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सितम्बर 14, 2015

शाकाहारी बनाम मांसाहारी भोजन : ओशो

Osho kidआदमी को, स्वाभाविक रूप से, एक शाकाहारी होना चाहिए, क्योंकि पूरा शरीर शाकाहारी भोजन के लिए बना है। वैज्ञानिक इस तथ्य को मानते हैं कि मानव शरीर का संपूर्ण ढांचा दिखाता है कि आदमी गैर-शाकाहारी नहीं होना चाहिए। आदमी बंदरों से आया है। बंदर शाकाहारी हैं, पूर्ण शाकाहारी। अगर डार्विन सही है तो आदमी को शाकाहारी होना चाहिए।

अब जांचने के तरीके हैं कि जानवरों की एक निश्चित प्रजाति शाकाहारी है या मांसाहारी: यह आंत पर निर्भर करता है, आंतों की लंबाई पर। मांसाहारी पशुओं के पास बहुत छोटी आंत होती है। बाघ, शेर इनके पास बहुत ही छोटी आंत है, क्योंकि मांस पहले से ही एक पचा हुआ भोजन है। इसे पचाने के लिये लंबी आंत की जरूरत नहीं है। पाचन का काम जानवर द्वारा कर दिया गया है। अब तुम पशु का मांस खा रहे हो। यह पहले से ही पचा हुआ है, लंबी आंत की कोई जरूरत नहीं है। आदमी की आंत सबसे लंबी है: इसका मतलब है कि आदमी शाकाहारी है। एक लंबी पाचनक्रिया की जरूरत है, और वहां बहुत मलमूत्र होगा जिसे बाहर निकालना होगा।

अगर आदमी मांसाहारी नहीं है और वह मांस खाता चला जाता है, तो शरीर पर बोझ पड़ता है। पूरब में, सभी महान ध्यानियों ने, बुद्ध, महावीर, ने इस तथ्य पर बल दिया है। अहिंसा की किसी अवधारणा की वजह से नहीं, वह गौण बात है, पर अगर तुम यथार्थतः गहरे ध्यान में जाना चाहते हो तो तुम्हारे शरीर को हल्का होने की जरूरत है, प्राकृतिक, निर्भार,प्रवाहित। तुम्हारे शरीर को बोझ हटाने की जरूरत है; और एक मांसाहारी का शरीर बहुत बोझिल होता है।

. जरा देखो, क्या होता है जब तुम मांस खाते हो: जब तुम एक पशु को मारते हो, क्या होता है पशु को, जब वह मारा जाता है? बेशक, कोई भी मारा जाना नहीं चाहता। जीवन स्वयं को लंबाना चाहता है, पशु स्वेच्छा से नहीं मर रहा है। अगर कोई तुम्हें मारता है, तुम स्वेच्छा से नहीं मरोगे। अगर एक शेर तुम पर कूदता है और तुमको मारता है, तुम्हारे मन पर क्या बीतेगी? वही होता है जब तुम एक शेर को मारते हो। वेदना, भय, मृत्यु, पीड़ा, चिंता, क्रोध, हिंसा, उदासी ये सब चीजें पशु को होती हैं। उसके पूरे शरीर पर हिंसा, वेदना, पीड़ा फैल जाती है। पूरा शरीर विष से भर जाता है, जहर से। शरीर की सब ग्रंथियां जहर छोड़ती हैं क्योंकि जानवर न चाहते हुए भी मर रहा है। और फिर तुम मांस खाते हो, वह मांस सारा विष वहन करता है जो कि पशु द्वारा छोड़ा गया है। पूरी ऊर्जा जहरीली है। फिर वे जहर तुम्हारे शरीर में चले जाते हैं।

वह मांस जो तुम खा रहे हो एक पशु के शरीर से संबंधित था। उसका वहां एक विशेष उद्देश्य था। चेतना का एक विशिष्ट प्रकार पशु-शरीर में बसता था। तुम जानवरों की चेतना की तुलना में एक उच्च स्तर पर हो, और जब तुम पशु का मांस खाते हो, तुम्हारा शरीर सबसे निम्न स्तर को चला जाता है, जानवर के निचले स्तर को। तब तुम्हारी चेतना और तुम्हारे शरीर के बीच एक अंतर मौजूद होता है, और एक तनाव पैदा होता है और चिंता पैदा होती है।

व्यक्ति को वही चीज़ें खानी चाहिए जो प्राकृतिक हैं, तुम्हारे लिए प्राकृतिक। फल, सब्जियां , मेवे आदि, खाओ जितना ज्यादा तुम खा सको। खूबसूरती यह है कि तुम इन चीजों को जरूरत से अधिक नहीं खा सकते। जो कुछ भी प्राकृतिक है हमेशा तुम्हें संतुष्टि देता है, क्योंकि यह तुम्हारे शरीर को तृप्त करता है, तुम्हें भर देता है। तुम परिपूर्ण महसूस करते हो। अगर कुछ चीज अप्राकृतिक है वह तुम्हें कभी पूर्णता का एहसास नहीं देती। आइसक्रीम खाते जाओ, तुमको कभी नहीं लगता है कि तुम तृप्त हो। वास्तव में जितना अधिक तुम खाते हो, उतना अधिक तुम्हें खाते रहने का मन करता है। यह खाना नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया जा रहा है। अब तुम शरीर की जरूरत के हिसाब से नहीं खा रहे हो; तुम केवल इसे स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ नियंत्रक बन गई है।

जीभ नियंत्रक नहीं होनी चाहिए, यह पेट के बारे में कुछ नहीं जानती। यह शरीर के बारे में कुछ भी नहीं जानती। जीभ का एक विशेष उद्देश्य है: खाने का स्वाद लेना। स्वाभाविक रूप से, जीभ को परखना होता है, केवल यही चीज है, कौन सा खाना शरीर के लिए है, मेरे शरीर के लिए और कौन सा खाना मेरे शरीर के लिए नहीं है। यह सिर्फ दरवाजे पर चौकीदार है; यह स्वामी नहीं है, और अगर दरवाजे पर चौकीदार स्वामी बन जाता है, तो सब कुछ अस्तव्यस्त हो जाएगा।

