूछ रहे हैं|

केवल अशोक सिर झुकाए हुए है

और सब

विजेता की तरह चल रहे हैं|

केवल अशोक के कानों में

चीख गूँज रही है|

और सब

हँसते-हँसते दोहरे हुए जा रहे हैं|

केवल अशोक ने शस्त्र रख दिए हैं|

केवल अशोक

लड़ रहा था|

(श्रीकांत वर्मा)

 

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सितम्बर 14, 2015

बुद्ध, महावीर, अहिंसा और मांसाहार : ओशो

प्रश्न: आपने कहा कि बाह्य आचरण से सब हिंसक हैं। आपने कहा कि बुद्ध और महावीर अहिंसक थे। बुद्ध तो मांस खाते थे, वे अहिंसक कैसे थे?

ओशो

मेरा मानना है कि आचरण से अहिंसा उपलब्ध नहीं होती। मैंने यह नहीं कहा कि अहिंसा से आचरण उपलब्ध नहीं होता। इसके फर्क को समझ लीजिए आप। हो सकता है कि मैं मछली न खाऊं। लेकिन इससे मैं महावीर नहीं हो जाऊंगा। लेकिन यह असंभव है कि मैं महावीर हो जाऊं और मछली खाऊं। इस फर्क को आप समझ लें। आचरण को साध कर कोई अहिंसक नहीं हो सकता, लेकिन अहिंसक हो जाए तो आचरण में अनिवार्य रूपांतरण होगा।
दूसरी बात यह कि मैंने बुद्ध और महावीर को अहिंसक कहा, लेकिन बुद्ध मांस खाते थे। बुद्ध मरे हुए जानवर का मांस खाते थे। उसमें कोई भी हिंसा नहीं है। लेकिन महावीर ने उसे वर्जित किया किसी संभावना के कारण। जैसा कि आज जापान में है। सब होटलों के, दूकानों के ऊपर तख्ती लगी हुई है कि यहां मरे हुए जानवर का मांस मिलता है।

अब इतने मरे हुए जानवर कहां से मिल जाते हैं, यह सोचने जैसा है। बुद्ध चूक गए, बुद्ध से भूल हो गई। हालांकि मरे हुए जानवर का मांस खाने में हिंसा नहीं है, क्योंकि मांस का मतलब है कि मार कर खाना। मारा नहीं है तो हिंसा नहीं है। लेकिन यह कैसे तय होगा कि लोग फिर मरे हुए जानवर के नाम पर मार कर नहीं खाने लगेंगे! इसलिए बुद्ध से चूक हो गई है और उसका फल पूरा एशिया भोग रहा है।

बुद्ध की बात तो बिलकुल ठीक है, लेकिन बात के ठीक होने से कुछ नहीं होता; किन लोगों से कह रहे हैं, यह भी सोचना जरूरी है। महावीर की समझ में भी आ सकती है यह बात कि मरे हुए जानवर का मांस खाने में क्या कठिनाई है। जब मर ही गया तो हिंसा का कोई सवाल नहीं है। लेकिन जिन लोगों के बीच हम यह बात कह रहे हैं, वे कल पीछे के दरवाजे से मार कर खाने लगेंगे। वे सब सज्जन लोग हैं, वे सब नैतिक लोग हैं, बड़े खतरनाक लोग हैं। वे रास्ता कोई न कोई निकाल ही लेंगे, वे पीछे का कोई दरवाजा खोल ही लेंगे।

मैं बुद्ध और महावीर दोनों को पूर्ण अहिंसक मानता हूं। बुद्ध की अहिंसा में रत्ती भर कमी नहीं है। लेकिन बुद्ध ने जो निर्देश दिया है, उसमें चूक हो गई है। वह चूक समाज के साथ हो गई है। अगर समझदारों की दुनिया हो तो चूक होने का कोई कारण नहीं है।

 ओशो (महावीर या महाविनाश)

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