Posts tagged ‘Aavaj’

जून 4, 2014

आखिरी ख़त

बहुत देर से शब्द मिल नहीं रहे हैं…tum-001

खाली कुएं से तो अपनी ही आवाज़ लौटेगी न

अब किसको आवाज़ दूं?

किसको पुकारूं??

दिल का खला भरा नहीं अब तक

तेरे इंतज़ार में आँखें पत्थर हो गयीं

आवाज़ भी अपनी ग़ुम गयी जैसे

दिल के कुएं से टकरा के वापस जो नहीं आई…

सोचता हूँ कि आखिरी ख़त भी लिख रखूं

तुम इस का जवाब मत देना

मैं मुन्तजिर न रहूँगा

ये सिलसिला-ऐ-तबादला-ऐ- ख्याल रुक जाये अब

बेवज़ह गर्म ख्यालों का जवां रहना ठीक तो  नहीं

ये सिलसिला सौ नए अरमानो का वायस बनता है

ये नहीं टूटेगा तो लाजिमी दिल टूट जायेंगे

बंद करना ही होगा हर रास्ता

हर झरोखे के मुंह पे पत्थर रखना ही होगा

मुलाकात की हर वज़ह मिटानी ही  होगी

मिटाने होंगे

इस किराये के मकां के पते के निशां

कल से मैं तुम्हे नहीं मिलूँगा यहाँ…

Rajnish sign

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मार्च 4, 2014

तुझसे मुलाक़ात के बाद…

रात, कल रात बहुत तपी…silentlove-001

तुझसे उस मुलाक़ात के बाद!

भीतर मेरी  साँसों से निकल कर कहीं…

तेरी सदा आती  रही

दिल के नज़दीक कहीं…

तेरे सीने की नर्म छुअन गुदगुदाती रही

इक लहर सी उठती रही पाँव से सर तलक जैसे

मेरे सीने से होकर तेरी हर सांस जाती रही

जाने क्या जादू है तेरी आवाज़ में

जो न कैसा मेरे बदन में तूफ़ान उठा देती है…

बेचैन कर देता है…

मेरे बिस्तर कि सलवटें कह देंगी

कि रात भर मुझे किस की  याद आती रही

हर बूँद लहू में घुल कर

किस तरह तू मुझे सहलाती रही

Rajnish sign

नवम्बर 28, 2013

उठो, समय हो गया है!

थके,manroad-001

बोझिल कदम लिए बैठा है वह

धुंए और धूल से भरी आँखें लिए

चौराहे की बैंच पर

आते-जाते परिंदों की आवाजाही

भुट्टे टूंगने की जद्दोजहद

होटल लौटने का समय हो गया है|

असमंजस के चौराहे पर

लाठी को पटक-पटक कर मारा है

छोटे-बड़े दायरों में

आवाज के वृत बनते हैं-बिगड़ते हैं

आसमान से झाँक कर,

पर कोई तो मुस्कराया है

कि-

नई डगर चलने का समय हो गया है|

Yugalsign1

अप्रैल 30, 2013

प्रेम में आकाश

जब हम नहीं करते थे प्रेम

तब कुछ नहीं था हमारे पास

फटी हथेलियों

और थके पैरों से

हल लगाते थे हम

कोहरे में घाम को देते थे

आवाज

हम देखते थे आकाश

जिसका मतलब

आकाश के सिवाय

कुछ नहीं था हमारे लिए

जब हम प्रेम में गिरे

हम यादों में गिरे

जब यादों में बहे

प्रेम में डूब गये हम

घाटी से चलकर

हमारे घर तक आने वाली

पगडंडी था तब आकाश

हमारे खेतों में

आँख ले रहे होते अंकुर

आकाश में हम सुनते रहते

हवा की गूँज

जो हमारी सांस थी दरअसल

प्रेम में आकाश

आकाश जितना ही दूर था

उसे ज़रा सा उठाकर

हम अपने

मवेशियों को देते थे आवाज

उसकी आँखों में

हम देखते थे अपनी दुनिया

पहाड़ों को काटकर बने घर

जो हमारे थे

हम जो रहते थे एक गाँव में

प्रेम करते हुए|

(हेमंत कुकरेती)

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