अब विज्ञापनदाता अच्छी तरह जानते हैं कि जीभ को बरगलाया जा सकता है, नाक को बरगलाया जा सकता है। और वे स्वामी नहीं हैं। हो सकता है तुम अवगत नहीं हो: भोजन पर दुनिया में अनुसंधान चलता रहता है, और वे कहते हैं कि अगर तुम्हारी नाक पूरी तरह से बंद कर दी जाए, और तुम्हारी आंखें बंद हों, और फिर तुम्हें खाने के लिए एक प्याज दिया जाए, तुम नहीं बता सकते कि तुम क्या खा रहे हो। तुम सेब और प्याज में अंतर नहीं कर सकते अगर नाक पूरी तरह से बंद हो क्योंकि आधा स्वाद गंध से आता है, नाक द्वारा तय किया जाता है, और आधा जीभ द्वारा तय किया जाता है। ये दोनों नियंत्रक हो गए हैं। अब वे जानते हैं कि : आइसक्रीम पौष्टिक है या नहीं यह बात नहीं है। उसमें स्वाद हो सकता है, उसमें कुछ रसायन हो सकते हैं जो जीभ को परितृप्त भले ही करें मगर शरीर के लिए आवश्यक नहीं होते।

आदमी उलझन में है, भैंसों से भी अधिक उलझन में। तुम भैंसों को आइसक्रीम खाने के लिए राजी नहीं कर सकते। कोशिश करो!

एक प्राकृतिक खाना…और जब मैं प्राकृतिक

कहता हूं, मेरा मतलब है जो कि तुम्हारे शरीर की जरूरत है। एक बाघ की जरूरत अलग है, उसे बहुत ही हिंसक होना होता है। यदि तुम एक बाघ का मांस खाओ तो तुम हिंसक हो जाओगे, लेकिन तुम्हारी हिंसा कहां व्यक्त होगी? तुमको मानव समाज में जीना है, एक जंगल में नहीं। फिर तुमको हिंसा को दबाना होगा। फिर एक दुष्चक्र शुरू होता है।

जब तुम हिंसा को दबाते हो, तब क्या होता है? जब तुम क्रोधित, हिंसक महसूस करते हो, एक तरह की जहरीली ऊर्जा निकलती है, क्योंकि वह जहर एक स्थिति उत्पन्न करता है जहां तुम वास्तव में हिंसक हो सकते हो और किसी को मार सकते हो। वह ऊर्जा तुम्हारे हाथ की ओर बहती है; वह ऊर्जा तुम्हारे दांतों की ओर बहती है। यही वे दो स्थान हैं जहां से जानवर हिंसक होते हैं। आदमी जानवरों के साम्राज्य का हिस्सा है।

जब तुम गुस्सा होते हो, तो ऊर्जा निकलती है और यह हाथ और दांत तक आती है, जबड़े तक आती है, लेकिन तुम मानव समाज में जी रहे हो और क्रोधित होना हमेशा लाभदायक नहीं है। तुम एक सभ्य दुनिया में रहते हो और तुम एक जानवर की तरह बर्ताव नहीं कर सकते। यदि तुम एक जानवर की तरह व्यवहार करते हो, तो तुम्हें इसके लिए बहुत अधिक भुगतान करना पड़ेगा और तुम उतना देने को तैयार नहीं हो। तो फिर तुम क्या करते हो? तुम हाथ में क्रोध को दबा देते हो, तुम दांत में क्रोध को दबा देते हो, तुम एक झूठी मुस्कान चिपका लेते हो और तुम्हारे दांत क्रोध को इकट्ठा करते जाते हैं।

मैंने शायद ही कभी प्राकृतिक जबड़े के साथ लोगों को देखा है। वह प्राकृतिक नहीं होता, अवरुद्ध, कठोर क्योंकि उसमें बहुत ज्यादा गुस्सा है। यदि तुम किसी व्यक्ति के जबड़े को दबाओ, क्रोध निकाला जा सकता है। हाथ बदसूरत हो जाते हैं। वे मनोहरता खो देते हैं, वे लचीलापन खो देते हैं, क्योंकि बहुत अधिक गुस्सा वहां दबा है। जो लोग गहरी मालिश पर काम कर रहे हैं, उन्हें पता चला है कि जब तुम हाथ को गहराई से छूते हो, हाथ की मालिश करते हो, व्यक्ति क्रोधित होना शुरू होता है। कोई कारण नहीं है। तुम आदमी की मालिश कर रहे हो और अचानक वह गुस्से का अनुभव करने लगता है। यदि तुम जबड़े को दबाओ, व्यक्ति फिर गुस्सा हो जाता हैं। वे इकट्ठे किए हुए क्रोध को ढोते हैं। ये शरीर की अशुद्धताएं हैं: उन्हें निकालना ही है। अगर तुम उन्हें नहीं निकालोगे तो शरीर भारी रहेगा।

 

ओशो (The Essence of Yoga)
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अगस्त 26, 2015

स्वेच्छा-मृत्यु का अधिकार हो, आत्महत्या का नहीं, : ओशो

oshoमेरा एक और सुझाव है:

स्वेच्छा-मरण, युथनेसिया

जिस प्रकार हम जन्म को नियंत्रित कर रहे हैं संतति निरोध के द्वारा, मैं तुम्हें एक और शब्द देता हूं: मृत्यु-निरोध, डेथ-कंट्रोल। लेकिन कोई भी देश मृत्यु निरोध के लिए तैयार नहीं है। एक विशिष्ट उम्र के बाद जब कोई व्यक्ति अपना जीवन भरपूर जी चुका हो, उसकी कोई जिम्मेवारी न हो और अब वह मरना चाहता हो…एक तरह से वह अपने आप पर एक बोझ ही है, फिर भी उसे मजबूरन जीना पड़ता है क्योंकि कानून आत्महत्या के खिलाफ है।

मेरा सुझाव है, यदि तुम मरने की औसतन आयु सत्तर या अस्सी या नब्बे साल मानते हो तो आदमी को चिकित्सा समिति से यह पूछने की स्वतंत्रता होनी चाहिए: “मुझे अपने शरीर से मुक्त होना है।” यदि वह और जीना नहीं चाहता क्योंकि उसने काफी जी लिया है, तो ऐसा करने का उसे पूरा हक है। जो भी करना था वह सब उसने कर लिया। और अब उसे कैंसर या टी.बी. से नहीं मरना है, उसे बस विश्रामपूर्ण ढंग से मरना है।

