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अगस्त 1, 2017

टूटा पहिया

मैं

रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंकों मत

क्या जाने कब

इस दुरूह चक्रव्यूह में

अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ

कोई दुस्साहसी अभिमन्यु घिर जाए?

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी

बड़े- बड़े महारथी

अकेली निहत्थी आवाज को

अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं

रथ का टूटा पहिया

उसके हाथों में

ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत

इतिहासों की सामूहिक गति

सहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जाने

सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!

(धर्मवीर भारती)

 

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जून 20, 2011

पिता तुम्हे याद करते हुये

हे पिता!
कितने वर्ष हो गये
तुम्हे इसी तरह कभी कभी याद करते हुये
जन्म से मृत्यु तक
तुम्हारा सघर्ष
सुना-जाना और देखा मैंने
अपराजेय काल से भी तो
खूब लड़े तुम,
उस एक पल के सिवा
कुछ भी तो नहीं झुका पाया तुम्हे
चाहा मैंने भी तो कितना
तुम्हे झुकाना
पराजित करना
पीढ़ियों के संघर्ष में
आपसी रण में
मगर समान ध्रुव थे हम
एक-दूसरे को दूर भगाने में ही
लगे रहे ताउम्र
पास आने की हर कोशिश में
दूर जाते रहे
और
अपनी असफलता को
विजय का सोपान समझ
मुस्कराते रहे हम
हार मानना
हमारे स्वभावों में नहीं
हार जाना
हमारी किस्मत में था
पर-
मैं तुम्हारा पुत्र
तुम्हारी तरह ही जिद्दी,
मैं समर से जूझूंगा
भले ही मारा जाऊँ अभिमन्यु की तरह
आशीर्वाद, अब तो दो
“वत्स, विजयी भवः”
मेरे लिये ईश्वर भी तुम
और देवता भी तुम।

हे पिता!
तुम्हारे सिवा
और किसकी ओर देखूँ मैं
संघर्ष के क्षणों में
तुम बहुत याद आते हो मुझे
कभी-कभी तो बहुत ज्यादा
जिस वक्त्त
लड़ रहा होता हूँ
मैं खुद से…

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 25, 2010

आज के अभिमन्यु

भाग्यशाली लगता है,
आज अर्जुन पुत्र अभिमन्यु,
जिसने चक्रव्यूह भेदने की कला
माता के गर्भ में रहते हुए ही सीख ली थी|

नहीं जानता था वह चक्रव्यूह से बाहर निकलना,
पर तोड़ दुश्मन का घेरा,
घुस तो गया था अन्दर,
वह कपटियों के बिछाए जाल को तहस नहस करने को,
मरा जरुर वह,
परन्तु अपना शौर्य दिखाकर,
दुनिया को अपनी वीरता और क्षमता का प्रदर्शन दिखाकर|

आज का युवा तो
भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार, सिफारिश, परोक्ष अपरोक्ष आरक्षण,
निरंतर कम होते रोजगार के अवसरों
से बने चक्रव्यूह में घुस भी नहीं पाता
उसे तोड़ना तो बहुत दूर की कौड़ी है|

इन युवाओं की फौज पर इतराने वाले देश को
आँखें खोलनी होंगीं
वरना
कुंठित होकर कब युवा
अपनी सारी योग्याताओं की समाधि बना डालेगा
पता नहीं चलेगा|

फिर इन समाधियों पर विराजमान
इन चूक चुके थके हुए युवाओं से किसी
निर्माण की आशा करना स्वप्निल ही होगा,
भ्रांतियों में जीते इन तथाकथित युवाओं से
किसी क्रांति की अपेक्षा करना
इनका मजाक उड़ाने जैसा होगा|

क्योंकि इनकी शांति भी तब
मरघट की शांति होगी
वह शांति
रक्तहीन हो चुके शरीरों की अकर्मण्यता की छाप से भरी होगी|
देश, समाज की जिम्मेदारियों को संभालने की बात कहना
तब इन्हें व्यर्थ में परेशान करने जैसा होगा|

तब ऐसे में अपने ही कन्धों पर अपना शव ढ़ोते
इन बेचारों के सामने
सिर्फ धरा पर अपना अभिनय पूरा करने का
सीमित अवसर ही हाथ में होगा|

अभी तो मौका है, समय है
जब आज के अभिमन्यु सरीखे युवाओं को अर्जुन
बनाने का प्रयास किया जा सकता है!

…[राकेश]

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