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नवम्बर 15, 2013

आओ शोलों की तरह जलें…

रातें काली ही होतीं मेरी nightfire-001

अगर

तेरे बदन की लौ उन्हें रौशन न करती…

हर रात तू जलती है साथ मेरे शमा की मानिंद

और सुलगता हूँ मैं  परवाने की तरह

ये रोज का धीमे-धीमे,

अधूरा अधूरा सा जलना

धुआँना गीली- सीली लकड़ी सा

हर रात,

पिछली गर्म रात को उतारना खूँटी से

और ओढ़ लेना कुछ देर भर को

छोड़ देता है कितने अरमानो को धुंआ धुंआ

कब तक यूँ भड़कने से रोकोगी बोलो…

आओ एक रात इन बेचैन दो जिस्मो को

लिपट जाने दो एक दूसरे से ऐसे

कि खूब शोलों की तरह जलें रात भर

सुबह होने न दें फिर…

आओ न एक बार…

(रजनीश)

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जून 5, 2013

अधूरे काम…मरने से रहे (रघुवीर सहाय)

या तो हिन्दुस्तानी कुछ मामलों में भोले होते हैं या अति चालाक| जीवन भर जिसे शातिर और निकम्मा, एक नंबर का आलसी, हमेशा अपना हित देखने वाला, मानते रहते हैं उसके मरते ही उसकी शान में कसीदे कढने शुरू कर देते हैं और ऐसा लगने लगता है कि मानों हाल ही में मृत आदमी से महान कोई अन्य व्यक्ति मुश्किल से ही धरती पर निकट के वर्षों में जन्मा होगा| नेताओं में तो यह बीमारी बहुत ज्यादा पाई जाती है| कवि रघुवीर सहाय ने दलीय राजनीति का भी स्वाद कुछ बरस चखा (आपातकाल के आसपास और उस दौरान) पर कवि की दृष्टि तो वे राजनीति में जाकर भी छोड़ न पाए होंगे| उनकी एक कविता मनुष्य की इसी दोगली बात को नग्न करती है|

दो बातें मरने पर कहते हैं

-वह अमर रहे

और

-उसे बहुत कुछ करना था|

किसी को भी लो और मार दो

और यह पाओगे

कि उसे बहुत काम करना था|

पर कौन जानता है कि

वह उन्हें क्यों नहीं कर रहा था

काम जो हम चाहते हैं करें,

पर स्थगित करते रहते हैं

बर्बर लोगों की तरह कर नहीं डालते

ऐसे अधूरे काम

जिनकी याद मरने का बाद आती है

कौन जानता है

क्यों अच्छी तरह सोचे भी नहीं गये|

(रघुवीर सहाय)

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