प्रत्येक अस्पताल में एक विशेष स्थान हो, उसका खास कर्मचारी वर्ग हो, जहां लोग आ सकते है और तनाव-रहित होकर, सुंदरता से, बिना किसी रोग के, चिकित्सा व्यवसाय के सहारे मृत्यु में लीन हो सकते हैं।

यदि चिकित्सा समिति सोचती है कि वह व्यक्ति कीमती है या वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, तब फिर उससे और कुछ समय तक जीने का अनुरोध किया जा सकता है। केवल थोड़े से लोगों से ही यहां कुछ देर अधिक रहने की प्रार्थना की जा सकती है क्योंकि उनसे मानवता को इतनी मदद मिल सकती है, अन्य लोगों की इतनी सहायता हो सकती है। लेकिन वे लोग भी यदि जीने से इनकार कर दें तो वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। तुम उनसे पूछ सकते हो, प्रार्थना कर सकते हो। और यदि वे स्वीकार करते हैं तो ठीक है,लेकिन अगर वे कहें, “नहीं, अब हमें और नहीं जीना है”, तो निश्चित ही उन्हें मरने का पूरा अधिकार है।

किसी बच्चे की जान बचाना समझ में आता है, लेकिन तुम वृद्ध लोगों को क्यों बचा रहे हो जो जी चुके हैं, काफी जी चुके हैं, दुख भोगा, सुख भोगा, सब तरह के अच्छे-बुरे काम किए? अब समय आ गया है-उनको जाने दो।

लेकिन डाक्टर उन्हें नहीं जाने देते क्योंकि वह अवैध है।

उनका आक्सीजन और अन्य जीवनदायी उपकरण वे लोग निकाल नहीं सकते। इसलिए तुम मरणासन्न या अधमरे लोगों की जान बचाए चले जाते हो।

कोई पोप आदेश जारी नहीं करता कि इन लोगों को शरीर से मुक्त होने की अनुमति दी जाए। और उनके शरीरों में बचा ही क्या है? किसी के पैर कटे हैं, किसी के हाथ कटे हैं, किसी का हृदय काम नहीं कर रहा है इसलिए उसकी जगह बैटरी काम कर रही है, किसी के गुरदे काम नहीं कर रहे हैं इसलिए उनके लिए यंत्र लगे हैं। लेकिन इन लोगों का मकसद क्या है? अगर तुम उन्हें इस ढंग से बनाए रखोगे तो भी वे क्या करने वाले हैं?

हां, ज्यादा से ज्यादा वे कुछ लोगों को काम दिलाते हैं, बस। लेकिन वे कौन सा रचनात्मक जीवन जीने वाले हैं? और उनके साथ जो किया जा रहा है उससे उन्हें क्या सुख मिलने वाला है? उन्हें निरंतर इंजेक्शन दिए जा रहे हैं। उन्हें नींद नहीं आती इसलिए नींद की गोलियां दी जा रही हैं। वे जाग नहीं सकते इसलिए उनके खून में एक्टिवेटर (उत्तेजक)दिए जा रहे हैं ताकि वे जाग जाएं। लेकिन किसलिए? उस पाखंडी शपथ के लिए? पाखंडी भाड़ में जाएं। उसे कुछ खयाल नहीं था कि उसकी शपथ क्या गजब ढाने वाली है।

दवाइयों की बजाय, उस मरते हुए आदमी को ध्यान सिखाने के लिए ध्यानी चाहिए क्योंकि अब दवा की नहीं, ध्यान की जरूरत है-कैसे शिथिल हो जाए और शरीर से विदा हो जाए।

प्रत्येक अस्पताल में ध्यानी होने चाहिए, वे अत्यंत आवश्यक हैं-उतने ही जितने कि डाक्टर।

अब तक ध्यानियों की जरूरत नहीं थी क्योंकि एक ही काम था: जान बचाना। अब काम दोहरा हो गया है: लोगों की मरने में सहायता करना। हर विश्वविद्यालय में एक विभाग हो जहां ध्यान सिखाया जाए ताकि लोग स्वयं तैयार हों। जब मरने का समय आ जाए तो वे पूरी तरह से तैयार हो जाएं-आनंद से, उत्सव मनाते हुए।

लेकिन आत्महत्या अपराध है। इसे आत्महत्या समझा जाएगा और लोग कहेंगे कि मैं सबको गैर-कानूनी बातें सिखा रहा हूं।

मेरी उत्सुकता है सत्य में, कानून में नहीं।

सत्य यह है कि तुमने प्रकृति को, जीवन को असंतुलित किया है। उसका संतुलन उसे वापस लौटा दो।

मेरा सुझाव है, एक आंदोलन शुरू किया जाए ताकि जब लोग काफी जी चुके हैं और वे अपने शरीर से मुक्त होना चाहते हैं तो अस्पतालों में सुविधापूर्ण, सुखद मृत्यु का प्रबंध हो सके। यह बिलकुल स्वस्थ दृष्टिकोण है कि हर अस्पताल में एक विशेष कक्ष होना चाहिए जहां सब सुविधाएं हों ताकि मृत्यु एक सुखद, आनंदपूर्ण अनुभव बन जाए।

[ओशो]

दिसम्बर 11, 2013

जो हो रहा है वह रुकता नहीं, हो ही जाता है : ओशो

Osho-Mahaveer
ओशो सदेह उपस्थित होते तो आज 11 दिसम्बर को अपनी आयु के 82 साल पूरे कर रहे होते| उनकी सदेह उपस्थिति के समय भी कुछ हजारों को छोड़ बाकी संसार का उनसे मिलना उनकी किताबों, ऑडियो टेपों और वीडियो टेपों के द्वारा ही होता था सो उस लिहाज से उनके देह त्याग का उनकी सार्थकता पर कोई असर नहीं पड़ा है और उनकी सार्थकता बढ़ती ही जा रही है| उनसे परिचय न हो तो आदमी केवल नाम और उस नाम की छवि के बारे में प्रचलित धारणाओं से प्राभावित हो कैसे भी विचार उनके बारे में बनाए रख सकता है और रखता है पर देर सिर्फ उनसे एक मुलाक़ात की होती है फिर हरेक व्यक्ति का जीवन दो खण्डों में बंटता है, ओशो से मिलने से पहले ओशो से मिलने के बाद| कोई स्वीकार न करे यह अलग बात है पर ओशो उसे प्रभावित न करें ऐसा संभव है नहीं|

