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मई 28, 2011

जिये के मरा करे कोई

दिल के घावों से इब्तेदा करे कोई
हम नहीं करते तो वफ़ा करे कोई

दुःख खुद में समेटे रखा करे कोई
तुम नहीं सुनते तो क्या करे कोई

आँखों से कहो अब पथरा ही जाएँ
कब तक रास्ते को तका करे कोई

रौशनी के शहर में सायों के साथ
खुद की तलाश में चला करे कोई

मतलब के रिश्तों के इस दौर में
खुद पर भी ना भरोसा करे कोई

फिर कोई भरोसा दिलाने है आया
फिर बगल में छुरी रखा करे कोई

यही इन्साफ है इस नए दौर में
करे तो कोई और भरा करे कोई

जिंदगी सी बे भरोसा चीज़ है क्या
जिंदगी पर भरोसा क्या करे कोई

कौन नहीं है यहाँ हालात का मारा
किस की फरियाद सुना करे कोई

बेकार फिर रही हैं डिग्रियाँ आलम
कागज के पुर्जों का क्या करे कोई


……

बीमार ए जिंदगी को चंगा करे कोई
मौत आ के अब मेरी दवा करे कोई

रोटी में भी क्यों साथ हुआ करे कोई
सोना खा के चांदी पी लिया करे कोई

क्यों अखबार नहीं उठा रहा है पडोसी
किसे फुरसत है जा के पता करे कोई


हर कोई खुदा बना है मेरी बस्ती में
किस किस के दर पे झुका करे कोई

लाओ पाँवों की माटी सर पे रखते हैं
हालत की जिद है समझौता करे कोई

क्या होगा जो अपने रंग में रंग बेठे
दीवानों से जा के ना उलझा करे कोई

अपनी नाकामी पर पछताने के सिवा
नसीब ही फूटा हो तो क्या करे कोई

कांटे की नोक पर हँसता देखा गुलाब
हुस्न का दर्द ओस से पता करे कोई

बेगाने हुए खून के सब रिश्ते आलम
किसे है फ़िक्र जिए के मरा करे कोई

(रफत आलम)

इब्ने मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुःख की दवा करे कोई – हज़रत मिर्ज़ा ग़ालिब

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