ओशो ने धरती पर मानव जीवन में जो भी और किसी भी काल में श्रेष्ठ घटा या उत्पन्न हुआ उसे समय की गर्त से निकाल आधुनिक मानव के समक्ष आज की समझदारी के हिसाब से रखा और आज की जरुरत के अनुसार अपने अस्तित्व के अंदर से नया भी जन्माया|

जो कार्य शुरू हो गया वह रुकता कभी नहीं| वह क्रिया अपनी पूर्णता को अवश्य ही प्राप्त करती है भले ही शुरू करने वाला व्यक्ति परिदृश्य से अनुपस्थित हो जाए|

एक अन्य महत्वपूर्ण बात वे ज्योतिष को समझाते हुए कहते हैं कि जो हमें अभी दिख रहा है या जैसा हमने विगत में घाटे के अनुसार समझा है केवल वही सत्य नहीं है सत्य तभी पूर्ण होता है जब वह भूत,वर्तमान और भविष्य के तीनों कालखंडों में पूर्ण आकार के साथ देख लिया जाए| भविष्य हमसे अज्ञात है इसलिए हमें पूर्ण सत्य के दर्शन होने बहुत मुश्किल होते हैं| भूत ने ही नहीं वर्तमान को रचा है बल्कि भविष्य में से भी कुछ है जो बात को, घटना को एक निश्चित आकार दे रहा है|

जीवन में बहुत सारी घटनाओं के सन्दर्भ में इस बात को समझा जा सकता है|

ओशो महावीर के जीवन के सहारे अपनी बात कहते हैं|

महावीर के जीवन में एक घटना का उल्लेख है, जिस पर एक बहुत बड़ा विवाद चला। और महावीर के अनुयायियों का एक वर्ग टूट गया। और पाँच सौ महावीर के मुनियों ने अलग पंथ का निर्माण कर लिया उसी बात से। महावीर कहते थे जो हो रहा है वह एक अर्थ में हो ही गया है। अगर आप चल पड़े तो एक अर्थ में पहुंच ही गए।  अगर आप बूढ़े हो रहे है तो एक अर्थ में बूढ़े हो ही गए।

      महावीर कहते थे, जो हो रहा है, जो क्रियमाण है—वह हो ही गया। महावीर का एक शिष्‍य वर्षा काल में महावीर से दूर जा रहा था। उसने अपने एक शिष्‍य को कहा कि मेरे लिए चटाई बिछा दो। उसने चटाई बिछानी शुरू की। मुड़ी हुई, गोल लिपटी हुई चटाई को उसने थोड़ा सा खोला, तब महावीर के उस शिष्‍य को ख्‍याल आया कि ठहरो, महावीर कहते है—जो हो रहा है वही हो ही गया। तू आधे में रूक जा, चटाई खुल तो रही है, लेकिन खुल नहीं गयी है—रूक जा।
      उसे अचानक ख्‍याल हुआ कि यह तो महावीर बड़ी गलत बात कहते हे। चटाई आधी खुली है, लेकिन खुल कहां गई है। उसने चटाई वहीं रोक दी। वह लौटकर वर्षा काल के बाद महावीर के पास आया और उसने कहा कि आप गलत कहते है कि जो हो रहा है, वह हो ही गया। क्‍योंकि चटाई अभी भी आधी खुली रखी है—खुल रही थी, लेकिन खुल नहीं गई। तो मैं आपकी बात गलत सिद्ध करने आया हूं। महावीर न उससे जो कहा,वह नहीं समझ पाया होगा, वह बहुत बुद्धि का राह होगा, अन्‍यथा ऐसी बात लेकर नहीं आता।
      महावीर ने कहा, तूने रोका—रोक ही रहा था….ओर रूक ही गया। वह जो चटाई तू रोका—रोक रहा था…रूक गया। तूने सिर्फ चटाई रुकते देखी,एक और क्रिया भी साथ चल रही थी, वह हो गयी। और फिर कब तक तेरी चटाई रुकी रहेगी। खुल नी शुरू हो गयी है—खुल ही जाएंगी….तू लोट कर जा वह जब लौटकर गया तो देखा  एक आदमी खोलकर उस पर लेटा हुआ है। विश्राम कर रहा था। इस आदमी ने सब गड़बड़ कर दिया। पूरा सिद्धांत ही खराब कर दिया।
      महावीर जब यह कहते थे जो हो रहा है वह हो ही गया तो वह हय कहते थे, जो हो रहा है वह तो वर्तमान है, जो हो ही गया वह भविष्‍य है। कली खिल रही है। खिल ही गई—खिल ही जाएगी। वह फूल तो भविष्‍य में बनेगी, अभी तो खिल ही रही है। अभी तो कली ही है। जब खिल ही रही है तो खिल ही जाएगी। उस का खिल जाना भी कहीं घटित हो गया।
      अब इसे हम जरा और तरह से देखें, थोड़ा कठिन पड़ेगा।
      हम सदा अतीत से देखते है। कली खिल रही है। हमारा जो चिन्‍तन है, आमतौर से पास्‍ट ओरिएंटेड़ है, वह अतीत से बंधा है। कहते है कली खिल रही हे, फूल की तरफ जा रही है। कली फूल बनेगी…लेकिन इससे उल्‍टा भी हो सकता है। यह ऐसा है जैसे मैं आपको पीछे से धक्‍के दे रहा हूं, आपको आगे सरका रहा हूं। ऐसा भी हो सकता है कोई आपको आगे खींच रहा हो। गति दोनों तरफ हो सकती है। मैं आपको पीछे से धक्‍का दे रहा हूं,और आप आगे जा रहे हो।
      ज्‍योतिष का मानना है कि यह अधूरी है दृष्टि कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य हो रहा हे।
पूरी दृष्‍टि यह है कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य खींच रहा है। कली फूल बन रही है,इतनी ही नहीं—फूल कली को फूल बनने के लिए पुकार रहा है। खींच रहा है, भविष्‍य आगे हे। अभी वर्तमान के क्षण में एक कली है। पूरा अतीत धक्‍का दे रहा हे। खुल जाओ। पूरा भविष्‍य आह्वान दे रहा है, खुल जाओ, अतीत और भविष्‍य दोनों के दबाव में कली फूल बनेगी।
      अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत अकेला फूल न बना पाएगा। क्‍योंकि भविष्‍य में आकाश चाहिए फूल बनने के लिए। भविष्‍य में जगह चाहिए स्‍पेस चाहिए। भविष्‍य स्‍थान दे तो ही कली फूल बन पाएगी। अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत कितना ही सिर मारे, कितना ही धक्‍का माने—मैं आपको पीछे से कितना ही धक्‍का मारू, या दूँ।  लेकिन सामने एक दीवार हो तो मैं आपको आगे न हटा पाऊँ गा। आगे जगह चाहिए। मैं धक्‍का दूँ और आगे की जगह आपको स्‍वीकार कर ले, आमंत्रण दे-दे कि आ जाओ,अतिथि बना लें, तो ही मेरा धक्‍का सार्थक हो पाए। मेरे धक्‍के के लिए भविष्‍य में जगह चाहिए। अतीत काम करता है भविष्‍य जगह देता है।
      ज्‍योतिष की दृष्‍टि यह है कि अतीत पर खड़ी हुई दृष्‍टि अधूरी है, आधी—वैज्ञानिक हे, भविष्‍य पूरे वक्‍त पुकार रहा है, पूरे वक्‍त खींच रहा है। हमें पता नहीं हमें दिखाई नहीं पड़ता। यह हमारी आँख की कमजोरी है, यह हमारी दृष्‍टि की कमजोरी है। हम दूर नहीं देख पाते हमें कल कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

ओशो की इस दृष्टि को हम आज के भारत पर लागू करें तो भारत से गलत को, बुराई को, भ्रष्टाचार को हटाने का जो कार्य शुरू हुआ है वह रुकेगा नहीं और अपनी पूर्णता को प्राप्त करके रहेगा| अगर ऐसी संभावना न होती तो इतना भी न होता|

सितम्बर 6, 2013

ओशो : उस्ताद “बाबा” अलाउद्दीन खान

Oshoallauddinkhanप. रविशंकर ने अपने गुरु की बेटी से विवाह किया|वह तो और भी अपरंपरागत हो गया। इसका मतलब यह है कि वर्षों तक उन्‍होंने इस बात को अपने गुरु से छिपाया। जैसे ही गुरु को इस बात का पता चला वैसे ही उन्‍होंने इसकी अनुमति दे दी। और सिर्फ अनुमति ही नहीं दी, साथ में स्‍वयं इस विवाह का आयोजन भी किया।

उनका नाम अल्‍लाउद्दीन खान था। और ये तो रविशंकर से भी अधिक क्रांतिकारी थे। मैं मस्‍तो के साथ उनसे मिलने गया था। मस्‍तो मुझे अनूठे लोगों से मिलाते थे। अल्‍लाउदीन खान तो उन दुर्लभ लोगों में से अति विशिष्ट थे। मैं कई अनोखे लोगो से मिला हूं, किंतु अल्‍लाउदीन जैसा दूसरा दिखाई नहीं दिया। वे अत्‍यंत वृद्ध थे। सौ वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद ही उनकी मृत्‍यु हुई।
जब मैं उनसे मिला तो वे जमीन की और देख रहे थे। मस्‍तो ने भी कुछ नहीं कहा। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मैंने मस्‍तो को चिकुटी भरी, किंतु मस्‍तो फिर चुप रहे—जैसे कि कुछ भी नहीं हुआ। तब मैंने मस्तो को आरे भी ताकत से चिकुटी काटी। फिर भी उन पर कोई असर नहीं हुआ। तक तो मैंने चिकुटी काटने में अपनी पूरी ताकत लगा दी। और तब उन्‍होंने कहा: ओह।
उस समय मैंने अल्‍लाउदीन खान की उन आंखों को देखा—उस समय वे बहुत वृद्ध थे। उनके चेहरे की रेखाओं पर अंकित सारे इतिहास को पढ़ा जा सकता था।
उन्‍होंने सन अठारह सौ सत्‍तावन में हुए भारत के प्रथम स्‍वतंत्रता-विद्रोह को देखा था। वह उनको अच्छी तरह से याद था। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि उस समय वे इतने बड़े तो अवश्‍य रहे होंगे कि उस समय की घटनाओं को याद रख सकें। उन्होंने सारी शताब्‍दी को गुजरते देखा था। और  इस अवधि में वे केवल सितार ही बजाते रहे। दिन में कभी आठ घंटे, कभी दस घंटे, कभी बारह घंटे। भारतीय शास्‍त्रीय संगीत की साधना बहुत कठिन है। यदि अनुशासित ढंग से इसका अभ्‍यास न किया जाए तो इसकी निपुणता में कसर रह जाती है। संगीत पर अपना अधिकार जमाए रखने के लिए सदा उसकी तैयारी में लगे रहना पड़ता है। इसके अभ्‍यास मे जरा सी भी लापरवाही नहीं करनी चाहिए, क्‍योंकि इसकी प्रस्‍तुति में वह त्रुटि तत्‍क्षण खटक जाती है।
एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ ने कहा है: अगर मैं तीन दिन तक अभ्‍यास न करूं, तो श्रोताओं को इसका पता चल जाता है। अगर मैं दो दिन अभ्‍यास न करूं तो संगीत के विशेषज्ञों को पता चल जाता है। और अगर मैं एक दिन अभ्‍यास न करूं तो मेरे शिष्‍यों को मालूम हो जाता है। जहां तक मेरा अपना प्रश्न है, मुझे तो निरंतर अभ्‍यास करना पड़ता है। एक क्षण के लिए भी मैं इसे छोड़ नहीं सकता। अन्‍यथा तुरंत मुझे खटक जाता है। कि कहीं कुछ गड़बड़ है। रात भी की अच्‍छी नींद के बाद सुबह मुझे कुछ खोया-खोया सा लगा है।

भारतीय शास्‍त्रीय संगीत बहुत ही कठोर अनुशासन है। परंतु यदि तुम इस अनुशासन को अपनी इच्‍छा से अपने ऊपर लागू करो तो यह तुम्‍हें यथेष्‍ट स्‍वतंत्रता भी देता है। सच तो यह है कि अगर समुद्र में तैरना हो तो तैरने का अभ्‍यास अच्‍छी तरह से करन पड़ता है। और अगर आकाश में उड़ना हो तो बड़े कठोर अनुशासन की आवश्‍यकता होती है। लेकिन यह किसी ओर के द्वारा तुम्‍हारे ऊपर थोपा नहीं जा सकता। सच तो यह है कि जब कोई दूसरा तुम पर अनुशासन ला दे तो यह बहुत अप्रिय लगता है। अनुशासन शब्‍द के अप्रिय हो जाने का मुख्‍य कारण यहीं है। अनुशासन शब्‍द वास्‍तव में पर्यायवाची बन गया है माता-पिता, अध्‍यापक जैसे लोगो की कठोरता का, जो अनुशासन के बारे में कुछ भी नहीं जानते। उनको तो इसका स्‍वाद भी मालूम नहीं।
संगीत का वह गुरु यह कह रहा था कि ‘अगर मैं कुछ घंटे भी अभ्‍यास न करूं तो दूसरे किसी को तो पता नहीं चलता परंतु फर्क मालूम हो जाता है। इसलिए इसका अभ्‍यास निरंतर करते रहना होता है—और जितना ज्‍यादा तुम अभ्‍यास करो, उतना ही ज्‍यादा अभ्‍यास करने का अभ्‍यास हो जाता है और वह आसान हो जाता है। तब धीरे-धीरे अनुशासन अभ्‍यास नहीं बल्कि आंदन हो जाता है।
 मैं शास्‍त्रीय संगीत के बारे में बात कर रहा हूं, मेरे अनुशासन के बारे में नहीं। मेरा अनुशासन तो आरंभ से ही आनंद है। शुरूआत से ही आनंद की शुरूआत है। इसके बारे में मैं बाद में आप लोगों को बताऊंगा।
मैंने रविशंकर को कई बार सुना है उनके हाथ में स्‍पर्श है, जादू का स्‍पर्श है, जो कि इस दुनिया में बहुत कम लोगों के पास होता है। संयोगवश उन्‍होंने सितार को हाथ लगाया और इस पर उनका अधिकार हो गया। सच तो यह है कि उनका हाथ जिस यंत्र पर भी पड़ जाता उसी पर उनका अधिकार हो जाता। अपने अपन में यंत्र तो गौण है, महत्‍वपूर्ण है उसको बजाने बाला।

रविशंकर तो अल्लाउदीन खान के प्रेम में डूब गए। और अल्‍लाउदीन खान की महानता या ऊँचाई के बारे में कुछ भी कहना बहुत मुश्‍किल है। हजारों रवि शंकरों को एक साथ जोड़ देने पर भी वे उन ऊँचाई को छू नहीं सकते। अल्लाउदीन खान वास्तव में विद्रोही थे। वे संगीत के मौलिक स्‍त्रोत थे और अपनी मौलिक सूझ-बूझ से उन्‍होंने इस क्षेत्र में अनेक नई चीजों का सृजन किया था।
आज के प्राय:  सभी भारतीय बड़े संगीतज्ञ उनके शिष्‍य रह चुके है। आदर से उन्‍हें “बाबा” कहा जाता था। ऐसा अकारण ही नहीं है कि उनके चरण-स्‍पर्श करने के लिए दूर-दूर से सब प्रकार के कलाकार—नर्तक, सितारवादक, बांसुरी वादक, अभिनेता आदि आते थे।
मैंने उन्‍हें जब देखा तो वे नब्‍बे वर्ष पार कर चुके थे। उस समय वे सचमुच “बाबा” थे और यही उनका नाम हो गया था। वे संगीतज्ञों को विभिन्‍न वाद्ययंत्र बजाना सिखाते थे। उनके हाथ में जो भी वाद्ययंत्र आ जाता वे उसको इतनी कुशलता से बजाते मानों वे जीवन भर से उसी को बजा रहे है।
मैं जिस विश्‍वविद्यालय में पढ़ता था वे उसके नजदीक ही रहते थे—बस कुछ ही घंटों का सफर था। कभी-कभी मैं उनके पास जाता था। तभी जाता जब वहां कोई त्‍यौहार न होता। वहां पर सदा कोई न कोई त्‍यौहार मनाया जाता था। शायद मैं ही एक ऐसा व्‍यक्ति था जिसने उनसे पूछा कि ‘ बाबा’ मुझे किसी ऐसे दिन का समय दो जब यहां पर कोई त्‍यौहार न हो।
उन्‍होंने मेरी और देख कर कहा: तो अब तुम उन दिनों को भी छीन लेने आ गए हो। और मुस्‍कुरा कर उन्‍होंने मुझे तीन दिन बताए। सारे बरस में केवल तीन दिन ही ऐसे थे जब वहां पर कोई उत्‍सव नहीं होता था। इसका कारण यह था कि उनके पास सब प्रकार के संगीतज्ञ आते थे—ईसाई, हिन्दू, मुसलमान। वे उन सबको अपने-अपने त्‍यौहार मनाने देते थे। वे सच्‍चे अर्थों में संत थे और सबके शुभचिंतक थे।
StampAllauddinkhan
 मैं उनके पास उन तीन दिनों में ही जाता था जब वे अकेले होते थे और उनके पास कोई भीड़-भीड़ नहीं होती थी। मैंने उनसे कहा कि ‘ मैं आपको किसी तरह से परेशान नहीं करना चाहता। आप जो करना चाहें करें—अगर आप चुप बैठना चाहते है तो चुप रहिए। आप अगर वीणा बजाना चाहते है तो वीणा बजाइए। अगर कुरान पढ़ना चाहे तो कुरान पढ़िए। मैं तो केवल आपके पार बैठने आया हूं। आपकी तरंगों को पीने को आया हूं। मेरी इस बात को सुन कर वे बच्‍चे की तरह रो पड़े। मैने उनके आंसुओं को पोंछते हुए उनसे पूछा: क्‍या अनजाने में मैंने आपके दिल को दुखा दिया है।
उन्‍होंने कहा: नहीं-नहीं। तुम्‍हारी बातों से तो मेरा ह्रदय द्रवित हो उठा है और मेरी आंखों से आंसू उमड़ आए है। मेरा इस प्रकार रोना अनुचित है। मैं इतना बूढा हूं। परंतु क्या प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को सदा उचित व्‍यवहार ही करना चाहिए।
मैंने कहा: नहीं, कम से कम तब तो नहीं जब मैं यहां हूं।
यह सुन कर वे हंस पड़े। उनकी आँखो में आंसू थे और चेहरे पर हंसी थी…दोनों एक साथ। बहुत ही आनंददायी स्थिति थी।
[ओशो : स्‍वर्णिम बचपन]
जून 25, 2013

ओशो : श्रीपाद अमृत डांगे (कम्यूनिस्ट नेता)

OshoDangeजब मैंने कहा, तकरीबन बीस बरस पहले, कि आदमी-आदमी समान नहीं हैं, भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई) ने मेरी आलोचना करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और कम्यूनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष – एस. ऐ . डांगे ने घोषणा की कि शीघ्र ही उनका दामाद, जो कि एक प्रोफ़ेसर है, एक किताब लिखने वाला है मेरे विचार – कि आदमी आदमी समान नहीं होते-  के खिलाफ| उसने मेरे खिलाफ एक किताब लिखी है, हालांकि उसमें कोई तर्क नहीं है, वहाँ है केवल गुस्सा, गालियाँ और झूठ- कहीं कोई तर्क नहीं यह सिद्ध करने को कि आदमी समान होते हैं|

उसने मेरे खिलाफ थीसीस लिखी है क्योंकि मैं लोगों के दिमागों को भ्रमित कर रहा हूँ| ठीक ठीक यह पता लगाना असंभव है कि मैं ईश्वरवादी हूँ या अनीश्वरवादी, मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूँ या धर्मो की खिलाफत करने वाला| पूरी थीसिस में वह यह सुनिश्चित करने की कोशिश करता है कि – मैं कौन हूँ- और यह काम असंभव जान पड़ता है और वह निष्कर्ष निकालता है कि मैं केवल भ्रम उत्पन्न करने वाला व्यक्ति हूँ|

अमृत डांगे, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष और दुनिया के सबसे पुराने कम्यूनिस्टों में से एक, रशियन क्रान्ति के समय अन्तर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य भी थे, लेनिन और ट्रोट्स्की के साथ वे भी एक सदस्य थे| संयोग से हम दोनों एक ही कूपे में यात्रा कर रहे थे|

उन्होंने मुझसे कहा,” क्या आपने देखा, मेरे दामाद ने आपके बारे में एक किताब लिखी है| वह तीन साल तक आपका अध्ययन करता रहा है| आपने इतना ज्यादा साहित्य रच दिया है कि आपके ऊपर शोध करना लगभग असंभव काम है| वह रात दिन लगा हुआ था और पागल हुआ जा रहा था| और आप असंभव लक्ष्य प्रतीत होते हैं| केवल यही नहीं कि आप पहले अपने ही कहे के विरोध में कहते हैं बल्कि आप इस नये कहे के भी विरोध में कहते हैं और उससे नये कहे के भी विरोध में कह देते हैं और अंत में यह पता लगाना असंभव हो जाता है कि आप क्या कहना चाहते हैं… और अंत में वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचा है|”

मैंने कहा,”आप इस किताब को ट्रेन से बाहर फेंक दें| उनसे कहियेगा कि वे मूर्ख हैं| उन्होंने क्यों तीन साल बर्बाद कर दिए| जीवन इतना छोटा है और आप एक कम्यूनिस्ट हैं: ऋणं कृत्वा  घृतं पिवेत | मेरे जैसे पागल आदमी के ऊपर इतना समय क्यों बर्बाद करना?” मैंने उनके हाथ से किताब ली और खिड़की से बाहर फेंक दी|

उन्होंने कहा,” यह क्या किया आपने| यह तो बहुत हो गया|”

मैंने कहा,” आप इमरजेंसी चेन खींच सकते हैं| आखिर यह लाल चेन किसलिए हमेशा लटकी रहती है|” पर तब तक ट्रेन मीलों दूर आ चुकी थी और मध्य रात्री का वक्त था|

अमृत डांगे ने कहा,”अब चेन खींचने से कोई लाभ नहीं होगा, अगर मैं चेन खींच भी दूँ …हम मीलों दूर आ चुके हैं और आधी रात हो चुकी है- हम कहाँ किताब को तलाशेंगे| वैसे भी बहुत चिंता की बात नहीं है| मेरे दामाद के पास इस किताब का पूरा का पूरा संस्करण पड़ा हुआ है| एक भी किताब बिकी नहीं है| क्योंकि लोग कहते हैं – भारत में एक स्पष्ट विभाजन था , या तो लोग मेरे पक्ष में थे या विरोध में, जो मेरे पक्ष में थे वे मेरी किताबें पढ़ रहे थे और वे उनके दामाद की लिखी किताब पर समय नष्ट करने की बात सोचते भी नहीं और जो मेरे विरोध में थे वे मेरा नाम भी सुनना नहीं चाहते थे- मुझ पर लिखी किताब पढ़ना तो दूर की बात है|”

सो अमृत डांगे ने कहा,”हमारे पास सारी किताबें हैं| शायद आप ठीक कहते हैं, मेरा दामाद मूर्ख है| उसने तीन साल नष्ट कर दिए और यह किताब उसने अपने पैसे से छपवाई है क्योंकि कोई भी प्रकाशक तैयार नहीं था इसे छापने के लिए, “क्योंकि”, उन्होंने कहा,” इस विषय में भारत में एक स्पष्ट विभाजन है, निष्पक्ष लोग हैं ही नहीं तो इस किताब को खरीदेगा कौन”| उसने अपने पैसे से किताब छपवाई और अब उनके ढेर पर बैठा हुआ है|”

मैंने कहा,” आप इसे बाँट सकते हैं जैसे आपने मुझे दी| बाँट दीजिए| लोगों को पढ़ने दीजिए| हालांकि उन्हें कुछ सार्थक सामग्री नहीं मिलेगी, क्योंकि आपके दामाद तीन साल लगा कर भी नहीं खोज पाए कि मेरा तात्पर्य क्या है| यह कोई भी नहीं जान सकता क्योंकि में कोई तार्किक, दार्शनिक सिद्धांत नहीं कह रहा हूँ…मैं पूर्ण अस्तित्व हूँ|”

विश्वसनीय धर्म न तो ईश्वरवादी होगा और न ही अनीश्वरवादी!

विश्वसनीय धर्म न तो भौतिकवादी होगा और न ही आध्यात्मिक!

विश्वसनीय धर्म पूर्णतावादी होगा!

यह जीवन को खांचों में विभाजित नहीं करेगा| यह पापी और पुण्यात्मा, और स्वर्ग और नरक के सारे विभाजनों को नष्ट करेगा|

मैंने बहुत सारे कम्यूनिस्टों से पूछा है, बहुत पुराने कम्यूनिस्टों से …

मैंने डांगे से पूछा,”क्या आपने कभी ध्यान (मेडिटेशन) किया है?”

उन्होंने कहा,”ध्यान? किसलिए? मुझे ध्यान क्यों करना चाहिए?”

मैंने कहा,” अगर आपने कभी ध्यान नहीं किया तो आपके पास अधिकार नहीं है यह कहने का कि कोई आत्मा नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है, कोई चेतना नहीं है| अपने अंदर गहरे में उतरे बिना आप कैसे कह सकते हैं कि अंदर कोई नहीं है? और ऐसे कथनों की निरर्थकता देखिये- कौन कह रहा है कि अंदर कोई नहीं है? निषेध के लिए भी आपको यह स्वीकार करना होगा कि कोई है| यह भी कहने के लिए कि कोई नहीं है इस बात की कल्पना करनी होगी कि कोई है|”

जून 6, 2013

ओशो : राहुल सांकृत्यायन (बौद्ध भिक्षु और वामपंथी लेखक)

Osho rahulमेरे एक मित्र, संस्कृत, पाली और प्राकृत के विद्वान, बौद्ध भिक्षु थे| लेकिन वे कम्यूनिज्म की ओर भी आकर्षित हो गये, और इसका कारण साधारण सी समानता थी, कि बुद्ध के यहाँ भी ईश्वर की परिकल्पना नहीं  है और मार्क्स के यहाँ भी नहीं है| सो वे मार्क्सिज्म की ओर आकर्षित हो गये और अंततः कम्यूनिस्ट बन गये| और सोवियत यूनिवर्सिटी ने उन्हें कहा कि वे वहाँ जाकर  संस्कृत पढाएं और वे मॉस्को चले गये|

भारत से बाहर, मॉस्को में हर चीज अलग थी| यहाँ उनके लिए असंभव था कि बौद्ध भिक्षु भी बने रहते और किसी स्त्री से प्रेम भी कर लेते| सोवियत यूनियन  में ऐसी कोई परेशानी नहीं थी| वे वहाँ एक स्त्री के प्रेम में पड़ गये| लोला– उसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थी और उसके दो बच्चे भी थे|

सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी कि वे लोला और उसके बच्चों को सोवियत संघ के बाहर ले जाएँ, अलबत्ता वहाँ वे उनके साथ रह सकते थे| पर राहुल भारत वापिस आना चाहते थे|  और वे घबराये हुए भी थे| एक तरह से सोवियत सरकार उनकी अंदुरनी इच्छा ही पूरी कर रही थी – कैसे वे पत्नी और दो बच्चों के साथ भारत जा सकते थे? सबने उनकी निंदा की होती, खासकर बौद्धों ने,”तुम एक भिक्षु हो|” सो एक तरह से वे खुश भी थे कि सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी सो अब वह प्रश्न ही खड़ा नहीं हुआ|

वे वापिस आ गये| उन्होंने मुझे बताया,” जब मैं पहले पहले सोवियत संघ पहुंचा मैंने एक छोटे लड़के से पूछा,” क्या तुम ईश्वर में विश्वास रखते हो|” उसने कहा,”ईश्वर! लोग अंधे युगों में उसमें विश्वास किया करते थे| अगर आपको ईश्वर की मूर्ति देखनी हो तो आप म्यूजियम में जा देख सकते हैं|” ”

लेकिन ये सब भी प्रोग्रामिंग है| ऐसा नहीं है कि ऐसे छोटे लड़के जानते हैं कि ईश्वर नहीं है या कि कार्ल  मार्क्स ही जनता था कि ईश्वर नहीं है| केवल ध्यान में गहरे उतरने वाला व्यक्ति ही जां सकता है कि ईश्वर है या नहीं|

आप सब लोग किसी न किसी सांचे में ढाले गये लोग हो| आपकी प्रोग्रामिंग की गई है| और तुम्हारे साथ यह इतने गहरे में किया गया है कि तुम समझने लगे हो कि यह तुम्हारा स्वभाव है| तुम्हारी कल्पनाएं, तुम्हारी आशा, तुम्हारा भविष्य …कुछ भी प्राकृतिक नहीं है|

प्रकृति इस क्षण के सिवाय कुछ नहीं जानती| प्रकृति कुछ नहीं जानती, आशा, इच्छाएं , लालसा| प्रकृति तो आनंद उठाती है उसका जो इस क्षण, अभी और यहीं, उपलब्ध है|

राहुल ने मुझे बताया,” रशियन लोगों के लिए सबसे बड़ी अचरज की बात थी मेरे हाथ|”

मैंने कहा,” आपके हाथ!”

उन्होंने कहा,” हाँ मेरे हाथ! जब भी मैं उनसे हाथ मिलाता, वे तुरंत अपने हाथ खींच लेते और कहते,”तुम जरुर बुजुर्वा हो, तुम्हारे हाथ बताते हैं कि तुमने कभी काम नहीं किया|””

मैंने बौद्ध भिक्षु से कहा,”आप मेरे हाथ का स्पर्श करो| तब आपको पता लगेगा कि आप श्रमजीवी हो और मैं बुजुर्वा| यह आपको बहुत बड़ा दिलासा देगा|”

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